×
जिस पर देशकरता है भरोसा
Advertisement

आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया, तंबाकू बैन की तैयारी में सरकार! सालाना 2.5 लाख मौतें, GDP को 1% नुकसान

भारत तंबाकू का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता और उत्पादक देश है. इससे न केवल जान-माल का नुकसान होता है, बल्कि भारी सामाजिक और आर्थिक कीमत भी चुकानी पड़ती है.

Author
09 Feb 2026
( Updated: 09 Feb 2026
03:30 PM )
आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया, तंबाकू बैन की तैयारी में सरकार! सालाना 2.5 लाख मौतें, GDP को 1% नुकसान
तंबाकू पर बैन की तैयारी! (प्रतीकात्मक तस्वीर)
Advertisement

भारत में तंबाकू एक बहुत बड़ी और गंभीर समस्या बन चुका है. रोज़ाना 3,500 से ज्यादा लोगों की मौत तंबाकू से जुड़ी बीमारियों के कारण हो जाती है, जबकि सालाना यह आंकड़ा करीब 2.5 लाख तक पहुंच जाता है. वैश्विक स्तर पर हर साल तंबाकू से लगभग 80 लाख मौतें होती हैं, जिनमें अकेले भारत का हिस्सा करीब 2.5 लाख है. देश में 15 साल से ऊपर की उम्र के करीब 26.7 करोड़ लोग, यानी हर पांचवां भारतीय, किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन करता है. यह सिर्फ स्वास्थ्य का ही नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था का भी बड़ा संकट है.

तंबाकू से कमाई कम, खर्चा ज्यादा!

आर्थिक नजरिए से देखें तो सरकार तंबाकू से जितना राजस्व कमाती है, उससे कहीं ज्यादा पैसा तंबाकू से होने वाली बीमारियों और उसके सामाजिक असर को संभालने में खर्च हो जाता है. आंकड़े बताते हैं कि तंबाकू उत्पादों पर उत्पाद शुल्क के रूप में मिलने वाले हर 100 रुपये पर भारतीय अर्थव्यवस्था को 816 रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है. यही वजह है कि तंबाकू से मिलने वाला टैक्स कभी भी उसके नुकसान की भरपाई नहीं कर पाता.

Advertisement

आर्थिक, जान-माल हर तरह का नुकसान!

2017 और 2018 के बीच 35 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में तंबाकू सेवन से होने वाली बीमारियों और मौतों की कुल आर्थिक लागत 27.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर आंकी गई. वहीं 2016-17 में तंबाकू से मिलने वाला कर राजस्व इस आर्थिक लागत का सिर्फ 12.2 प्रतिशत था. कुल नुकसान में 74 प्रतिशत योगदान धूम्रपान का रहा, जबकि बिना धुएं वाले तंबाकू का हिस्सा 26 प्रतिशत था. इस आर्थिक बोझ का 91 प्रतिशत हिस्सा पुरुषों पर और सिर्फ 9 प्रतिशत महिलाओं पर पड़ा.

तंबाकू उत्पादों से कमाई और खर्च कितनी!

सरकार सिगरेट, बीड़ी, पान-मसाला और अन्य तंबाकू उत्पादों से टैक्स के रूप में सालाना करीब 1,234 करोड़ रुपये कमाती है, लेकिन तंबाकू से होने वाली बीमारियों के इलाज पर सरकार को हर साल करीब 17.71 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करने पड़ते हैं. यह आंकड़ा 2020 के अनुमानों पर आधारित है. नए अनुमानों के मुताबिक यह बोझ बढ़कर 2.4 लाख करोड़ रुपये, यानी लगभग 26.7 बिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है. साफ है कि सरकार की कमाई के मुकाबले खर्च कई गुना ज्यादा है.

Advertisement

रेलवे को भी तंबाकू को भारी खर्चा!

इतना ही नहीं, तंबाकू से जुड़ा खर्च सिर्फ स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है. भारतीय रेलवे को तंबाकू, पान और गुटखा की थूक साफ करने पर हर साल करीब 1,200 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं. इसके बावजूद सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी की समस्या कम होने का नाम नहीं ले रही.

इसका बोझ आम लोगों पर भी पड़ता है. एक तंबाकू उपभोक्ता औसतन सालाना 7 से 8 हजार रुपये सिर्फ तंबाकू पर खर्च करता है. गुटखा खाने वाला व्यक्ति रोजाना 3–4 पाउच खा लेता है और सिगरेट पीने वाला 5–7 सिगरेट रोज पीता है. यह छोटी-छोटी रकम मिलकर सालाना लाखों करोड़ रुपये के खर्च में बदल जाती है, जिसका सही आकलन कर पाना भी मुश्किल है.

Advertisement

कैसर में 70% ओरल कैंसर के मामले!

भारत में कैंसर के कुल मामलों में करीब 70 प्रतिशत ओरल कैंसर के हैं, जिनका सीधा संबंध पान-मसाला और तंबाकू से है. विशेषज्ञ मानते हैं कि तंबाकू चबाना सबसे खतरनाक तरीका है. गली-मोहल्लों, सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर थूक के लाल निशान न सिर्फ गंदगी बढ़ाते हैं, बल्कि उनकी सफाई पर स्थानीय निकायों और सरकारी दफ्तरों को भारी खर्च उठाना पड़ता है. कुल मिलाकर तंबाकू से अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला बोझ उसके राजस्व से कहीं ज्यादा है.

