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'बिहार में गुपचुप तरीके से NRC लागू कर रहा है चुनाव आयोग...', ओवैसी बोले– ये लोकतंत्र के साथ मज़ाक है

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले आईएमआईएम प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने चुनाव आयोग पर बड़ा आरोप लगाया है. ओवैसी ने दावा किया है कि बिहार में गुप्त रूप से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) लागू किया जा रहा है. उनका कहना है कि यह प्रक्रिया राज्य में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले चुपचाप चलाई जा रही है, जिससे हजारों वैध भारतीय नागरिकों को मतदाता सूची से बाहर किया जा सकता है.

'बिहार में गुपचुप तरीके से NRC लागू कर रहा है चुनाव आयोग...', ओवैसी बोले– ये लोकतंत्र के साथ मज़ाक है
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बिहार में इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर सियासी पारा चढ़ता जा रहा है. एक ओर जहां सभी प्रमुख राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीति तैयार करने में जुटे हुए हैं, वहीं दूसरी ओर चुनाव प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं. पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे, और अब एआईएमआईएम प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने चुनाव आयोग पर बड़ा आरोप लगाया है.

ओवैसी ने दावा किया है कि बिहार में गुप्त रूप से राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) लागू किया जा रहा है. उनका कहना है कि यह प्रक्रिया राज्य में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले चुपचाप चलाई जा रही है, जिससे हजारों वैध भारतीय नागरिकों को मतदाता सूची से बाहर किया जा सकता है. उन्होंने आगाह किया कि अगर ऐसा हुआ तो इससे न सिर्फ कई लोगों का वोट देने का अधिकार छिन सकता है, बल्कि चुनाव आयोग की साख पर भी गहरा सवाल खड़ा होगा. ओवैसी ने कहा कि नए नियमों के तहत लोगों को अपने और अपने माता-पिता के जन्म का विवरण दस्तावेजों के ज़रिए साबित करने के लिए कहा जा रहा है. उन्होंने चेतावनी दी कि यह प्रक्रिया खासकर गरीब तबके के नागरिकों के लिए बेहद कठिन साबित हो रही है. उन्होंने विशेष रूप से सीमांचल क्षेत्र का ज़िक्र करते हुए कहा कि वहां के बाढ़ प्रभावित लोगों के पास अक्सर ऐसे दस्तावेज नहीं होते हैं, जिससे उनका नाम मतदाता सूची में बना रह सके. बता दें कि सीमांचल में बिहार के चार जिले आते हैं- कटिहार, पूर्णिया, अररिया और किशनगंज. मुस्लिम बाहुल्य इन चार जिलों में 24 विधानसभा सीटें हैं. जिनमें से पिछले चुनाव में ओवैसी की पार्टी ने पांच सीट जीतकर सभी को चौंकाया था. 

पिछले दरवाजे से लागू किया जा NRC: ओवैसी
ओवैसी ने सोशल मीडिया के एक्स प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट में दावा किया कि चुनाव आयोग राज्य में पिछले दरवाजे से एनआरसी लागू कर रहा है. उन्होंने इस प्रक्रिया को गरीब और हाशिए पर खड़े लोगों के खिलाफ बताया है. ओवैसी ने अपने पोस्ट में लिखा कि, 'बिहार में मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए अब नागरिकों को न सिर्फ यह साबित करना होगा कि वे कहां और कब पैदा हुए, बल्कि यह भी दस्तावेज़ों के जरिए बताना होगा कि उनके माता-पिता का जन्म कब और कहां हुआ था.' उन्होंने इसे एनआरसी जैसी प्रक्रिया बताते हुए कहा कि यह देश के संविधान और लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है. ओवैसी ने अपनी पोस्ट में यह भी लिखा कि, 'भारत में अब भी केवल लगभग तीन-चौथाई जन्म ही पंजीकृत होते हैं. ऐसे में गरीबों, विशेष रूप से ग्रामीण और सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले नागरिकों के लिए आवश्यक दस्तावेज़ जुटाना लगभग असंभव है. उन्होंने कहा कि कई सरकारी दस्तावेज़ों में पहले से ही गंभीर गलतियां होती हैं, जिससे निर्दोष लोग प्रभावित हो सकते हैं.

