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कौन हैं नील कात्याल, जिन्होंने पूरी दुनिया को दिलाई ट्रंप की टैरिफ 'दादागिरी' से मुक्ति, भारत से क्या है नाता?

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के टैरिफ लगाने के अधिकार को ही खारिज कर दिया और टैरिफ के फैसले को अवैध करार दे दिया. ट्रंप की टैरिफ दादागिरी से पूरी दुनिया को मुक्ति किसी और ने नहीं बल्कि एक भारतीय मूल के वकील ने ही दी है. जाने वो कौन हैं.

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21 Feb 2026
( Updated: 21 Feb 2026
08:25 AM )
कौन हैं नील कात्याल, जिन्होंने पूरी दुनिया को दिलाई ट्रंप की टैरिफ 'दादागिरी' से मुक्ति, भारत से क्या है नाता?
Donald Trump And Neal Katyal (File Photo)
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इकोनॉमिक एजेंडे को बड़ा झटका देते हुए यूनाइटेड स्‍टेट सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उनके ज्यादातर बड़े टैरिफ को रद्द कर दिया. कोर्ट ने कहा कि 1977 के इमरजेंसी कानून के तहत उनके पास भारत समेत दुनिया भर में अमेरिका के व्यापार सहयोग‍ियों पर बड़े आयात शुल्‍क लगाने का अधिकार नहीं है. उनके इस फैसले को चुनौती एक भारतवंशी ने ही दी थी. एक भारतीय मूल के प्रोफेसर ने ही एक तरह से ट्रंप के टैरिफ दादागिरी के खिलाफ मुहिम छेड़ी थी और कोर्ट में चुनौती दी थी. आपको बताएं कि सुप्रीम कोर्ट में ट्रंप के टैरिफ लगाने के अधिकार को ही वकील नील कात्याल ने चुनौती दे दी थी.

नील ने कोर्ट के सामने एक से बढ़कर एक दलील दी, जिसके बाद ट्रंप के टैरिफ लगाने के फैसले को ही रद्द कर दिया गया. इतना ही नहीं कोर्ट ने साफ कर दिया कि ट्रंप या किसी भी राष्ट्रपति के पास IEEPA के तहत टैरिफ लगाने का अधिकार ही वहीं है. ये अधिकार अमेरिकी कांग्रेस के पास है.

नील की वो दलील जिसने खत्म की ट्रंप की दादागिरी!

नील ने अदालत के सामने दलील दी कि कांग्रेस के साप टैरिफ लगाने की शक्ति है, राष्ट्रपति के पास नहीं. वे बस टैरिफ या ट्रेड को रेगुलेट कर सकते हैं. उन्होंने आगे कहा कि अमेरिकी संसद के पास व्यापार को विनियमित करने की शक्ति है. ट्रंप टैरिफ को रेगुलेट करने की शक्ति का मनमाने ढंग से इस्तेमाल नहीं कर सकते. ऐसे में जब कोर्ट ने नील की दलील को मानी तो उनकी पूरी दुनिया में चर्चा होने लगी कि आखिर वो वकील है कौन जिसने ट्रंप की दादागिरी पर रोक लगाई और पूरी दुनिया ने राहत की सांस ली.

कौन हैं नील कात्याल?

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आपको बता दें कि नील कात्याल का जन्म अमेरिका के शिकागो में हुआ था. उनके पैरेंट्स भारतीय मूल के हैं. उनके पिता एक इंजीनियर हैं तो मां डॉक्टर हैं. जानकारी के मुताबिल नील ने डार्टमाउथ कॉलेज और येल लॉ स्कूल से ग्रेजुएशन की डिग्री ली है और फिर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के जज स्टीफन ब्रेयर के लिए क्लर्क का काम किया.

नील कात्याल को अमेरिका में संवैधानिक और जटिल अदालती मामलों का स्पेशलिस्ट माना जाता है. वो फिलहाल मिलबैंक एलएलपी में बतौर पार्टनर जुड़े हुए हैं और Georgetown University Law Center में पॉल सॉन्डर्स प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं. 

बराक ओबामा के साथ काम कर चुके हैं नील!

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इससे पहले वो पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के शासनकाल में अमेरिका के कार्यवाहक सॉलिसिटर जनरल के तौर पर भी काम कर चुके हैं. ओबामा ने उन्हें साल 2010 में कार्यवाहक सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किया था. 

50 से ज्यादा मामलों की पैरवी का इतिहास!

इसे अलावा कात्याल अमेरिका में सुप्रीम कोर्ट और अपीलीय न्यायालयों के सामने संघीय सरकार का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. वहीं कोर्ट में 50 से ज्यादा मामलों की पैरवी का भी कात्याल का इतिहास है. उन्होंने 1965 के वोटिंग राइट्स एक्ट की संवैधानिक वैधता को डिफेंड किया था. 2017 में भी वो ट्रंप के ट्रैवल बैन को चुनौती दे चुके हैं. कात्याल ने मिनेसोटा राज्य में जॉर्ज फ्लॉयड मर्डर केस में विशेष अभियोजक के रूप में भी काम किया.

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कई सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं नील कात्याल!

कात्याल ‘Impeach: The Case Against Donald Trump’ नाम की किताब भी लिख चुके हैं. उनके वर्क रिकॉर्ड और प्रोफेशनलिज्म को देखते हुए उन्हें अमेरिकी न्याय विभाग के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘एडमंड रैंडॉल्फ अवॉर्ड’ से भी नवाजा जा चुका है. वहीं ‘द अमेरिकन लॉयर’ ने उन्हें 2017 और 2023 में ‘लिटिगेटर ऑफ द ईयर’ भी चुना. कात्याल को फोर्ब्स ने 2024 और 2025 में अमेरिका के टॉप 200 वकीलों की लिस्ट में भी शुमार किया था.

