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जिनकी जीभ गौमांस के लिए लपलपा रही, दे रहे पूर्ण 'प्रोटीन' होने की दलील, वो एक बार ये पढ़ लें, आखें खुली की खुली रह जाएंगी!

आज कल कुछ लोग तर्क देते हैं कि गोमांस एक 'पूर्ण प्रोटीन' है. उनका कहना है कि इसमें सभी आवश्यक अमीनो Acid पाए जाते हैं और वसा भी अधिकतर 'पोषक' होती है. सतही तौर पर यह कहने में फैशनेबल लग सकता है, लेकिन गौर करें तो यह अधूरा सत्य है. प्रश्न यह नहीं है कि उसमें पोषण है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हर पोषणयुक्त वस्तु खाने योग्य होती है? विष में भी रसायन होते हैं, लेकिन क्या उसे पीना संभव है? आजकल ऐसी दलील दे रहे वामपंथियो को ये स्टोरी पढ़ लेनी चाहिए, बीफ के लिए उनका मुंह लपलपाना बंद हो जाएगा.

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26 Aug 2025
( Updated: 11 Dec 2025
08:43 AM )
जिनकी जीभ गौमांस के लिए लपलपा रही, दे रहे पूर्ण 'प्रोटीन' होने की दलील, वो एक बार ये पढ़ लें, आखें खुली की खुली रह जाएंगी!
प्रतीकात्मक तस्वीर
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भारत में सनातन धर्म की बहुलता है और इसी वजह से 'गाय' या 'गौ' को धार्मिक और सामाजिक रूप से माता कहा जाता है. एक ओर जहां देश में इसे राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने की मांग होती रही है, कई राज्यों ने इसे राज्य पशु का दर्जा भी दिया तो वहीं एक तबका है जो इसके मांस, व्यापार को जायज ठहराता रहा है. धार्मिक और साइंटिफिक बहस से इतर आज कल कुछ लोग ये दलील दे रहे हैं कि 'गोमांस' में पाए जाने वाला प्रोटीन, 'पूर्ण' प्रोटीन है. इस तबके का तर्क है कि गाय के मांस में मानव पोषण के लिए आवश्यक सभी आवश्यक अमीनो एसिड की उचित मात्रा होती है. गोमांस में आधे से अधिक वसा असंतृप्त (Unsaturated) होती है और अधिकांश असंतृप्त वसा ओलिक एसिड होती है, जो जैतून के तेल में पाई जाने वाली उसी प्रकार की "स्वस्थ" वसा है. खैर जो लोग इस बात में उलझे हैं कि गौमांस का सेवन करना चाहिए या नहीं, उन्हें ये जान लेना चाहिए कि हर सुनी और आंख से देखी चीज हमेशा ही सच नहीं होती है.

भारत की आत्मा उसकी संस्कृति और परंपराओं में बसती है. यही संस्कृति है जिसने दुनिया को "वसुधैव कुटुम्बकम्" का संदेश दिया. इसी भूमि पर वेद, उपनिषद और पुराणों की रचना हुई. और इसी सनातन परंपरा ने हर जीव-जंतु में दिव्यता देखी. गाय को माता कहना इसी दृष्टि का परिणाम है. यह केवल धार्मिक आस्था नहीं बल्कि सामाजिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी पूर्ण सत्य है.

भारत में गाय को सदैव पोषण और समृद्धि का प्रतीक माना गया. ऋग्वेद, अथर्ववेद और यजुर्वेद तक में गौ की महिमा का वर्णन मिलता है. इसे "अघ्न्या" कहा गया है — जिसका अर्थ है, जिसे मारा न जाए. कृषिकेंद्रित समाज में गाय केवल दूध का स्रोत नहीं बल्कि कृषि के लिए शक्ति, गोबर और गोमूत्र के रूप में उर्वरक, और जीवन निर्वाह का आधार रही. यही कारण है कि सनातन धर्म में गाय को "गौ माता" कहा गया.

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लेकिन आज कल जो गाय के मांस में प्रोटीन की दलील लेकर आए हैं उनसे सवाल किया जाना चाहिए कि क्या हर पोषणयुक्त वस्तु खाने योग्य होती है? विष में भी रसायन होते हैं, लेकिन क्या उसे पीना संभव है?

खैर इस दुविधा को इस मशहूर प्रसंग के माध्यम से समझा जा सकता है.

कहा जाता है कि प्राचीन समय में एक महान सम्राट हुआ करता था. उसकी पुत्री इतनी सुंदर थी कि देवता भी उसका वरण करना चाहते थे. लेकिन अहंकार में डूबे सम्राट ने घोषणा कर दी कि वह अपनी ही बेटी से विवाह करेगा. उसका तर्क था—"समर्थ को दोष नहीं लगता." यह सुनकर महारानी व्याकुल हो गईं. उन्होंने महात्मा से सहायता माँगी.

एक बहुत ही ताकतवर सम्राट थे, उनकी बेटी इतनी सुंदर थी, कि देवता भी सोचते थे कि यदि इससे विवाह हो जाये तो उनका जीवन धन्य हो जाये. इस कन्या की सुंदरता की चर्चा सारी त्रिलोकी में थी. सम्राट इस बात को जानते थे. एक पूरी रात वो अपने कमरे में घूमते रहे. सुबह जब महारानी जागी तो देखा कि सम्राट अपने कमरे में घूम रहे हैं. महारानी ने पूछा: लगता है, आप पूरी रात सोये नहीं हैं, कोई कष्ट है क्या? उन्होंने कहा कि अपनी बेटी को लेकर चिंता है, लेकिन निर्णय मैंने कर लिया. समरथ को नहीं कोई दोष गुसाईं. महारानी ने पूछा, क्या? 

