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कभी 'पूर्व का पेरिस' कहे जाने वाला लेबनान, कैसे ईसाई-बहुल देश से बना मुस्लिम देश

लेबनान कभी एक ईसाई-बहुल देश था, जिसे इसकी राजधानी बेरूत के लिए "पूर्व का पेरिस" कहा जाता था। 20वीं सदी के मध्य तक लेबनान मिडिल ईस्ट में व्यापार और सांस्कृतिक केंद्र था। इसकी विविधता और राजनीतिक संतुलन ईसाइयों के प्रभुत्व को दर्शाते थे। लेकिन 1970 के दशक में शुरू हुए गृहयुद्ध और फिलिस्तीनी शरणार्थियों के आने के बाद धार्मिक समीकरण बदलने लगे। ईसाइयों का पलायन और मुस्लिम समुदाय की वृद्धि ने लेबनान को मुस्लिम-बहुल देश बना दिया।

कभी 'पूर्व का पेरिस' कहे जाने वाला लेबनान, कैसे ईसाई-बहुल देश से बना मुस्लिम देश
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लेबनान का इतिहास बेहद जटिल और उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। 20वीं सदी के मध्य में लेबनान एक ईसाई-बहुल देश था, जहां लगभग 70% आबादी ईसाई थी और 30% मुस्लिम। 1970 तक, यह मिडिल ईस्ट का एकमात्र गैर-मुस्लिम देश था, और इसकी राजधानी बेरूत को "पूर्व का पेरिस" कहा जाता था। यहां व्यापार की दृष्टि से बड़ी समृद्धि थी, क्योंकि अफ्रीका, एशिया, और यूरोप के व्यापारी बेरूत में आते थे, और विभिन्न धर्मों के लोग यहां स्वतंत्र रूप से अपनी धार्मिक गतिविधियां करते थे। लेकिन फिर ऐसा यहां क्या हुआ जो आज लेबनान एक इस्लामिक मुल्क है. जानें, कुछ ही सालों में यहां क्या क्या बदला।

यह बात साल 1943 की है जब लेबनान में राष्ट्रीय समझौते (National Pact) के तहत राजनीतिक व्यवस्था को धार्मिक आधार पर बांटा गया था। देश के उच्चतम पद, जैसे राष्ट्रपति (जो ईसाई होना चाहिए), प्रधानमंत्री (सुन्नी मुस्लिम), और संसद अध्यक्ष (शिया मुस्लिम) इन धार्मिक समुदायों के बीच बंटे हुए थे। इस व्यवस्था का आधार 1932 की जनगणना पर रखा गया था, जिसमें 60% से अधिक आबादी ईसाई थी और बाकी मुस्लिम व अन्य धर्मों के लोग थे। यह समझौता कुछ समय तक शांति बनाए रखने में सफल रहा।  लेकिन 1960 के दशक के बाद लेबनान की जनसंख्या में तेजी से बदलाव आया। मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या बढ़ने लगी, और कई ईसाई पश्चिमी देशों की ओर पलायन करने लगे। यह परिवर्तन धार्मिक तनाव का कारण बना, क्योंकि मुस्लिम समुदाय ने राजनीतिक हिस्सेदारी की मांग बढ़ा दी। इस दौर में कई ईसाइयों ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया, जिससे धार्मिक समीकरण और असंतुलित हो गए।
बेरूत: 'पूर्व का पेरिस'
हांलाकि इस बीच लेबनान अफ्रीका, एशिया, और यूरोप के बीच व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था। जिसकी राजधानी बेरूत, को "पूर्व का पेरिस" भी कहा जाता था, अंतर्राष्ट्रीय व्यापारियों के लिए एक आकर्षण केंद्र था। यहां व्यापारियों को धार्मिक स्वतंत्रता का लाभ था, जहां वे बेधड़क अपना व्यवसाय कर सकते थे। व्यापारिक दृष्टि से इसे एक प्रमुख बंदरगाह के रूप में जाना जाता था,यहां की रणनीतिक स्थिति इसे व्यापारियों के लिए एक आसान रास्ता बनाती थी। इसके बाजारों में भारतीय मसाले, यूरोप के कपड़े, और अफ्रीकी वस्त्रों की भरमार होती थी। इस व्यापारिक समृद्धि के चलते लेबनान की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ी, और बेरूत वित्तीय और सांस्कृतिक केंद्र बन गया। 1960 और 1970 के दशक में भी लेबनान की अर्थव्यवस्था बेहद तेजी से बढ़ रही थी।

