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Digvijay Singh और Shivraj Singh का किस्सा-ए-बंगला

Shivraj Singh Chauhan और Digvijay Singh दोनों ऐसे चेहरे हैं जिन्होंने मध्य प्रदेश की राजनीति में बड़ा प्रभाव छोड़ा. एक दूसरे के धुर विरोधी होने के बावजूद दिग्विजय सिंह ने शिवराज के लिए सरकारी बंगला खाली करवा दिया था.

Digvijay Singh और Shivraj Singh का किस्सा-ए-बंगला
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कैफ़ भोपाली के इस शेर के मायने काफी गहरे हैं यानि जिंदगी में लुत्फ़ के लिए इश्क़ ही सब कुछ नहीं होता। कभी कभी थोड़ी मुख़ालिफ़त भी चाहिए। और राजनीति मोहब्बत और मुखालफत को हमेशा जिंदा रखने का बड़ा उदाहरण है।

कुर्सी के लिए नेता क्या क्या नहीं कर जाते। साम, दाम दंड भेद। सत्ता हासिल करने का हर तरीका वाजिब लगता है। मत पाने के लिए मतभेद रखना जरूरी है।लेकिन मनभेद जरूरी नहीं। राजनीति में किसी नैतिकता की कोई जगह नहीं। लेकिन ये अनैतिकता। ये विचारों का विरोध। सिर्फ राजनीतिक मंच तक ही है. जैसे ही इस मंच से नीचे उतरेंगे। आत्मीयता का मजबूत पहलू दिखने लगता है। ऐसे तमाम उदाहरण हैं जब सियासत के बरक्स ऐसे कई मौके आए जब दो धुर विरोधियों ने महत्वाकांक्षा को परे रख आपसी सौहार्द की मिसाल दी। ऐसी ही एक कहानी है राजनीति के दो धुर विरोधियों की। जो मध्य प्रदेश की सत्ता के केंद्र में हमेशा छाए रहे। एक शिवराज सिंह चौहान तो दूसरे हैं दिग्विजय सिंह। दोनों की दोस्ती का आधार बना एक बंगला।


साल था 2000 । जगह थी मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल । एक बंगला दो विरोधी, दो दावेदार 

कहानी शुरू होती है भोपाल के 74 बंगला की एक कोठी से। साल 2003 में मध्यप्रदेश की तत्कालीन कांग्रेस सरकार को मात देने के लिए BJP का कैंपेन परवान चढ़ रहा था। उमा भारती को BJP ने नेता बनाकर तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से कुर्सी छीनने की कमान सौंपी। तैयारी के लिए एक वॉर रूम बनाया गया। जिसे नाम दिया गया ‘जावली’

जावली नाम देने की खास वजह ये थी कि महाराष्ट्र के जावली में छत्रपति शिवाजी महाराज ने औरंगजेब के सेनापति अफजल खान को मारा था। इस वॉर के संदर्भ में उमा भारती ने जहां वॉर रूम बनाया उसे जावली नाम दिया।‘जावली’ एक बंगले के दो रूम में बनाया गया। इस बंगले में 1998 में तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष गौरीशंकर शेजवार रहा करते थे। इसी बंगले के बगल की कोठी में दिग्विजय सिंह के करीबी मंत्री सत्यनारायण शर्मा रहा करते थे। 

साल 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य का गठन हुआ और सत्यनारायण शर्मा राजधानी रायपुर में शिफ्ट हो गए। पीछे रह गया उनका खाली बंगला। जिस पर पक्ष और विपक्ष सभी की निगाहें थीं। इस बंगले को पाने की सक्रियता बढ़ गई।

उस दौरान शिवराज सिंह चौहान विदिशा से सांसद थे। वे जब भी नेता प्रतिपक्ष गौरीशंकर शेजवार के घर जाते तो बगल वाले बंगले पर अपनी दिलचस्पी का जिक्र जरूर करते। जब सत्यनारायण शर्मा के उस बंगले को खाली करने का पता शिवराज को चला तो वे स्पेशली गौरीशंकर के पास पहुंचे। उन्होंने गौरीशंकर से कहा, आप तो नेता प्रतिपक्ष हैं दिग्विजय सिंह से बात कीजिए ना। ये बंगला मेरे नाम अलॉट करवा दीजिए।

