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सेवा तीर्थ का ड्रेस कोड? PM मोदी के सामने एक जैसी गुलाबी कोटी में क्यों नजर आई नौकरशाही, वजह दूरगामी हैं!

पीएम मोदी के सेवा तीर्थ के उद्घाटन के वक्त सारे बड़े अधिकारी एक जैसी कोटी में नजर आए. अब सवाल ये उठता है कि क्या पीएम के ऑफिस में ड्रेस कोड लागू किया जाएगा. एक जैसी गुलाबी खादी कोटी के जरिए PM किसे और क्या संदेश देने जा रहे हैं.

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14 Feb 2026
( Updated: 14 Feb 2026
10:11 AM )
सेवा तीर्थ का ड्रेस कोड? PM मोदी के सामने एक जैसी गुलाबी कोटी में क्यों नजर आई नौकरशाही, वजह दूरगामी हैं!
PM Modi Seva Teerth / X
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13 फरवरी 2026 भारत की राजनीति के लिहाज से इतिहास में दर्ज हो गया. इसी दिन दशकों तक सत्ता के केंद्र माने जाने वाले साउथ ब्लॉक स्थित पीएमओ को सेंट्रल विस्टा के तहत तैयार किए गए प्रधानमंत्री के नए कार्यालय परिसर ‘सेवा तीर्थ’ में शिफ्ट कर दिया गया. यह महज दो दफ्तरों की शिफ्टिंग या फाइलों के इधर-उधर जाने की घटना नहीं थी, बल्कि लेफ्ट, कांग्रेस और वेस्टर्न माइंडसेट वाले इकोसिस्टम से दूरी बनाने के संकेत के रूप में भी देखा गया. हालांकि यहां चर्चा सिर्फ पीएम मोदी के नए कार्यालय की नहीं, बल्कि सेवा तीर्थ से सामने आई उस तस्वीर की है, जिसने राजनीतिक हलकों में कई अर्थ पैदा किए. देखने में यह एक सामान्य तस्वीर लग सकती है, लेकिन उसका संदेश दूरगामी है.

कहा जाता है कि एक तस्वीर हजार शब्दों के बराबर होती है. एक फ्रेम पूरी कहानी, पूरा इतिहास और पूरा संदेश कहने की क्षमता रखता है. ऐसी ही एक तस्वीर के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने नेतृत्व, अथॉरिटी, स्वदेशी विचार और सेवा तीर्थ के निर्माण के उद्देश्य का स्पष्ट खाका प्रस्तुत किया. कर्तव्य पथ स्थित नए ‘सेवा तीर्थ’ परिसर का उद्घाटन कर प्रधानमंत्री कार्यालय को साउथ ब्लॉक से स्थानांतरित करना पहली नजर में प्रशासनिक पुनर्संरचना लग सकता है, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से इसमें गहरे निहितार्थ हैं. पहले राजपथ का कर्तव्य पथ, साउथ ब्लॉक का सेवा तीर्थ, राजभवन का लोकभवन, प्रधानमंत्री के बजाय ‘प्रधान सेवक’ और ‘नागरिक देवो भव’ जैसे प्रयोग केवल शब्दों का बदलाव नहीं, बल्कि सोच का परिवर्तन दर्शाते हैं.

PM मोदी के सामने एक ही रंग की कोटी में क्यों नजर आई ब्यूरोक्रेसी!

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उद्घाटन समारोह के दौरान पीएमओ के ड्रेस कोड ने सबका ध्यान खींचा. प्रधानमंत्री कार्यालय के शीर्ष अधिकारी, प्रधान सचिव पी.के. मिश्रा, प्रधान सचिव-2 शक्तिकांत दास, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी, एक जैसी हल्की गुलाबी रंग की जैकेट, जिसे आमतौर पर ‘मोदी कोटी’ कहा जाता है, पहने नजर आए. यह दृश्य स्वतःस्फूर्त नहीं, बल्कि सुनियोजित राजनीतिक संदेश का हिस्सा माना गया. जब प्रधानमंत्री फाइल पर हस्ताक्षर कर रहे थे, तब सभी अधिकारी उनके सामने खड़े या बैठे दिखाई दिए. सभी अधिकारियों ने एक समान कोटी पहनी थी, जबकि प्रधानमंत्री मोदी और केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह अलग रंग के ब्लेजर में नजर आए.

