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बौद्ध भिक्षुओं का 2 महीने से अनशन, जानिए 1949 के कानून से क्यों हैं नाराज़

बिहार के बोधगया स्थित महाबोधि मंदिर में फरवरी 2024 से लगभग 100 बौद्ध भिक्षु लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। वे महाबोधि मंदिर पर बौद्ध समुदाय का पूर्ण नियंत्रण चाहते हैं और इसके लिए 1949 में बने बोधगया मंदिर अधिनियम को खत्म करने की मांग कर रहे हैं। यह कानून मंदिर संचालन में हिंदुओं और बौद्धों दोनों को अधिकार देता है, जिससे बौद्ध भिक्षु नाराज़ हैं।

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07 Apr 2025
( Updated: 11 Dec 2025
03:04 AM )
बौद्ध भिक्षुओं का 2 महीने से अनशन, जानिए 1949 के कानून से क्यों हैं नाराज़
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बिहार का बोधगया... एक शांत शहर, जहां भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। वही स्थान जो बौद्ध धर्म का केंद्र है, आज दो महीनों से बौद्ध भिक्षुओं के नारों और धरनों से गूंज रहा है। फरवरी 2025 से यहां एक ऐसा आंदोलन चल रहा है, जिसने न केवल बिहार सरकार को बल्कि पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

मामला केवल किसी मंदिर के प्रशासन का नहीं है, यह एक समुदाय की पहचान और वर्षों से दबी एक पीड़ा का विस्फोट है। बौद्ध भिक्षु महाबोधि मंदिर का सम्पूर्ण नियंत्रण सिर्फ बौद्धों को देने की मांग कर रहे हैं, और इसके लिए वे बोधगया मंदिर अधिनियम 1949 (Bodhgaya Temple Act - BTA) को हटाने की बात कह रहे हैं।

आख़िर क्यों उठी ये मांग?

बोधगया वही स्थान है जहां गौतम बुद्ध ने बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त किया था। सम्राट अशोक ने इसी स्थान पर महाबोधि मंदिर का निर्माण कराया था। लेकिन आज इस ऐतिहासिक स्थल का संचालन एक ऐसे कानून के तहत हो रहा है, जो बौद्धों को उनकी धार्मिक स्वतंत्रता से पूरी तरह जुड़ा हुआ नहीं मानता।

BTA 1949 के अनुसार, मंदिर संचालन के लिए बनी समिति में बौद्ध और हिंदू दोनों को समान प्रतिनिधित्व दिया गया है। यहां तक कि गया का जिलाधिकारी (जो किसी भी धर्म का हो सकता है) इस समिति का पदेन अध्यक्ष होता है। पहले नियम था कि अगर डीएम गैर-हिंदू हो तो राज्य सरकार किसी हिंदू को अध्यक्ष नियुक्त करेगी। इस प्रावधान को 2013 में हटाकर सभी धर्मों के डीएम को अध्यक्ष बनने की छूट दी गई। बौद्ध भिक्षुओं का सवाल सीधा है अगर यह मंदिर बौद्धों का है, तो संचालन में हिंदुओं का क्या काम?

इतिहास में झांकिए तो मिलेगा दर्द

13वीं शताब्दी में मुस्लिम आक्रमणों के बाद बौद्ध धर्म भारत में लगभग समाप्त हो गया। महाबोधि मंदिर वीरान पड़ा रहा। 1590 में एक हिंदू भिक्षु ने बोधगया मठ की स्थापना की और मंदिर की देखरेख शुरू की। तब से लेकर आज तक मंदिर का प्रबंधन गिरि समुदाय के हाथों में रहा।

अंग्रेजों के समय में जब बौद्ध धर्म के पुनर्जीवन की लहर चली, श्रीलंका और जापान के बौद्ध भिक्षुओं ने आंदोलन चलाया। 1891 में महाबोधि सोसाइटी की स्थापना हुई ताकि मंदिर को वापस बौद्धों को सौंपा जा सके। लेकिन यह संघर्ष तब भी अधूरा रहा। 1949 में भारत की स्वतंत्रता के बाद बिहार सरकार ने BTA कानून लाया, जिसमें बौद्धों को प्रतिनिधित्व तो मिला, लेकिन पूर्ण नियंत्रण नहीं।

राजनीति और धर्म के बीच पिसता न्याय

1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव सरकार ने एक नया कानून लाने की कोशिश की – बोधगया महाविहार विधेयक, जिसमें मंदिर का नियंत्रण पूरी तरह बौद्धों को देने का प्रस्ताव था। परंतु विधेयक पारित नहीं हो सका। इसमें कुछ ऐसे विवादास्पद प्रावधान थे जैसे मूर्ति विसर्जन और हिंदू विवाह पर रोक, जिससे हिन्दू संगठनों में नाराज़गी फैल गई।

स्वामी विवेकानंद गिरि, जो बोधगया मठ के देखरेखकर्ता हैं, उनका कहना है कि यह आंदोलन चुनावी राजनीति से प्रेरित है। वे दावा करते हैं कि जब बौद्ध धर्म पतन की कगार पर था, तब हिंदुओं ने इस मंदिर की रक्षा की। गिरि कहते हैं, "हमने कभी बौद्धों को 'अन्य' नहीं माना, फिर आज वे क्यों हमें बाहर करना चाहते हैं?"

कानून का पेंच और सुप्रीम कोर्ट की चुप्पी

बौद्ध भिक्षु केवल आंदोलन नहीं कर रहे, उन्होंने कानूनी लड़ाई भी शुरू की है। सुप्रीम कोर्ट में BTA को रद्द करने की याचिका दायर की गई है। लेकिन यह मामला वर्षों से सुनवाई के इंतजार में है।

यह मामला 1991 के उपासना स्थल कानून से भी टकराता है, जो कहता है कि 15 अगस्त 1947 के बाद किसी भी पूजा स्थल के धार्मिक स्वरूप को बदला नहीं जा सकता। यानि अगर मंदिर हिंदू प्रबंधन में रहा है, तो उसे बौद्धों को नहीं सौंपा जा सकता। हालांकि इस कानून को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, और भविष्य में फैसला इन याचिकाओं पर निर्भर करेगा।

बौद्ध भिक्षुओं का धैर्य टूट रहा है
दो महीनों से बौद्ध भिक्षु महाबोधि मंदिर के सामने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं। धूप, बारिश और सरकार की अनदेखी के बीच वे वहीं डटे हैं। उनके हाथों में बैनर हैं, आंखों में उम्मीद और मन में आक्रोश। वे कहते हैं, "यह सिर्फ अधिकार की बात नहीं है, यह आत्मसम्मान की बात है।"

सवाल बड़ा है क्या भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में बौद्धों को उनके सबसे पवित्र मंदिर का पूरा अधिकार मिलेगा? क्या कानून उन्हें यह अधिकार देगा या राजनीति इसे बार-बार रोकती रहेगी? क्या हिंदू संगठनों और बौद्ध भिक्षुओं के बीच कोई संवाद होगा या टकराव बढ़ेगा? यह लड़ाई किसी धर्म के खिलाफ नहीं है, यह उस विरासत की वापसी की मांग है जिसे कभी बौद्ध धर्म ने पूरे विश्व को दिया था।

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