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Godse की फांसी क्यों रुकवाना चाहते थे गांधी जी के बेटे ? वजह जान दंग रह जाएंगे !

क्या आप जानते हैं नाथूराम गोडसे की फांसी की सजा रुकवाने के लिए ख़ुद बीआर अंबेडकर ने वकील से बात की थी, यहां तक की गांधी जी के बेटे भी फांसी के फ़ैसले के ख़िलाफ़ थे लेकिन गोडसे चाहते थे कि किसी भी क़ीमत पर उनकी सजा में बदलाव ना किया जाये। ये रिपोर्ट देख आप भी चौंक जाएंगे।

Godse की फांसी क्यों रुकवाना चाहते थे गांधी जी के बेटे ? वजह जान दंग रह जाएंगे !
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अगर आपके सामने नाथूराम गोडसे का ज़िक्र हो तो आपके ज़हन में सबसे पहला विचार क्या आएगा ? निश्चित तौर पर वो शख़्स जिसने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या की थी, लेकिन आपमें से कुछ लोग होंगे जो शायद नाथूराम गोडसे को विलेन के तौर पर नहीं देखते होंगे। दरअसल इस देश में ये सबसे बड़ी विडंबना है कि नाथूराम गोडसे सबसे विवादित शख़्सियत है। उन्हें लेकर देश में दो धड़े बंटे हुए हैं, लेकिन आज हम आपको जो क़िस्सा गोडसे से जुड़ा सुनायेंगे वो जानकर आप हैरान रह जाएंगे। इस रिपोर्ट में हम बात करेंगे उस वजह है कि जिसकी वजह से गांधी जी के बेटे ही गोडसे की फांसी रुकवाने के लिए पहुच गये थे।

15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ था। आजादी मिलने के लगभग 5 ही महीने के बाद ही 30 जनवरी 1948 को जब महात्मा गांधी प्रार्थना के लिए दिल्ली के बिड़ला हाउस जा रहे थे तब नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी थी। खाकी कोट पहने गोडसे ने पहले बापू को प्रणाम किया फिर जैस ही वो आगे बढ़ा, गांधी जी के साथ में खड़ी मनु बेन ने उसे रोकने की कोशिश की लेकिन गोडसे ने पिस्टल निकालकर एक एक कर तीन गोलियां गांधी जी के सीने में दाग दी।

गांधी पर गोली चलाने वाले गोडसे को तुरंत दबोच लिया गया और फिर उनके खिलाफ मुकदमा चलाया गया। ये मुक़दमा लाल क़िले में बनाई गई विशेष अदालत में चलाया गया जिसमें 10 फ़रवरी 1949 को फ़ैसला आया। कुल आठ आरोपियों में से 7 को सज़ा सुनाई गई। आपको जानकर शायद हैरानी होगी कि गांधी की हत्या के आरोपी बनाये गये लोगों में एक नाम वीर सावरकर का भी था हालांकि सबूतों के अभाव में उन्हें बरी कर दिया गया। जबकि गोडसे और नारायण आप्टे को फांसी की सज़ा सुनाई गई। 

बाकि जो आरोपी थी विष्णु करकरे, गोपाल गोडसे, मदनलाल, डॉक्टर परचुरे और दिगंबर बड़गे का नौकर शामिल था उन्हें उम्र क़ैद की सजाई सुनाई गई थी। आपको बता दें बाद में दिगंबर बड़गे सरकारी गवाह बन गया था। हर कोई गोडसे के इस कदम से हैरान था। पूरे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान नाथूराम गोडसे गांधी जी के आदर्शों का मुरीद का फिर अचानक ऐसा क्यों हुआ कि वो ना सिर्फ़ उनका विरोधी बना बल्कि उनका हत्यारा भी बन गया।

बताया जाता है कि गोडसे के आख़िरी शब्द अखंड भारत थे जिसका मतलब ये निकाला जाता है कि गोडसे गांधी जी को बंटवारे का दोषी मानता था। दिलचस्प बात ये है कि जिस वक़्त गोडसे को फाँसी की सज़ा सुनाई गई उस वक़्त कई लोग इसका विरोध कर रहे थे। इनमें बीआर अंबेडकर का नाम भी शामिल था। बीआर अंबेडकर ने तो गोडसे के वकील के लिए संदेश भिजवाया था कि अगर वो चाहे तो इस सज़ा को आजीवास कारावास में बदला जा सकता है। इसके पीछे का तर्क भी गांधी जी की अहिंसा वाली नीति ही दिया जाएगा

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लेकिन गोडसे ने ऐसा करने से मना कर दिया। गोडसे ख़ुद चाहते थे कि उन्हें फाँसी की सज़ा दी जाये। वो चाहते थे देश दुनिया में ये संदेश जाए कि उनकी फाँसी के साथ ही अहिंसा वाली पॉलिसी भी फंदे पर चढ़ जाये। गोडसे की उस विचारधारा से आज भी इतने लोग प्रभावित हैं कि प्रज्ञा ठाकुर जैसी साध्वी ने तो कह दिया था नाथूराम गोडसे देशभक्त थे, देशभक्त हैं और देशभक्त रहेंगे।हालाँकि बीजेपी के दबाव में आकर उन्होंने अपने बयान को वापस ले लिया था।वैसे ये कोई पहली बार नहीं था जब गोडसे को देशभक्त कहा गया हो बल्कि 1990 में महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना शासन के दौरान एक नाटक का मंचन किया गया था जिसमें गोडसे को Defend किया गया था।

इतिहास के पन्नों को पलटेंगे तो पाएंगे कि गोडसे और आप्टे को 8 नवंबर 1949 को फाँसी होने वाली थी लेकिन इसे टाल दिया गया था क्योंकि ख़ुद गांधी जी के दो बेटों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू से फांसी की सज़ा माफ़ कर देने की अपील की थी। गांधीजी के दोनों बेटों मणिलाल और रामदास का कहना था कि गोडसे और आप्टे को फांसी की सजा नहीं दी जानी चाहिए। गांधीजी खुद मृत्युदंड के खिलाफ थे। दोनों को माफ कर दिया जाए. हालांकि गांधीजी के तीसरे बेटे देवदास गांधी ने खुद को इससे दूर रखा जबकि सबसे बड़े बेटे हरिलाल का तब तक निधन हो चुका था। हालांकि गांधीजी की हत्या की खबर सुनते ही हरिलाल ने हत्यारों से बदला लेने की कसम खाई थी.

 हालाँकि इस अनुरोध को ठुकरा दिया गया लेकिन जब तक विचार विमर्श चला तब तक एक हफ़्ता और निकल चुका था। इस बात का ज़िक्र बंगाल के राज्यपाल रहे गोपाल कृष्ण गांधी ने साल 2017 में अपनी एक किताब में इसका ज़िक्र किया था। आज भी जब कभी इतिहास के पन्ने पलटे जाते हैं तो ये क़िस्सा ज़रूर याद आता है जिसमें गोडसे अपनी फाँसी का विरोध नहीं कर रहे थे लेकिन और बहुत से लोग ज़रूर कर रहे थे। 

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