क्या PMO में होगी ड्रेस कोड?

इस दृश्य ने स्पष्ट संकेत दिया कि सत्ता का केंद्र प्रधानमंत्री हैं. सरकार उनकी है तो अंतिम निर्णय का अधिकार भी उन्हीं के पास है, न कि ब्यूरोक्रेसी के पास. तस्वीर ने यह संदेश दिया कि बाबूशाही जनप्रतिनिधियों के अधीन है. इसे भारतीय लोकतंत्र की शक्ति के रूप में भी प्रस्तुत किया गया कि कोई अधिकारी निर्वाचित नेतृत्व को निर्देशित नहीं कर सकता. इस फ्रेम ने पीएमओ में प्रधानमंत्री की अथॉरिटी को रेखांकित किया कि संचालन का केंद्र राजनीतिक नेतृत्व है, न कि कोई बाहरी शक्ति. अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में ब्रजेश मिश्रा की भूमिका या मनमोहन सिंह के समय एनएसी और 10 जनपथ के प्रभाव जैसी चर्चाओं की पृष्ठभूमि में इस दृश्य को अलग संदर्भ में देखा गया.

PM मोदी खींच दी लक्ष्मण रेखा!

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अब प्रश्न यह उठता है कि एक समान ड्रेस कोड और नए कार्यालय के जरिए मोदी सरकार क्या संदेश देना चाहती है. लंबे समय से आरोप लगाए जाते रहे हैं कि सत्ता भले बदली हो, लेकिन सिस्टम पर पुरानी विचारधाराओं का प्रभाव कायम है. इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो नियुक्तियों से लेकर संस्थागत ढांचे तक, व्यापक पुनर्निर्माण का प्रयास दिखाई देता है. सेंट्रल विस्टा परियोजना के तहत सेंट्रल सेक्रेटेरिएट, कैबिनेट सचिवालय, पीएमओ और संसद भवन जैसे संस्थानों का नए स्वरूप में निर्माण स्वतंत्र भारत की प्रशासनिक पहचान को नए सिरे से परिभाषित करने का प्रयास माना जा रहा है.

साउथ ब्लॉक, जो 1931 में ब्रिटिश राज के दौरान निर्मित हुआ था, से बाहर आना केवल स्थान परिवर्तन नहीं बल्कि औपनिवेशिक विरासत से प्रतीकात्मक दूरी भी है. प्रधानमंत्री मोदी लंबे समय से ‘गुलामी की मानसिकता’ से मुक्ति की बात करते रहे हैं. ऐसे में नई इमारत, नया नाम और नई प्रशासनिक संरचना मिलकर ‘नए भारत’ के राजनीतिक नैरेटिव को मजबूती देती हैं. पश्चिमी ब्लेजर के बजाय भारतीय परिधान में अधिकारियों की उपस्थिति को स्वदेशी और भारतीय सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखा गया.

वेस्टर्न ब्लेजर नहीं स्वदेशी खादी कोटी!

जब सरकार का मुखिया स्वयं स्वदेशी परिधान और खादी कोटी को प्राथमिकता देता है, तो पूरी प्रशासनिक मशीनरी भी उसी दिशा में प्रेरित होती है. ऐसे में नए कार्यालय में अधिकारियों का एक समान स्वदेशी कोटी में आना अनौपचारिक रूप से एक ड्रेस कोड जैसा संदेश देता है. यह न केवल स्वदेशी को बढ़ावा देने का संकेत है, बल्कि भारतीय सोच और कार्यसंस्कृति की ओर झुकाव भी दर्शाता है.

