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चीन बनाम ताइवान, क्या एशिया में एक और युद्ध की दस्तक?

ताइवान, जो खुद को स्वतंत्र राष्ट्र मानता है, चीन के लिए एक सामरिक और राजनीतिक चुनौती बन चुका है। हाल ही में अमेरिका ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट से ताइवान की आजादी से जुड़े संदर्भ हटा दिए, जिससे चीन भड़क गया। इस कदम के बाद बीजिंग ने अमेरिका को कड़ी चेतावनी दी और साफ कर दिया कि ताइवान पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

चीन बनाम ताइवान, क्या एशिया में एक और युद्ध की दस्तक?
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ताइवान, एक ऐसा देश जो खुद को स्वतंत्र राष्ट्र मानता है, लेकिन चीन उसे अपना अविभाज्य हिस्सा बताता है। हाल ही में अमेरिका ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट से ताइवान की स्वतंत्रता से जुड़े संदर्भ हटा दिए, जिससे चीन भड़क गया। यह विवाद एशिया में एक बड़े सैन्य संघर्ष की आहट दे सकता है। लेकिन यह विवाद शुरू कहां से हुआ? ताइवान पर चीन की इतनी दिलचस्पी क्यों है, और अमेरिका इसमें क्या भूमिका निभा रहा है? आइए, इस पूरे मसले को विस्तार से समझते हैं।

चीन-ताइवान विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

ताइवान, दक्षिण-पूर्वी चीन के तट से लगभग 100 मील दूर स्थित एक द्वीप है। इसकी कहानी सदियों पुरानी है। 1600 के दशक में ताइवान पर डच और स्पैनिश शासन था, और इसे फॉर्मोसा के नाम से जाना जाता था। 1684 में, क्विंग राजवंश ने इसे चीन के फ़ुज़ियान प्रांत का हिस्सा बना दिया और 1885 में इसे एक अलग चीनी प्रांत घोषित किया। 1895 में जापान ने चीन को हराकर ताइवान पर कब्जा कर लिया और इसे अपनी कॉलोनी बना लिया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, जापान ने ताइवान को चीन के "रिपब्लिक ऑफ चाइना (ROC)" को सौंप दिया।
अब सवाल यह है कि कम्युनिस्ट क्रांति के बाद ताइवान कैसे अलग हुआ? दरअसल 1949 में, माओ ज़ेदोंग के नेतृत्व में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने पूरे चीन पर कब्जा कर लिया और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (PRC) की स्थापना की। इस दौरान चियांग काई-शेक की राष्ट्रवादी सरकार (ROC) भागकर ताइवान चली गई। इसके बाद से ही ताइवान खुद को चीन से अलग मानता आया है, लेकिन बीजिंग ने कभी इसे मान्यता नहीं दी। 1971 में, संयुक्त राष्ट्र (UN) ने ताइवान की मान्यता समाप्त कर दी और इसे आधिकारिक रूप से चीन का हिस्सा घोषित कर दिया।
ताइवान की मौजूदा स्थिति क्या है?
ताइवान एक स्वतंत्र राष्ट्र की तरह काम करता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी मान्यता सीमित है। ताइवान के पास अपनी खुद की सेना है।अपनी करेंसी (ताइवान डॉलर), अपना संविधान और सरकार, इसके अलावाअपना पासपोर्ट जिसे 145 से भी ज्यादा देशों में मान्यता प्राप्त है। लेकिन, संयुक्त राष्ट्र और अधिकांश देश ताइवान को आधिकारिक रूप से एक अलग देश नहीं मानते। वर्तमान में, केवल 12 छोटे देश, जैसे बेलीज, नाउरू और तुवालु ही ताइवान को मान्यता देते हैं।
चीन को ताइवान क्यों चाहिए?
ताइवान, पश्चिमी प्रशांत महासागर में चीन की समुद्री सुरक्षा के लिए अहम है। अगर चीन ताइवान पर कब्जा कर लेता है, तो वह दक्षिण चीन सागर में अपनी स्थिति मजबूत कर लेगा। ताइवान दुनिया के सबसे बड़े सेमीकंडक्टर चिप उत्पादकों में से एक है। चीन के लिए यह टेक्नोलॉजी बहुत महत्वपूर्ण है। अगर चीन ताइवान को अपने नियंत्रण में ले लेता है, तो यह एशिया में उसकी महाशक्ति बनने की दिशा में सबसे बड़ा कदम होगा।
अमेरिका और ताइवान, दोस्ती या रणनीति?
अमेरिका आधिकारिक रूप से वन चाइना पॉलिसी को मानता है, लेकिन वह ताइवान की सैन्य और आर्थिक रूप से सहायता करता है। 2024 में अमेरिका ने ताइवान को 4.85 हजार करोड़ रुपये की सैन्य सहायता दी। अमेरिका का ताइवान से अनौपचारिक लेकिन मजबूत संबंध है। हाल ही में अमेरिकी सांसदों ने राष्ट्रपति से ताइवान को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करने की मांग की। ऐसे में सवाल यह भी है कि क्या अमेरिका ताइवान के लिए चीन से युद्ध करेगा? तो आपको बता दें कि अमेरिका सीधे युद्ध में शामिल नहीं होगा, लेकिन वह ताइवान को हथियार, सैन्य तकनीक और कूटनीतिक समर्थन देता रहेगा।
क्या चीन-ताइवान युद्ध होने वाला है?
चीन कई बार संकेत दे चुका है कि वह ताइवान को बलपूर्वक अपने नियंत्रण में ले सकता है।
2022 में चीन ने ताइवान के पास सबसे बड़ा सैन्य अभ्यास किया।
2023 में चीन ने ताइवान की वायु सीमा में 150 से ज्यादा लड़ाकू विमान भेजे।
2024 में चीन ने ताइवान की समुद्री और हवाई नाकाबंदी कर दी।
वही संभावित युद्ध के कारण की बात कि जाए तो वो तभी संभव है जब ताइवान स्वतंत्रता की घोषणा करता है। अगर अमेरिका ताइवान को आधिकारिक मान्यता देता है। अगर चीन को लगे कि ताइवान उसके नियंत्रण से बाहर जा रहा है। अगर युद्ध हुआ, तो यह सिर्फ चीन और ताइवान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह पूरे एशिया और अमेरिका को भी प्रभावित करेगा।
क्या ताइवान की स्वतंत्रता बच पाएगी?
ताइवान ने अब तक अपनी मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था, आर्थिक शक्ति और अमेरिकी समर्थन के दम पर खुद को बचाए रखा है। लेकिन चीन की बढ़ती सैन्य ताकत और बदलते वैश्विक समीकरणों को देखते हुए ताइवान का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है। क्या चीन जल्द ही ताइवान पर हमला करेगा? क्या अमेरिका और पश्चिमी देश ताइवान का समर्थन करेंगे, या फिर ताइवान और चीन किसी समझौते पर पहुंचेंगे? ये सवाल आने वाले समय में पूरी दुनिया की दिशा तय करेंगे।
ताइवान की स्थिति बेहद जटिल है। एक तरफ वह अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखना चाहता है, तो दूसरी ओर चीन उसे पूरी तरह से निगलने के लिए तैयार बैठा है। अमेरिका और पश्चिमी देशों की मदद से ताइवान अब तक अपनी संप्रभुता बनाए रखने में सफल रहा है, लेकिन यह कब तक चलेगा—इसका जवाब केवल समय के पास है।

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