26 करोड़ से ज्यादा लोग तंबाकू के आदी

आमतौर पर यह कहा जाता है कि सरकार को सिगरेट, बीड़ी और गुटखा से करीब 50,000 से 60,000 करोड़ रुपये का राजस्व मिलता है, जिसमें जीएसटी, एक्साइज ड्यूटी और सेस शामिल हैं. लेकिन अगर यह देखा जाए कि 26 करोड़ से ज्यादा लोग तंबाकू का सेवन करते हैं और एक व्यक्ति रोजाना सिर्फ 30 रुपये भी खर्च करे, तो सालाना खरीद 28 अरब रुपये से ज्यादा हो जाती है. भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तंबाकू उपभोक्ता देश है, लेकिन इस बिक्री से मिलने वाला टैक्स स्वास्थ्य पर पड़ने वाले खर्च को कवर नहीं कर पाता.

तंबाकू उद्योग लॉबी काफी मजबूत!

Advertisement

यह भी समझना जरूरी है कि तंबाकू उद्योग का राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव काफी मजबूत है. यही वजह है कि इसे पूरी तरह रोकने के लिए न तो सख्त कानून बन पाते हैं और न ही बड़ा जनविरोध खड़ा हो पाता है. अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि अगर बैन लगाया गया तो ब्लैक मार्केटिंग बढ़ जाएगी.

तंबाकू पर शिकंजा कसने की कोशिश नाकाम!

सरकार ने टैक्स के जरिए तंबाकू पर शिकंजा कसने की कोशिश जरूर की है. 2023 से पान-मसाला पर जीएसटी कम्पनसेशन सेस 51 प्रतिशत तक पहुंच गया, जो रिटेल प्राइस का करीब 135 प्रतिशत है. तंबाकू पर कुल टैक्स बोझ 290 प्रतिशत तक पहुंच चुका है, जो 28 प्रतिशत जीएसटी से कहीं ज्यादा है. उदाहरण के तौर पर, अगर किसी पान-मसाला पाउच की एमआरपी 10 रुपये है, तो उस पर करीब 6 रुपये टैक्स के रूप में देना पड़ता है, यानी लगभग 60 प्रतिशत टैक्स बोझ.

अब सरकार ने एक नया कदम उठाया है, जिसे Health Security से National Security Cess कहा गया है. इसके तहत सिगरेट और तंबाकू उत्पादों की कीमतों में और बढ़ोतरी की गई है. जहां पहले 100 रुपये का सिगरेट पैकेट मिलता था, अब उसकी कीमत 120 से 185 रुपये तक हो सकती है. इसका सीधा असर तंबाकू की खपत पर पड़ेगा और उम्मीद है कि इससे बीमारियों पर होने वाला खर्च धीरे-धीरे कम होगा.

तंबाकू पर नियंत्रण के लिए बने कई कानून!

Advertisement

सरकार पहले भी तंबाकू पर नियंत्रण के लिए कई कानून ला चुकी है. COTPA Act 2003 के तहत सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान पर रोक है, जुर्माना और जेल तक का प्रावधान है. शैक्षणिक संस्थानों के 100 गज के भीतर तंबाकू बिक्री प्रतिबंधित है और 18 साल से कम उम्र वालों को तंबाकू बेचना गैरकानूनी है. केबल टीवी नेटवर्क एक्ट 1994 के तहत तंबाकू के विज्ञापनों पर बैन है, हालांकि अब इलायची जैसे नामों से इसका प्रमोशन होता है. 2013 में कई राज्यों में गुटखा बैन हुआ, लेकिन मांग और आपूर्ति पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी.

सुप्रीम कोर्ट ने भी 2023 में तंबाकू पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था, “क्या आप अमृत बेच रहे हैं?” कोर्ट ने न्यूजीलैंड, भूटान, ब्रिटेन, कनाडा और स्वीडन जैसे देशों का उदाहरण देते हुए बताया था कि तंबाकू पर सख्त नीति कैसे लागू की जा सकती है. अगर ये देश कर सकते हैं, तो भारत भी कर सकता है.

इसी दिशा में Health Security से National Security Cess Bill, 2025 लाया गया, जो दिसंबर 2025 में संसद से पास हुआ और 1 फरवरी 2026 से लागू हो गया. इस सेस से मिलने वाला अतिरिक्त पैसा सीधे रक्षा आधुनिकीकरण फंड में जाएगा, जिससे हथियार, तकनीक और सेना की ताकत बढ़ाई जाएगी.

2026-27 के बजट में रक्षा मंत्रालय को 7.85 लाख करोड़ रुपये मिले हैं, जो पिछले साल के मुकाबले 15.19 प्रतिशत ज्यादा है. कैपिटल एक्सपेंडिचर और डीआरडीओ के बजट में भी बढ़ोतरी की गई है. सरकार का तर्क है कि तंबाकू पर बढ़ा टैक्स एक तरह का Pigovian Tax है, यानी हानिकारक आदतों पर टैक्स लगाकर समाज और देश दोनों को फायदा पहुंचाना.

Advertisement

यह भी पढ़ें

कुल मिलाकर साफ है कि तंबाकू से होने वाला नुकसान उसकी कमाई से कई गुना ज्यादा है. अगर खपत कम होती है, तो बीमारियां और मौतें घटेंगी, स्वास्थ्य पर बोझ कम होगा और बिना आम करदाताओं पर दबाव डाले देश की सुरक्षा और भविष्य को मजबूत किया जा सकेगा. अब सवाल सिर्फ इतना है कि इस दिशा में कदम कितनी मजबूती और ईमानदारी से आगे बढ़ाए जाते हैं.

Tags

Advertisement
टिप्पणियाँ 0
LIVE
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Close
ADVERTISEMENT
NewsNMF
NMF App
Download
शॉर्ट्स
वेब स्टोरीज़
होम वीडियो खोजें