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'बिहार' नाम की कहानी: कब और कैसे पड़ा ये नाम? जानिए इसकी पूरी दास्तान

बिहार राज्य की स्थापना 22 मार्च 1912 को की गई थी, जब इसे बंगाल प्रेसीडेंसी से अलग करके बिहार और ओडिशा के रूप में एक नया प्रांत बनाया गया. उससे पहले, बिहार बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा था. जानिए बिहार का इतिहास

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30 Jun 2025
( Updated: 11 Dec 2025
03:14 AM )
'बिहार' नाम की कहानी: कब और कैसे पड़ा ये नाम? जानिए इसकी पूरी दास्तान
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बिहार भारत का एक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक रूप से अत्यंत समृद्ध राज्य है, जिसकी महानता अनेक पहलुओं में झलकती है. बिहार प्राचीन भारत की महाजनपद व्यवस्था में मगध का हिस्सा रहा है, जो उस समय का एक शक्तिशाली साम्राज्य था. सम्राट अशोक और चंद्रगुप्त मौर्य जैसे महान सम्राटों का शासन यहीं से हुआ. नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों की स्थापना भी यहीं हुई, जो विश्वप्रसिद्ध शिक्षा केंद्र थे. बिहार राज्य का प्राचीन इतिहास में नाम मगध था. लेकिन इतिहास में एक दौर ऐसा भी आया था, जब बिहार को बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा बना दिया गया था और इसका स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया था. ऐसे में बिहार राज्य को आधिकारिक रूप से बिहार का नाम कब मिला, चलिए जानते हैं. 

ऐसे पड़ा बिहार का नाम!
बिहार राज्य के साथ कई ऐतिहासिक कहानियां जुड़ी हुई हैं. बिहार राज्य का नाम बिहार कैसे पड़ा, इसके पीछे भी एक रोचक कहानी है. बिहार को प्राचीन काल में मगध जनपद कहा जाता था, जो भारत के 16 जनपदों में सबसे प्रमुख था. मौर्य वंश के सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म का सर्वाधिक प्रचार देश और विदेश में किया. उन्होंने कई बौद्ध विहार बनवाए जिनके आधार पर बिहार राज्य का नामकरण हुआ.

1936 में हुई बिहार राज्य की स्थापना
बिहार राज्य की स्थापना 22 मार्च 1912 को की गई थी, जब इसे बंगाल प्रेसीडेंसी से अलग करके बिहार और ओडिशा के रूप में एक नया प्रांत बनाया गया. उससे पहले, बिहार बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा था. बाद में, 1936 में ओडिशा को बिहार से अलग करके एक स्वतंत्र राज्य बना दिया गया.
जब 1912 में बिहार की स्थापना हुई, उसी समय इसे आधिकारिक रूप से 'बिहार' नाम दिया गया. 'बिहार' शब्द की उत्पत्ति 'विहार' से हुई है, जिसका अर्थ होता है बौद्ध मठ. प्राचीन काल में यह क्षेत्र बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र था और यहां अनेक बौद्ध विहार स्थित थे. समय के साथ ‘विहार’ शब्द परिवर्तित होकर 'बिहार' बन गया, जो आज भी इस राज्य की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है.

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1765 से 1912 तक: बिहार का बंगाल प्रेसीडेंसी के साथ सफर
1765 ईस्वी में मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच एक ऐतिहासिक संधि हुई, जिसे ‘इलाहाबाद की संधि’ कहा जाता है. यह संधि बक्सर की लड़ाई (1764) में ईस्ट इंडिया कंपनी की विजय के बाद संपन्न हुई थी.
इस संधि के तहत शाह आलम द्वितीय ने कंपनी को बंगाल, बिहार और ओडिशा की दीवानी (राजस्व वसूली और प्रशासनिक अधिकार) सौंप दी. इस अधिकार के मिलने के साथ ही ईस्ट इंडिया कंपनी को इन क्षेत्रों में राजस्व एकत्र करने और प्रशासन चलाने का वैध अधिकार प्राप्त हो गया. इतिहासकार इसे भारत में अंग्रेजी शासन की औपचारिक शुरुआत मानते हैं.
इसके बाद ‘बंगाल प्रेसीडेंसी’ के नाम से एक प्रशासनिक प्रांत का गठन किया गया, जिसमें बंगाल, बिहार और ओडिशा को शामिल किया गया. इस प्रेसीडेंसी की राजधानी कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) बनाई गई.
बंगाल प्रेसीडेंसी, ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन तीन प्रमुख प्रशासनिक इकाइयों बंगाल, बॉम्बे और मद्रास प्रेसीडेंसी में सबसे बड़ी और सबसे प्रभावशाली थी.

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बंगाल प्रेसीडेंसी के साए में दबा बिहार
ब्रिटिश शासन काल में बिहार अंग्रेजों के लिए केवल एक आर्थिक संसाधन का स्रोत था. इसे स्वतंत्र प्रशासनिक इकाई के रूप में कभी महत्व नहीं दिया गया. बिहार को सीधे तौर पर ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा नियंत्रित किया जाता था और इसका प्रशासन कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) से संचालित होता था.
राजस्व और प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से बिहार अत्यंत महत्वपूर्ण था. यहां धान, गन्ना, नील और तंबाकू जैसी नकदी फसलों की भरपूर खेती होती थी, जिससे ब्रिटिश शासन को भारी मात्रा में राजस्व प्राप्त होता था. लेकिन इसके बावजूद, बिहार को कभी उसकी सांस्कृतिक, सामाजिक या शैक्षिक दृष्टि से विकास के योग्य नहीं समझा गया.
ईस्ट इंडिया कंपनी ने कर वसूली के लिए जमींदारी व्यवस्था लागू की, जिसके कारण किसानों पर अत्यधिक आर्थिक बोझ बढ़ गया. भारी करों और दमनात्मक नीतियों के कारण किसान भुखमरी और गरीबी की कगार पर पहुंच गए.
बिहार की संस्कृति, भाषा और शिक्षा को पूर्ण रूप से नजरअंदाज किया गया क्योंकि निर्णय और विकास से जुड़ी सभी नीतियां बंगाल प्रधान प्रशासन के अधीन होती थीं. इस निरंतर उपेक्षा ने बिहार के लोगों में अलग पहचान और स्वायत्तता की भावना को जन्म दिया.
इसी भावना और जनचेतना के परिणामस्वरूप 22 मार्च 1912 को बिहार को बंगाल से अलग कर एक स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थापित किया गया. यह दिन "बिहारी अस्मिता" और स्वाभिमान की पुनः स्थापना का प्रतीक बन गया.

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