शिवराज सिंह के अनुरोध पर गौरीशंकर शेजवार ने दिग्विजय सिंह के सामने उनकी इच्छा रखी। जिस पर दिग्विजय सिंह ने जवाब देते हुए कहा, यह बंगला पहले से ही नगरीय प्रशासन और विकास मंत्री सज्जन सिंह वर्मा को देने का वादा कर चुके हैं। गौरीशंकर शेजवार ने तब भी दिग्विजय सिंह से अपील जारी रखी। जिस पर दिग्विजय सिंह ने उन्हें एक सुझाव दिया।
 
दिग्विजय सिंह ने कहा, अगर शिवराज और सज्जन सिंह वर्मा आपस में बात कर लें शायद बंगला उन्हें मिल जाए। जिस पर गौरीशंकर शेजवार ने फिर कहा, राजा साहब आप ही अपने मंत्री सज्जन वर्मा से बात कर उन्हें कोई दूसरा बंगला आवंटित कर दीजिए।

दिग्विजय सिंह और गौरीशंकर शेजवार सिंह की ये बातचीत वही खत्म हो गई। लेकिन शाम को गौरीशंकर सिंह का फोन बजा, दूसरी तरफ मंत्री सज्जन सिंह वर्मा थे। सज्जन सिंह वर्मा ने गौरीशंकर से कहा, मैं यह बंगला छोड़ रहा हूं आप शिवराज सिंह को बता दीजिए।

वो दिन है और आज का दिन है शिवराज सिंह चौहान का नाता इस बंगले से कभी नहीं टूटा. दिग्विजय सिंह ने बिना बोले शिवराज की इच्छा पूरी कर दी थी. 

CM आवास शिफ्ट होने के बाद भी नहीं छोड़ा बंगला


साल 2005 में शिवराज सिंह चौहान पहली बार मुख्यमंत्री बने। ऐसे में उन्हें बंगला छोड़कर मुख्यमंत्री आवास में शिफ्ट होना था। लेकिन शिवराज सिंह चौहान की पत्नी साधना सिंह इस बंगले को बेहद शुभ मानती थीं। इसलिए वे श्यामला हिल्स में शिफ्ट तो हुईं लेकिन इस बंगले को CM आवास के एनेक्सी के रूप में रखा। बाद में साधना सिंह ने किरार महासभा का कार्यालय भी खोला। उस वक्त साधना सिंह किरार महासभा की अध्यक्ष थीं। 


बंगला बन गया ‘मामा का घर’ 


साल 2023 में शिवराज सिंह के नेतृत्व में BJP ने एक बार फिर राज्य में परचम लहराया। उनकी जीत में सबसे बड़ा रोल महिलाओं का था वे किसी के भाई बन गए तो किसी के मामा। मध्यप्रदेश में मामा यानि शिवराज सिंह चौहान। उम्मीद तो ये ही थी कि मुख्यमंत्री का ताज फिर शिवराज सिंह चौहान के सिर पर सजेगा ।लेकिन BJP ने चौंकाते हुए मोहन यादव को CM बना दिया और लोकसभा के जरिए शिवराज सिंह चौहान को भेज दिया दिल्ली।अब वे केंद्र में कृषि मंत्री हैं।हालांकि शिवराज सिंह चौहान एमपी की महिलाओं के लिए भाई और मामा बने रहे।महिलाओं के इसी लगाव को देखते हुए शिवराज सिंह चौहान ने बंगले को ‘मामा का घर’ नाम दे दिया। अब जब भी शिवराज भोपाल जाते हैं तो इस घर में जरूर जाते हैं।कोई भी उनसे मिलने मामा के घर आ सकता है जनता के लिए शिवराज ने हमेशा इस बंगले के दरवाजे खोले हुए हैं।

तो कुछ ऐसा था मध्यप्रदेश की राजनीति का ये किस्सा। जिसमें दो राजनीतिक विरोधी की मधुरता का आधार एक बंगला बना। बहरहाल ऐसी और भी कहानियां, अनसुने किस्से हम आप तक पहुंचाते रहेंगे।

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