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सीमांचल के लोगों के साथ हो रहा अन्याय
ओवैसी ने अपने इस पोस्ट में खास तौर पर बिहार के सीमांचल क्षेत्र का ज़िक्र किया, जो बार-बार बाढ़ से प्रभावित होता है और जहां की आबादी आर्थिक रूप से बेहद कमजोर है. उन्होंने कहा, "ये लोग दो वक्त की रोटी मुश्किल से जुटा पाते हैं, उनसे यह उम्मीद करना कि वे अपने माता-पिता के जन्म प्रमाण दिखाएं,यह एक क्रूर मज़ाक है." ओवैसी ने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही 1995 में इस तरह की प्रक्रियाओं पर कड़े सवाल उठा चुका है. उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि चुनाव आयोग ने इस प्रक्रिया को नहीं रोका, तो इससे न केवल लाखों वैध भारतीय नागरिकों का मताधिकार छिन सकता है, बल्कि लोकतंत्र में जनता का भरोसा भी टूट सकता है.

गरीबों के मताधिकार पर खतरा: ओवैसी 
ओवैसी ने अपन पोस्ट में कहा कि मतदाता सूची में नाम दर्ज होना हर भारतीय नागरिक का संवैधानिक अधिकार है. लेकिन जिस तरह से चुनाव आयोग नागरिकों से जटिल और कठिन दस्तावेज़ी प्रक्रिया की मांग कर रहा है, उससे गरीब वर्ग के लोगों के अधिकारों का हनन होगा. उन्होंने चेतावनी दी कि इस प्रक्रिया का सीधा असर उन लोगों पर पड़ेगा जिनके पास जरूरी दस्तावेज़ नहीं हैं. ओवैसी ने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में ही ऐसी मनमानी और नागरिक अधिकारों को बाधित करने वाली प्रक्रियाओं पर गंभीर चिंता जताई थी. उन्होंने लिखा कि चुनाव के इतने करीब ऐसी जटिल प्रक्रिया को लागू करना आयोग की नीयत पर सवाल खड़े करता है और इससे जनता का उस पर से भरोसा कमजोर होगा. ओवैसी ने कहा कि बिहार में मतदाता सूची में बने रहने के लिए नागरिकों को जन्म से संबंधित विस्तृत दस्तावेज़ प्रस्तुत करने होंगे. यह प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करेगी कि व्यक्ति का जन्म किस वर्ष हुआ है.

ओवैसी ने अपने पोस्ट में दस्तावेज के नियमों की विस्तृत जानकारी साझा करते हुए लिखा की, "अगर आपकी जन्मतिथि जुलाई 1987 से पहले की है, तो आपको जन्म की तारीख और/या जन्म स्थान दिखाने वाला कोई एक दस्तावेज़ देना होगा (11 में से एक). अगर आपका जन्म 01.07.1987 और 02.12.2004 के बीच हुआ है, तो आपको अपना जन्म प्रमाण (तारीख और स्थान) दिखाने वाला एक दस्तावेज़ देना होगा, और साथ ही अपने माता या पिता में से किसी एक की जन्म तारीख और जन्म स्थान का दस्तावेज़ भी देना होगा. और अगर आपका जन्म 02.12.2004 के बाद हुआ है, तो आपको अपनी जन्म तारीख और स्थान के दस्तावेज़ के साथ-साथ, दोनों माता-पिता के जन्म की तारीख और स्थान को साबित करने वाले दस्तावेज़ भी देने होंगे. इसके साथ ही अगर माता या पिता में से कोई भारतीय नागरिक नहीं है, तो उस समय के उनका पासपोर्ट और वीज़ा भी देना होगा."

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला 
ओवैसी ने अपने इस लंबे-चौड़े पोस्ट में देश की सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसला का भी हवाला दिया. उन्होंने लिखा, "चुनाव आयोग हर वोटर की जानकारी एक महीने (जून-जुलाई) में घर-घर जाकर इकट्ठा करना चाहता है. बिहार जैसे राज्य, जो बहुत बड़ी आबादी और कम कनेक्टिविटी वाला है, वहां इस तरह की प्रक्रिया को निष्पक्ष तरीके से करना लगभग असंभव है. लाल बाबू हुसैन केस (1995) में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि किसी व्यक्ति को, जो पहले से वोटर लिस्ट में दर्ज है, बिना सूचना और उचित प्रक्रिया के हटाया नहीं जा सकता. ये चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह दिखाए कि किसी व्यक्ति को विदेशी क्यों माना जा रहा है. सबसे अहम बात, कोर्ट ने ये भी कहा कि नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज़ों की एक सीमित सूची नहीं हो सकती. हर तरह के सबूत को स्वीकार किया जाना चाहिए."

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बताते चलें कि बिहार में साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं और चुनाव आयोग तैयारियों में जुटा है. ऐसे में ओवैसी के आरोपों ने आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं. यदि ये प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के विरुद्ध साबित होती है, तो यह कानूनी विवाद और मताधिकार प्रभावित होने का बड़ा कारण बन सकती है.

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