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राजनीतिक संदेश की कई परतें स्पष्ट हैं. पहली, शीर्ष नौकरशाही को एक रंग और एक फ्रेम में दिखाकर यह संदेश देना कि सत्ता तंत्र समन्वित, अनुशासित और स्पष्ट चेन ऑफ कमांड के तहत कार्य कर रहा है. दूसरी, जब अधिकारी एक यूनिफॉर्म में और नेता अलग परिधान में दिखाई दें, तो सत्ता संरचना में ‘कौन किस भूमिका में है’ यह स्पष्ट हो जाता है. तीसरी, सूट-टाई वाली ‘साहिब’ छवि से हटकर भारतीय शैली की हाफ जैकेट अपनाना शासन को मालिक नहीं बल्कि ‘सेवक’ की छवि में प्रस्तुत करने का प्रयास है. यह विजुअल पॉलिटिक्स का उदाहरण है, जहां परिधान भी संदेश बन जाता है.

भारतीय प्रशासनिक सेवा की पारंपरिक छवि लंबे समय से औपचारिक, दूरी बनाए रखने वाली और ‘बाबू साहब’ संस्कृति से जुड़ी रही है. गुलाबी हाफ जैकेट में शीर्ष अधिकारियों की उपस्थिति अपेक्षाकृत सहज और भारतीय परिधान में दिखी. विश्लेषकों के अनुसार, यह बाबूगिरी से सेवकत्व की ओर शिफ्ट का प्रतीक है—एक ऐसा नैरेटिव जिसमें नौकरशाही को ‘जनसेवक’ के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है और उन्हें उनके मूल दायित्व की याद दिलाई जा रही है.

‘सेवा तीर्थ’ से गणेश पूजा के साथ कार्य का श्रीगणेस, संदेश दूरगामी!

‘सेवा तीर्थ’ नाम स्वयं में सरकार और पार्टी की छवि 'पार्टी विद डिफरेंस’ की अगली कड़ी के रूप में देखा जा रहा है. तीर्थ शब्द धार्मिक-सांस्कृतिक भावनाओं से जुड़ा है, जबकि सेवा शब्द लोक-कल्याण की भावना को व्यक्त करता है. दोनों को जोड़कर शासन की नैतिक जवाबदेही और नागरिक-केंद्रित दृष्टिकोण को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है.

उद्घाटन के दिन दुर्घटना पीड़ितों के लिए राहत योजना, ‘लखपति दीदी’ पहल के विस्तार और किसानों, महिलाओं तथा युवाओं से जुड़े प्रस्तावों की घोषणा ने इस ब्रांडिंग को नीति से जोड़ने का प्रयास किया. सेवा तीर्थ परिसर में पीएमओ, कैबिनेट सचिवालय और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय को एक ही छत के नीचे लाना प्रशासनिक दक्षता का कदम बताया गया, वहीं राजनीतिक विश्लेषक इसे निर्णय-प्रक्रिया के केंद्रीकरण के रूप में भी देखते हैं.

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नई इमारत, नया नाम, नया ड्रेस कोड और नई दृश्य भाषा ये सभी मिलकर एक व्यापक राजनीतिक संदेश प्रस्तुत करते हैं. इसे औपनिवेशिक अतीत से आगे बढ़ते आत्मविश्वासी और स्वदेशी पहचान वाले शासन मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया गया है.

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कुल मिलाकर, सेवा तीर्थ केवल एक भवन या कार्यालय नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतीकों की प्रयोगशाला के रूप में उभरा है. गुलाबी जैकेट्स का वह दृश्य एक छोटे ड्रेस कोड से कहीं अधिक था यह शासन शैली, नेतृत्व की केंद्रीयता और नौकरशाही की नई छवि को एक फ्रेम में पिरोने का प्रयास था. प्रशासनिक बदलाव के साथ-साथ यह राजनीतिक संदेश भी था, जिसमें सेवा का नैरेटिव, नेतृत्व की भूमिका और विजुअल मैसेजिंग मिलकर एक नए दौर की कहानी प्रस्तुत करते हैं.

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