लेकिन इस बीच ही लेबनान में आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता भी बढ़ी, जिसमें धार्मिक संघर्ष और बाहरी शक्तियों का हस्तक्षेप होने लगा। बावजूद इसके यहाँ का बैंकिंग सेक्टर तब तक भी मजबूत था, जिससे इसे "स्विस बैंकिंग" के विकल्प के रूप में देखा जाता था। लेकिन 1975 में जब लेबनान में सिविल वॉर शुरू हुई तो लेबनान की अर्थव्यवस्था में गिरावट आई। व्यापार के केंद्र से चरमपंथी गतिविधियों का केंद्र बन जाने से लेबनान की आर्थिक स्थिति बहुत प्रभावित हुई।
कहते है इस वॉर में ईसाई और मुस्लिम गुट आमने-सामने आ गए थे। और इसी बीच फिलिस्तीनी शरणार्थियों की बढ़ती संख्या और इजरायल के हमलों ने इस संघर्ष को और भी जटिल बना दिया। इस युद्ध में सीरिया, इराक, और इजरायल जैसे देशों ने भी हस्तक्षेप किया, जिससे यह सिर्फ एक घरेलू संघर्ष न रहकर एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गया। इस बीच हिजबुल्लाह और अन्य चरमपंथी गुटों का उदय हुआ, जिन्होंने मुस्लिम बहुल इलाकों में अपना प्रभुत्व स्थापित किया।

कहते है यह युद्ध 1990 में ताएफ एग्रीमेंट के साथ खत्म हुआ था, जिसमें देश की सत्ता को धार्मिक आधार पर फिर से बांटा गया। राष्ट्रपति पद ईसाइयों के लिए और प्रधानमंत्री पद सुन्नी मुस्लिम के लिए आरक्षित कर दिया गया। हालांकि इस बार मुस्लिम समुदाय को अधिक राजनीतिक हिस्सेदारी दी गई, जिससे देश के भीतर का असंतुलन कम हुआ। सिविल वॉर और पलायन के चलते लेबनान की धार्मिक जनसंख्या में बड़ा बदलाव आया। बड़ी संख्या में मुस्लिम शरणार्थियों ने देश में प्रवेश किया और बस गए, जिससे लेबनान की राजनीति में मुस्लिम समुदाय का वर्चस्व स्थापित हो गया। ईसाइयों की घटती संख्या और बढ़ते मुस्लिम प्रभाव के कारण देश की धार्मिक और राजनीतिक स्थिति एकदम बदल गई है।

इस गृहयुद्ध में हिजबुल्लाह जैसे चरमपंथी समूहों का उदय हुआ, जिसने ईसाइयों और यहूदियों के प्रति घृणा फैलाने का काम किया। हिजबुल्लाह को इरान और सीरिया से समर्थन मिला, और वह लेबनान के राजनीतिक परिदृश्य पर हावी हो गया। समय के साथ लेबनान की राजनीतिक स्थिति और बिगड़ती गई, और ईसाई समुदाय का प्रभाव धीरे-धीरे कम होता चला गया। आज, लेबनान एक मुस्लिम-बहुल देश बन चुका है, जहां शिया और सुन्नी मुस्लिम समुदायों का प्रभुत्व है।

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