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला!

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यह निर्णय एक दुर्लभ उदाहरण है जब रूढ़िवादी नेतृत्व वाली अदालत ने ट्रंप के कार्यकारी अधिकारों के उपयोग पर अंकुश लगाया. पोलिटिको के मुताबिक, अदालत ने 6-3 के फैसले में टैरिफ को रद्द करते हुए इसे ट्रंप के आर्थिक कार्यक्रम के एक प्रमुख हिस्से की बड़ी अस्वीकृति बताया.

 अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने क्या कहा?

चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स ने बहुमत की ओर से लिखते हुए कहा क‍ि राष्ट्रपति एकतरफा तौर पर अनलिमिटेड अमाउंट, ड्यूरेशन और स्कोप के टैरिफ लगाने की बहुत ज्यादा पावर का दावा करते हैं. दावा किए गए अधिकार के दायरे, इतिहास और कॉन्स्टिट्यूशनल कॉन्टेक्स्ट को देखते हुए उन्हें इसका इस्तेमाल करने के लिए साफ कांग्रेसनल ऑथराइजेशन की पहचान करनी चाहिए. रॉबर्ट्स ने जोड़ा कि 1977 का वह कानून, जिस पर ट्रंप ने भरोसा किया, आवश्यक कांग्रेस की स्वीकृति से 'कमतर' है.

द वॉशिंगटन पोस्ट ने रिपोर्ट किया कि न्यायाधीशों ने माना कि 1977 के आपातकालीन आर्थिक शक्तियों के कानून के तहत राष्ट्रपति को लगभग सभी व्यापारिक साझेदार देशों से आयातित वस्तुओं पर व्यापक शुल्क लगाने का अधिकार नहीं था.

ट्रंप की टैरिफ स्ट्रैटेजी को ही लगा झटका!

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द हिल ने अनुसार, अदालत ने शुक्रवार को प्रेसिडेंट ट्रंप के बड़े टैरिफ के बड़े हिस्से को खारिज कर दिया और उनकी इकोनॉमिक स्ट्रैटेजी के एक सिद्धांत को खत्म कर दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि ग्लोबल ट्रेड को फिर से बनाने के लिए इमरजेंसी कानून का उनका इस्तेमाल गैर-कानूनी था.

जजों ने ट्रंप के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट के बड़े इस्तेमाल को खारिज कर दिया, जो 1970 के दशक का एक कानून है जो राष्ट्रपति को 'असामान्य और असाधारण' खतरे वाली राष्ट्रीय आपात स्थितियों में आयात को 'विनियमित' करने की अनुमति देता है.

रॉबर्ट्स के अनुसार, हम अर्थशास्त्र या विदेश नीति के मामलों में कोई विशेष विशेषज्ञता का दावा नहीं करते. हम केवल वही सीमित भूमिका निभाते हैं, जो संविधान के अनुच्छेद III द्वारा हमें सौंपी गई है. उस भूमिका को पूरा करते हुए हम मानते हैं कि इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं देता है.

ट्रंप ने कनाडा, चीन और मेक्सिको सहित कई देशों पर टैरिफ लगाने तथा विश्वभर के दर्जनों व्यापारिक साझेदारों पर तथाकथित पारस्परिक टैरिफ लगाने को उचित ठहराया था. भारत पर ट्रंप ने 18 प्रत‍िशत टैरिफ लगाया है.

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50 साल के इतिहास में IEEPA का इस्तेमाल करने वाले ट्रंप पहले राष्ट्रपति!

द हिल ने बताया कि ट्रंप पहले राष्ट्रपति हैं जिन्होंने इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट के लगभग 50 साल के इतिहास में टैरिफ लगाने की कोशिश की है. स्टील, एल्युमिनियम और कॉपर जैसे क्षेत्रों पर अलग कानूनी प्रावधानों के तहत लगाए गए क्षेत्र-विशिष्ट टैरिफ इस मामले का हिस्सा नहीं थे और वे प्रभावी बने रहेंगे. इस फैसले से कंपनियों द्वारा पहले से चुकाए गए टैरिफ के अरबों डॉलर वसूलने की कोशिशें शुरू होने की उम्मीद है.

द हिल के अनुसार, फैसले से पहले कॉस्टको, टोयोटा ग्रुप के कुछ हिस्सों, रेवलॉन और सैकड़ों दूसरी कंपनियों ने अपने दावों को बचाने के लिए केस फाइल किए थे. हालांकि, यह फैसला प्रशासन के ल‍िए एक बड़ा झटका है, लेकिन एडमिनिस्ट्रेशन के लिए रास्ते बने हुए हैं. कांग्रेस के पास टैरिफ लगाने का कॉन्स्टिट्यूशनल अधिकार है, और प्रेसिडेंट दूसरे मौजूदा कानूनों के तहत ड्यूटी को सही ठहराने की कोशिश कर सकते हैं.

क्या है IEEPA?

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नेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट 1977 में राष्ट्रपति को नेशनल इमरजेंसी के दौरान असाधारण विदेशी खतरों से निपटने का अधिकार देने के लिए लागू किया गया था. पिछले कई दशकों में इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से बड़े पैमाने पर टैरिफ लगाने के बजाय पाबंदियां लगाने के लिए किया गया है, जिससे यह मामला ट्रेड पॉलिसी में एग्जीक्यूटिव पावर का एक अहम टेस्ट बन गया है.

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