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दुनिया के हर मुद्दे पर बिन मांगी राय देने वाले ट्रंप की पुतिन के सामने नहीं खुली जुबान, 3 मिनट में लगे हांफने, देखने वाला था नजारा!

अलास्का में डोनाल्ड ट्रंप और व्लादिमीर पुतिन की मुलाक़ात पर दुनिया की नजरें टिकी रहीं. हालांकि किसी समझौते पर सहमति नहीं बनी. प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रंप सिर्फ 3.3 मिनट बोले, जिससे कई सवाल खड़े हो गए.

दुनिया के हर मुद्दे पर बिन मांगी राय देने वाले ट्रंप की पुतिन के सामने नहीं खुली जुबान, 3 मिनट में लगे हांफने, देखने वाला था नजारा!
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अलास्का के एंकरेज शहर में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बहुप्रतीक्षित मुलाक़ात हुई. इस बैठक पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी थीं. कूटनीतिक हलकों में उम्मीद थी कि रूस–यूक्रेन युद्ध को लेकर कोई ठोस दिशा तय होगी. लेकिन तीन घंटे चली इस बैठक का नतीजा बहुत सीमित रहा. दोनों नेताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बातचीत को सकारात्मक बताया, मगर किसी ठोस डील या समझौते पर सहमति नहीं बन पाई. यही कारण है कि इस समिट को लेकर अब नए सवाल उठ रहे हैं.

प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रंप की चुप्पी

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप अक्सर अपनी प्रेस वार्ताओं में मुखर रहते हैं. अन्य देशों के नेताओं के साथ मुलाक़ात के बाद वे मीडिया के सवालों के विस्तृत जवाब देते हैं और कभी-कभी सामने वाले से ज़्यादा बोलते भी हैं. लेकिन इस बार तस्वीर बिल्कुल उलट दिखी. अलास्का समिट के बाद हुई प्रेस वार्ता केवल 12 मिनट चली. हैरानी की बात यह रही कि इनमें से ट्रंप ने सिर्फ 3.3 मिनट ही बोला. बाक़ी समय पुतिन ने अपनी बात रखी. यह पहली बार था जब अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से इतना कम वक्त बोलना देखा गया. इसी कारण सवाल उठने लगे कि क्या पुतिन के सामने ट्रंप अपनी मर्ज़ी से बोलने में सक्षम नहीं रहे या फिर उन्होंने जानबूझकर चुप्पी साधी.

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समझौते का जिक्र 

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने प्रेस वार्ता में कहा कि उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ एक समझौते पर सहमति जताई है. हालांकि उन्होंने यह साफ नहीं किया कि समझौता किस मुद्दे पर है और उसकी शर्तें क्या होंगी. यही स्थिति ट्रंप की तरफ से भी रही. उन्होंने भी यह कहकर बात टाल दी कि “जब तक किसी डील पर औपचारिक हस्ताक्षर नहीं होते, तब तक वह डील नहीं होती.” यह अस्पष्टता मीडिया और कूटनीतिक हलकों के लिए सबसे बड़ा रहस्य बन गई है. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि दोनों देशों के बीच कुछ बिंदुओं पर शुरुआती सहमति बनी होगी, लेकिन अभी उसे सार्वजनिक करने की स्थिति में नहीं हैं.

पुतिन का संदेश

पुतिन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ किया कि रूस यूक्रेन की सुरक्षा सुनिश्चित करने के पक्ष में है. उन्होंने कहा कि युद्ध को समाप्त करने की प्रक्रिया में कीव के नेता बाधा न डालें. उन्होंने यह भी कहा कि युद्ध की जड़ों को खत्म करना ज़रूरी है, वरना हर समझौता अधूरा ही रहेगा.  पुतिन का यह बयान उनके पुराने रुख की ही पुनरावृत्ति माना जा रहा है. रूस लगातार कहता रहा है कि यूक्रेन की नाटो में शामिल होने की महत्वाकांक्षा छोड़नी होगी और उन क्षेत्रों को रूस का हिस्सा मानना होगा जिन्हें वह पहले ही अपने कब्ज़े में ले चुका है. यूक्रेन इन मांगों को खारिज करता रहा है और कहता है कि उसे सुरक्षा की पक्की गारंटी चाहिए.

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ट्रंप का जवाब 

ट्रंप ने इस बैठक को उपयोगी बताया और कहा कि उन्होंने कई मुद्दों पर चर्चा की है. उन्होंने कहा कि वे नाटो नेताओं और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की से इस बैठक के निष्कर्ष साझा करेंगे. ट्रंप ने यह भी कहा कि उनके और पुतिन के रिश्ते हमेशा अच्छे रहे हैं और यह बातचीत भी उसी दिशा में आगे बढ़ी है.हालांकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि भविष्य की वार्ता किस ढांचे में होगी या किस स्तर पर आगे बढ़ेगी. उनकी ओर से यह भी कहा गया कि “जब तक सहमति नहीं होती, तब तक कोई समझौता नहीं माना जाएगा.” यह बयान संकेत देता है कि फिलहाल किसी ठोस परिणाम की उम्मीद जल्द नहीं की जा सकती.

क्यों उठ रहे हैं सवाल

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अलास्का समिट के बाद उठे सबसे बड़े सवालों में पहला यही है कि क्यों ट्रंप इस बार इतने शांत रहे. अमेरिकी मीडिया के एक वर्ग का कहना है कि यह ट्रंप की रणनीति भी हो सकती है. हो सकता है कि उन्होंने पुतिन को खुलकर बोलने दिया ताकि रूस की ओर से अधिकतम स्थिति सामने आए. लेकिन आलोचकों का मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति की चुप्पी उनके आत्मविश्वास में कमी और पुतिन के सामने झुकाव का संकेत देती है. दूसरा बड़ा सवाल यह है कि अगर किसी समझौते पर सहमति बनी है तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया. क्या यह कोई अस्थायी समझौता है या फिर गुप्त रूप से तय की गई शर्तें हैं जिन्हें बाद में साझा किया जाएगा.

वैश्विक राजनीति पर असर

यह मुलाक़ात सिर्फ अमेरिका और रूस के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए अहम मानी जा रही है. रूस–यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाज़ार, खाद्यान्न आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति को गहराई से प्रभावित किया है. ऐसे में अगर अमेरिका और रूस एक साझा रास्ता निकालते हैं तो इसका असर सीधे यूरोप और एशिया पर भी पड़ेगा. भारत जैसे देशों के लिए भी यह बैठक महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत रूस से बड़े पैमाने पर तेल और ऊर्जा आयात करता है. इसलिए अगर भविष्य में कोई स्थायी समझौता होता है तो ऊर्जा बाज़ार में स्थिरता आ सकती है.

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बताते चलें कि अलास्का समिट ने यह तो साफ कर दिया कि रूस और अमेरिका अब बातचीत की टेबल से भागना नहीं चाहते. लेकिन अभी तक बातचीत नतीजे तक नहीं पहुंची है. पुतिन ने समझौते की बात कही, लेकिन उसका खाका सामने नहीं आया. ट्रंप ने रिश्तों के बेहतर होने की उम्मीद जताई, लेकिन विस्तार से कुछ नहीं बताया. ऐसे में तीन घंटे लंबी बातचीत और केवल 12 मिनट की प्रेस कॉन्फ्रेंस से यही संदेश निकलता है कि शांति का रास्ता लंबा और कठिन है. इस मुलाक़ात ने उम्मीद का दरवाज़ा तो खोला है, लेकिन उस दरवाज़े से बाहर निकलकर आगे बढ़ने के लिए अभी कई मंज़िलें तय करनी होंगी.

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