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झारखंड के पूर्व मंत्री एनोस एक्का और पत्नी मेनन को सात साल की सजा, आदिवासी जमीन घोटाले में बड़ा फैसला

रांची की सीबीआई विशेष अदालत ने झारखंड के पूर्व मंत्री एनोस एक्का और उनकी पत्नी मेनन एक्का को अवैध भूमि अधिग्रहण मामले में सात-सात साल की सश्रम कैद और एक-एक लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई. जुर्माना न भरने पर एक साल अतिरिक्त कैद होगी. मामला छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी एक्ट) के उल्लंघन से जुड़ा है.

झारखंड के पूर्व मंत्री एनोस एक्का और पत्नी मेनन को सात साल की सजा, आदिवासी जमीन घोटाले में बड़ा फैसला
Former minister Enos Ekka (File Photo)
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रांची की सीबीआई विशेष अदालत ने शनिवार, 30 अगस्त को एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने पूरे झारखंड की सियासत और समाज को हिला दिया. अदालत ने झारखंड के पूर्व मंत्री एनोस एक्का और उनकी पत्नी मेनन एक्का को अवैध भूमि अधिग्रहण के मामले में सात-सात साल सश्रम कारावास की सजा सुनाई. साथ ही दोनों पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया. अदालत ने साफ कहा कि यदि जुर्माना नहीं भरा गया तो एक साल की अतिरिक्त कैद भुगतनी होगी.

दरअसल, यह फैसला छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम यानी सीएनटी एक्ट के उल्लंघन से जुड़े मामले में आया है. सीएनटी एक्ट झारखंड की पहचान और आदिवासी जमीन की सुरक्षा से जुड़ा सबसे बड़ा कानून माना जाता है. इसलिए इस मामले का असर सिर्फ अदालत कक्ष तक सीमित नहीं है बल्कि आदिवासी समुदाय और झारखंड की राजनीति पर भी गहरा पड़ने वाला है.

अन्य दोषियों को भी सजा

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इस मामले में सिर्फ एनोस एक्का और उनकी पत्नी ही नहीं बल्कि कई अन्य लोगों को भी दोषी करार दिया गया. अदालत ने रांची के पूर्व भूमि सुधार उपायुक्त (एलआरडीसी) कार्तिक प्रभात सहित दो अन्य आरोपी मणिलाल महतो और ब्रजेश्वर महतो को पांच-पांच साल सश्रम कारावास की सजा सुनाई. इसके अलावा पांच अन्य दोषियों- राज किशोर सिंह, फिरोज अख्तर, बृजेश मिश्रा, अनिल कुमार और परशुराम करकेट्टा को चार-चार साल की कैद दी गई. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जुर्माना न देने की स्थिति में सभी को अतिरिक्त सजा भुगतनी होगी.

आखिर मामला क्या है?

एनोस एक्का पर आरोप था कि मंत्री रहते हुए उन्होंने सीएनटी एक्ट का खुला उल्लंघन किया. आरोपों के अनुसार उन्होंने आदिवासी जमीन खरीदने के लिए फर्जी पते का इस्तेमाल किया और कुछ प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत से अवैध सौदे किए. मामले की जांच में सामने आया कि हिनू में 22 कट्ठा, ओरमांझी में 12 एकड़, नगरी में चार एकड़ और चुटिया के सिरम टोली मौजा में नौ डिसमिल जमीन मेनन एक्का के नाम पर खरीदी गई थी. ये सौदे मार्च 2006 से मई 2008 के बीच हुए थे. यह पूरा खेल सत्ता और प्रभाव का इस्तेमाल कर कानून की अनदेखी के जरिए किया गया था.

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क्या है सीएनटी एक्ट

छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम यानी सीएनटी एक्ट झारखंड की पहचान से गहराई से जुड़ा हुआ है. यह कानून ब्रिटिश काल से लागू है और इसका मकसद आदिवासी समुदायों की जमीन को बाहरी लोगों या अवैध कब्जाधारियों से बचाना है. इस एक्ट के तहत आदिवासी जमीन को गैर-आदिवासी किसी भी सूरत में नहीं खरीद सकते. विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला आने वाले समय में अवैध भूमि अधिग्रहण की प्रवृत्ति पर रोक लगाने का काम करेगा. अदालत का सख्त रुख यह संदेश देता है कि चाहे कोई कितना भी बड़ा नेता या अधिकारी क्यों न हो, आदिवासी अधिकारों और जमीन की सुरक्षा से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

राजनीतिक और सामाजिक असर

झारखंड की राजनीति में एनोस एक्का कभी प्रभावशाली चेहरा रहे हैं. मंत्री रहते हुए उन्होंने राज्य में मजबूत पकड़ बनाई थी. लेकिन इस मामले में दोषी साबित होने के बाद उनकी राजनीतिक साख पूरी तरह गिर चुकी है. आदिवासी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अदालत के फैसले का स्वागत किया है. उनका कहना है कि लंबे समय से आदिवासी जमीन पर दबंगों और नेताओं द्वारा अवैध कब्जे की शिकायतें मिलती रही हैं. अब यह फैसला एक नजीर बनेगा और आगे किसी को इस तरह की हरकत करने से पहले सौ बार सोचना पड़ेगा.

अदालत का संदेश

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सीबीआई की विशेष अदालत का यह फैसला सिर्फ एक सजा भर नहीं है. यह एक चेतावनी है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है. अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि सीएनटी एक्ट का उल्लंघन किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. इस फैसले ने झारखंड में आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक मजबूत आधार तैयार किया है. साथ ही यह राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था को भी आईना दिखाता है कि अब भ्रष्टाचार और अवैध सौदों पर अंकुश लगाने का समय आ गया है.

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बता दें कि एनोस एक्का और उनकी पत्नी मेनन एक्का को मिली सजा झारखंड की राजनीति और समाज के लिए बड़ा सबक है. यह फैसला बताता है कि सत्ता और पद का दुरुपयोग करके आदिवासी जमीन को हड़पने वालों के खिलाफ कड़ा कदम उठाया जाएगा. इस सजा ने यह भी साबित कर दिया है कि आदिवासी जमीन केवल एक संपत्ति नहीं बल्कि उनकी पहचान, संस्कृति और अस्तित्व से जुड़ी हुई है. अदालत का यह ऐतिहासिक फैसला आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाएगा कि न्याय देर से सही लेकिन मिलता जरूर है.

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