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PM Modi की 'सुपारी' लेने वाले CIA के एजेंट को ढाका में किसने मारा? क्या पुतिन ने निभाई भारत से अपनी दोस्ती?

ढाका में बड़ा ऑपरेशन, मारा गया मोदी की सुपारी लेने वाला एजेंट, आख़िर किसने बनाया प्लान? 1 महीने पहले CIA एजेंट बांग्लादेश आया, ढाका के एक होटल में कमरा बुक कराया, टारगेट पर थे पीएम मोदी? क्या पुतिन ने दोस्ती निभाई, मोदी की जान बचाई? अमेरिका ने क्यों नहीं लिया होटल में मारे गए एजेंट का शव?

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02 Nov 2025
( Updated: 11 Dec 2025
04:47 AM )
PM Modi की 'सुपारी' लेने वाले CIA के एजेंट को ढाका में किसने मारा? क्या पुतिन ने निभाई भारत से अपनी दोस्ती?
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प्लान तैयार था, एजेंट को काम सौंप दिया गया था, होटल में लोग पहुंच चुके थे, बस अब वक्त था टार्गेट को हिट करने का, तभी पुतिन को एक फ़ोन आता है, फ़ोन करने वाला एक मैसेज देता है, फिर शुरु होता है एक बड़ा ऑपरेशन, जिसकी भनक ना तो अमेरिका को लग पाई ना ही पाकिस्तान इस प्लान को समझ पाया और ना ही बांग्लादेश में बैठा वो एजेंट इस प्लान का अंदाजा लगा पाया. 

भारत और रूस ने मिलकर एक ऐसे मिशन को अंजाम दिया जिसने पूरी दुनिया को ये बता दिया कि भारत और रूस ना केवल एक सच्चे दोस्त हैं बल्कि ये भी साबित कर दिया कि पूरी दुनिया को अपनी ताक़त की धौंस देने वाला अमेरिका अब कितना मजबूर है और मोदी की ताक़त से कितना डरा हुआ है. बीते दिनों बांग्लादेश के ढाका में मारे गए CIA के एजेंट की पूरी कहानी जानिए इस रिपोर्ट में. पूरी ख़बर बताने से पहले कुछ सवाल मसलन,

सवाल नंबर-1 क्या पीएम मोदी से अमेरिका डरने लगा है?

सवाल नंबर-2 क्या लाल बहादुर शास्त्री की तरह रची गई थी पीएम मोदी के ख़िलाफ़ साज़िश ?

सवाल नंबर-3 ढाका में किसने की CIA एजेंट की हत्या, अमेरिका क्यों रहा चुप?

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इस रिपोर्ट में परत-दर परत सारे खुलासे होंगे कि कैसे मोदी को बचाने के लिए अपनी जान पर खेल गए रूस के एजेंट और पुतिन? आप इस ख़बर के बारे में जानें उससे पहले आपको कुछ दशक पहले हुए घटनाक्रमों में झांकना होगा.

क्या लाल बहादुर शास्त्री की तरह रची गई मोदी के साथ साज़िश?

‘तारीख़ 23 सितंबर 1965’, भारत और पाकिस्तान के बीच 17 दिनों तक चले युद्ध के बाद युद्धविराम का ऐलान हो चुका था. युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच तत्कालीन सोवियत संघ ने मध्यस्थता की और समझौते के लिए दोनों देशों के पीएम ताशकंद पहुंचे. जो उस वक्त सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करता था. इस समझौते पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे. क़रीब 6 दिनों तक चली बातचीत के बाद 10 जनवरी, 1966 को ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, जिसके बाद दोनो देशों के बीच औपचारिक तौर पर लड़ाई खत्म हो गई थी.

दोनों देशों के बीच समझौते तो हो गया, लेकिन समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले लाल बहादुर शास्त्री के लिए वह उनकी जिंदगी का आखिरी दिन साबित हुआ. उसके बाद लाल बहादुर शास्त्री ने सूरज नहीं देखा और हस्ताक्षर करने के 12 घंटे के भीतर 11 जनवरी को ताशकंद में तड़के कमरे में सोते हुए उनकी मौत हो गई. शास्त्री जी की मौत के बाद कई सवाल खड़े हुए.

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जांच के लिए राज नारायण समिति का गठन किया. पूछताछ के लिए शास्त्री जी के निजी डॉक्टर आरएन चुघ को बुलाया जाना था. लेकिन उससे पहले ही एक सड़क हादसे में परिवार सहित उनकी मौत हो गई. शास्त्री जी के निजी सहायक रामनाथ के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ. उनकी भी एक सड़क हादसे में याददाश्त चली गई. ये दोनों लोग शास्त्री के साथ ताशकंद के दौरे पर गए थे. राज नारायण कमिटी की रिपोर्ट का क्या हुआ, किसी को नहीं पता. आज तक इसे पेश नहीं किया गया है.

अब सवाल खड़ा होता है कि;

  1. क्या लाल बहादुर शास्त्री की तरह पीएम मोदी के ख़िलाफ़ भी प्लान बनाया गया था?
  2. क्या उसी तरह से पीएम मोदी के ख़िलाफ़ भी साज़िश रची गई थी?
  3. क्या शास्त्री की तरह बंद कमरे में मोदी को निशाना बनाया जाना था?

