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उत्तराखंड में UCC को लेकर विरोध तेज होता जा रहा है, लोग सड़को पर है, धामी ने दिया जवाब!

उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता-यूसीसी का विरोध शुरु होता जा रहा है, देहरादून में जनसंगठनों ने आंदोलन का ऐलान कर दिया है, अप्रैल में पूरे राज्य में घरना दिया जाएगा, फिर हस्ताक्षर अभियान भी चलाया जाएगा

उत्तराखंड में UCC को लेकर विरोध तेज होता जा रहा है, लोग सड़को पर है, धामी ने दिया जवाब!
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1973 में केशवानंद भारती मामले में 13 न्यायाधीशों की पीठ में न्यायमूर्ति एस.एम. सीकरी ने तत्कालीन सरकार को याद दिलाया था कि राज्य को पूरे भारत में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए। लेकिन इसी पीठ ने इस फैसले पर यह कहते हुए रोक भी लगा दी थी कि यह जरूरी तो है, लेकिन सरकार इस तरफ कोई ठोस कदम नहीं उठा पाई है। और जब उत्तराखंड जैसे राज्य ने अपने प्रदेश में यूसीसी लागू किया, तो लोगों के पेट में दर्द होने लगा। यूसीसी की वापसी के लिए अभियान चलाया जा रहा है।

अभी 27 जनवरी को ही प्रदेश ने इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करवाते हुए प्रदेश में यूसीसी लागू किया था। यूसीसी पोर्टल को लॉन्च करते हुए प्रदेश की मुख्यमंत्री धामी ने कहा था कि आज का दिन उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए ऐतिहासिक है। ड्राफ्ट बनाने में टीम ने कड़ी मेहनत की है। हमने जनता से किया वादा पूरा किया है। यूसीसी किसी धर्म के खिलाफ नहीं है, बल्कि इससे अब राज्य में सभी धर्मों की महिलाओं को एक समान अधिकार मिलेगा। यूसीसी से महिलाएं सशक्त होंगी। हलाला प्रथा, बहुविवाह, बाल विवाह पर रोक लगेगी।

लेकिन सरकार के इसी ऐतिहासिक फैसले के खिलाफ देहरादून में जनसंगठनों ने आंदोलन का ऐलान कर दिया है। 11 से 14 अप्रैल तक पूरे राज्य में जगह-जगह धरना दिया जाएगा। फिर एक महीने तक हस्ताक्षर अभियान चलाया जाएगा। यूसीसी को रद्द करने की मांग की जाएगी। जनसभाएं की जाएगी, एक-एक लोग से जुड़ा जाएगा, और यूसीसी की कमियों को बताया जाएगा, अपने अभियान से जोड़ा जाएगा। यूसीसी को रद्द करने की मुहिम को फिर और तेज किया जाएगा।

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लेकिन जो कथित जनआंदोलन उत्तराखंड में चलाया जा रहा है, इस पर अब मुख्यमंत्री पुष्कर धामी का बयान सामने आया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि हमने देश में सबसे पहले समान नागरिक संहिता लागू की है, इसमें महिलाओं की सुरक्षा का विशेष प्रावधान किया गया है, लेकिन कुछ लोग लिव इन रिलेशनशिप को लेकर भ्रम फैला रहे हैं। लिव इन रिलेशनशिप हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है, लेकिन हमने कानून में प्रावधान किया है कि इसे अपनाने वाले युवाओं की जानकारी उनके माता-पिता के पास होनी चाहिए।

और यह सच भी है कि लिव इन का कांसेप्ट इस देश की संस्कृति में कभी था ही नहीं। पश्चिम के रास्ते पर चलकर इस देश की संस्कृति का दोहन किया जा रहा है, और अगर कोई लिव इन में रहना चाहता है, तो फिर जिन मां-बाप ने खुद से दूर पढ़ाई के लिए या नौकरी के लिए अपने बच्चों को भेजा है, उन्हें क्यों न पता हो कि उनका बच्चा किसके साथ है, क्या करता है? अगर यूसीसी लागू होने से समाज में एकरूपता आती है, सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलता है, जाति, धर्म, लिंग का भेद खत्म होता है, तो इससे परेशानी क्या है?

लेकिन परेशानी है, परेशानी उन लोगों को है जो नहीं चाहते कि समाज से यह भेदभाव खत्म हो, क्योंकि इस भेदभाव के आधार पर ही तो उनकी राजनीति चलती आई है, और अब जब से भेदभाव खत्म हो रहा है, तो फिर उनके मोहब्बत की दुकानों में ताले पड़ रहे हैं। और इस दुकान को खोलने का कोई रास्ता इन लोगों को दिखाई दे नहीं रहा है।

हालांकि प्रधानमंत्री मोदी भी यूसीसी को लेकर अपना रुख साफ कर चुके हैं, कह चुके हैं कि एक घर में दो कानून नहीं चल सकते हैं। ऐसी दोहरी व्यवस्था से देश कैसे चल पाएगा? इस मुद्दे पर देश को गुमराह किया जा रहा है। हालांकि प्रधानमंत्री के इस बयान पर सियासी घमासान भी छिड़ा था, लेकिन बीजेपी यूसीसी को लेकर प्रतिबद्ध दिखाई पड़ती है। उत्तराखंड में लागू हो चुका है, गुजरात और असम में ड्राफ्ट बनाया जा रहा है, आने वाले वक्त में उत्तर प्रदेश में भी इसकी तैयारी शुरू हो सकती है।

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तो विरोध करने वाले करते रहें, उत्तराखंड में यूसीसी लागू हो चुका है, और जैसे चल रहा है, चलता रहेगा। वैसे इस देश में 370 को बहाल करने की भी बात कही गई थी, लेकिन कोई कर नहीं पाया। सुप्रीम कोर्ट तक की खाक छान ली। जब से जम्मू-कश्मीर से 370 हटा है, तब से प्रदेश विकास के नए आयाम लिख रहा है। ठीक वैसे ही उत्तराखंड में भी यूसीसी लागू हो चुका है, और भविष्य में उम्मीद नजर नहीं आती कि इसे प्रदेश से कोई खत्म करे। बाकी जाते-जाते सुनिए उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने यूसीसी लागू करते वक्त क्या कहा था।


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