उन्होंने कहा—मैं अपनी बेटी से स्वयं विवाह करूंगा. समर्थ पुरुष को तो कोई दोष लगता ही नहीं. महारानी ने बहुत समझाया, लेकिन जब किसी की समझ पर पत्थर पड़ जाए, तो क्या किया जा सकता है.सम्राट राज सभा गये, वहां उन्होंने ऐलान कर दिया मैं इस धरती का समर्थ पुरुष हूं, अपनी बेटी से स्वयं ही विवाह करूंगा. समरथ को नहीं दोष गुसाईं. किसी में विरोध की ताकत नहीं थी. मुहुर्त निकाला गया.

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महारानी चुपचाप से एक महात्मा से मिलने के लिये गई, सारी बात रो रो कर बताई. महात्मा ने कहा कि विवाह से एक दिन पहले मैं आपके यहां भोजन करने आऊंगा. नियत समय पर महात्मा पहुंचे. उन्होंने तीन थालियां लगवाईं. सम्राट को राज सभा से भोजन के लिये बुलाया गया. सम्राट ने कहा कल मेरा विवाह है, आज महात्मा भोजन के लिये पधारे हैं सब शुभ ही शुभ है.

सम्राट भोजन के लिये आये, महात्मा को प्रणाम किया. महात्मा ने कहा राजन मेरे कई जन्म गुजर गये समर्थ पुरुष की तलाश में, सुना है आप समर्थ पुरुष हैं. आपके साथ भोजन करके मैं धन्य हो जाऊंगा. महात्मा ने थाली लगवाई, एक थाली में 56 भोग दूसरी में विष्टा (Toilet) था. महात्मा ने दूसरी थाली सम्राट के सामने लगाकर कहा भोजन करिये. सम्राट बहुत क्रोधित हुए. महात्मा ने कहा आप तो समर्थ पुरुष हैं, आप को कोई दोष नहीं लगेगा. और मेरी भी आज कई जन्म की तपस्या पूरी हो जायेगी.

सम्राट ने हताश होकर कहा मुझसे नहीं होगा. महात्मा ने योग बल से सुअर का वेष धारण किया और विष्टा सेवन कर लिया. और पुन: अपने वेष में आ गये. सम्राट वहीं घुटनों के बल बैठ गये.

लोगों को अपनी परिभाषाएं ठीक करनी चाहिए. गाय मे भी प्रोटीन है, पेड़, मनुष्य सभी जीव में प्रोटीन हैं. लेकिन सब खाये नहीं जाते हैं. माता, बहन और पत्नी तीनों ही तो स्त्रियां हैं, फिर तीनों के प्रति नजरिया अलग क्यों होता है. ध्यान रहे हिन्दुओं में कुछ भी अवैज्ञानिक नहीं है. 

हिंदू ही एकमात्र ऐसा धर्म है जिसने मन, आत्मा और परमात्मा तक की खोज की. अदृश्य को शाश्वत बनाने का दम सिर्फ हिन्दुओं में ही है. इसलिये हिन्दू जब गाय को माता कहता है तो उसके ठोस और वैज्ञानिक कारण हैं. 

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वैज्ञानिक दृष्टि से भी गाय अनुपम है. गाय का दूध "सात्त्विक आहार" माना जाता है—जो मन को शांत करता है और शरीर को संतुलित रखता है. आयुर्वेद कहता है कि गौदुग्ध मस्तिष्क और हृदय के लिए सर्वोत्तम है. गोमूत्र औषधि है और गोबर कृषि के लिए अमृत. यानी गाय सम्पूर्ण जीवन-चक्र को संतुलित करती है.

आज कुछ लोग "गोमांस" को आधुनिकता या स्वतंत्रता का प्रतीक मानकर प्रस्तुत करते हैं. लेकिन यह भूल जाते हैं कि समाज केवल पेट से नहीं चलता. समाज आस्था, परंपरा और मर्यादा से चलता है. यदि हर वस्तु को केवल "पोषण" की कसौटी पर आँका जाए तो फिर रिश्तों का क्या होगा? क्या माता-पिता का सम्मान केवल इसलिए किया जाता है क्योंकि वे हमें पालते हैं? नहीं, बल्कि इसलिए किया जाता है क्योंकि वह संबंध "अटूट और पवित्र" है.

इसलिए यह याद रखना ज़रूरी कि हर पोषणयुक्त वस्तु खाने योग्य नहीं होती, हर वैज्ञानिक तथ्य अकेला जीवन का आधार नहीं बन सकता और हर संस्कृति अपने प्रतीकों में ही अपनी पहचान सुरक्षित रखती है.

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सनातन धर्म जब गाय को माता कहता है तो वह केवल आस्था नहीं जताता, बल्कि यह संदेश देता है कि जीवन में मर्यादा, करुणा और संतुलन भी उतने ही आवश्यक हैं जितना भोजन. यही सनातन का सौंदर्य है और यही उसकी अनंत शक्ति.

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