अब पीएम मोदी के ख़िलाफ़ रची गई इस साज़िश को सिलसिलेवार तरह से समझिए, जिसके बाद आप इस ख़बर को सही से समझ सकते हैं.

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क्या है ढाका में अमेरिकी एजेंट की मौत वाली ख़बर?

दरअसल 31 अगस्त को बांग्लादेश के ढाका के एक होटल के कमरे से अमेरिकी स्पेशल फोर्स के अधिकारी टेरेंस अर्वेल जैक्सन की रहस्यमयी मौत की ख़बर आती है. मौत की ख़बर के बाद इस एजेंट की लाश तीन दिनों तक होटल में पड़ी रहती है. ख़बर के मुताबिक़ तीन दिन तक रुम में कोई हलचल नहीं हुई, लेकिन जब होटल के कमरे से स्मैल आने लगी तब जाकर ये खुलासा हुआ अमेरिकी सैन्य अधिकारी और एजेंट की मौत हो गई. अब यहां पर बड़े सवाल खड़े होते हैं.

सवाल नंबर-1 अमेरिका के एजेंट से अगर कॉन्टैक्ट नहीं हो पाता तो उसकी अलर्ट टीम रिस्पॉन्ड करती है, इस एजेंट से कॉन्टैक्ट क्यों नहीं किया गया.
सवाल नंबर-2 क्या मिशन के फेल होने के बाद अमेरिका इस मामले को छुपाना चाहता था.

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अपने एजेंट की हत्या की ख़बर के बाद अमेरिकी एबेंसी एक्टिव हुई और लाश का पोस्टमार्टम कराए बिना अमेरिकी दूतावास के कर्मचारियों ने लाश को अपने कब्जे में ले लिया. इसीलिए अभी तक इसका खुलासा नहीं हो पाया कि अमेरिकी एजेंट की मौत कैसे हुई और किसने मारा. रिपोर्ट्स ये बता रही हैं कि इसमें रुस की सीक्रेट एजेंसी का हाथ है. 

ऑर्गनाइजर की रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि अमेरिकी अधिकारी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाने के इरादे से ढाका में तैनात किया गया था. ऑर्गेनाइजर ने एक्सपर्ट्स के हवाले से अनुमान जताया है कि प्रधानमंत्री मोदी की हत्या की योजना और कोशिश हो सकती है. जिसे भारत और रूस की खुफिया एजेंसियों के संयुक्त अभियान ने नाकाम कर दिया.

अमेरिकी एजेंट को किसने मारा?

रिपोर्ट में अनुमान लगाया जा रहा है कि जैक्सन, भारत और खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कोई गुप्त कार्रवाई या असाइनमेंट पर तैनात किए गए थे, लेकिन अमेरिका का वो प्लान नाकाम हो गया. बड़ी बात ये है कि जिस दिन अमेरिकी अधिकारी टेरेंस अर्वेले की मौत हुई उस दिन प्रधानमंत्री मोदी शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीन के तियानजिन में थे. शिखर सम्मेलन के बाद, प्रधानमंत्री मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कार के अंदर काफी देर तक अकेले में बातचीत की थी. तियानजिन में मोदी-पुतिन की इस मुलाकात की खूब चर्चा हुई और इसे ग्लोबल कवरेज मिला और ये कहा गया कि पुतिन ने मोदी के साथ दोस्ती निभाते हुए अमेरिका के इस मिशन को कामयाब नहीं होने दिया. 

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अगस्त में हुई इस घटना के बाद 10 सितंबर को अमेरिकी सेना और वायु सेना के करीब 120 अधिकारी ढाका से चटगांव पहुंचते हैं. इन लोगों के लिए रेडिसन ब्लू होटल में 85 कमरे पहले से बुक थे, लेकिन हैरान करने वाली बात ये थी कि गेस्ट रजिस्टर में इन लोगों के नाम दर्ज नहीं किए गए थे. उसके बाद 14 सितंबर को चटगांव एयरपोर्ट पर मिस्र की वायु सेना का एक परिवहन विमान उतरा.

इसके अगले दिन अमेरिकी सैनिकों ने बांग्लादेश वायु सेना के पटेंगा एयरबेस का निरीक्षण किया. बांग्लादेश में हुईं इन गतिविधियों को देखकर कई देशों की सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े हो गए. और अब ये माना जा रहा है कि शायद अमेरिका बांग्लादेश में अपने एजेंट की मौत की हकीकत को जानने के लिए कोशिश कर रहा है.

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खैर अमेरिका के एजेंट की मौत कैसी हुई, किसने की, इस बात का खुलासा तो अभी नहीं हुआ है. लेकिन पुतिन की गाड़ी में करीब 45 मिनट तक मोदी का अकेले बैठना, और अमेरिका का अपने एजेंट का शव चुपचाप लेकर मामले को दबाना इस बात का इशारा कर रहा है कि अमेरिका ने कुछ बड़ी साज़िश रची थी, जो कामयाब नहीं हो पाई.

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