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सुप्रीम कोर्ट ने UGC नियमों को क्यों बताया ‘अस्पष्ट’? अब इन 4 सवालों पर होगा विचार-विमर्श

सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के 'उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु विनियम 2026' पर अंतरिम रोक लगा दी है. अदालत ने नियमों को प्रथम दृष्टया अस्पष्ट बताते हुए इनके दुरुपयोग और समाज में विभाजन की आशंका जताई है.

सुप्रीम कोर्ट ने UGC नियमों को क्यों बताया ‘अस्पष्ट’? अब इन 4 सवालों पर होगा विचार-विमर्श
Supreme Court (File Photo)
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देश के उच्च शिक्षा तंत्र से जुड़े एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के 'उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्द्धन हेतु विनियम 2026' पर अंतरिम रोक लगा दी. अदालत ने साफ कहा कि ये नियम प्रथम दृष्टया अस्पष्ट हैं और इनके दूरगामी तथा खतरनाक सामाजिक परिणाम हो सकते हैं. शीर्ष अदालत के अनुसार, इस प्रारूप से समाज में विभाजन की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

दरअसल, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले को गंभीर मानते हुए कहा कि इन विनियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं में कानून के महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए गए हैं. इन्हीं सवालों पर विस्तृत विचार के लिए तीन न्यायाधीशों की पीठ 19 मार्च को सुनवाई करेगी.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यूजीसी के नए समानता नियमों में कुछ ऐसी अस्पष्टताएं हैं, जिनका दुरुपयोग संभव है. अदालत का मानना है कि बिना स्पष्ट सीमाओं और परिभाषाओं के ऐसे नियम लागू करना शैक्षणिक परिसरों में नई समस्याएं खड़ी कर सकता है, जबकि उद्देश्य भेदभाव खत्म करना है.

कोर्ट ने तय किए चार सवाल 

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कोर्ट ने विचार के लिए चार अहम कानूनी सवाल तय किए हैं. पहला सवाल जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा से जुड़ा है. अदालत ने पूछा है कि क्या 2026 के नियमों में धारा 3(सी) के तहत जाति-आधारित भेदभाव को अलग से परिभाषित करना तर्कसंगत है, जबकि धारा 3(ई) में पहले से ही भेदभाव की एक व्यापक परिभाषा मौजूद है. कोर्ट ने यह भी नोट किया कि जातिगत भेदभाव से निपटने के लिए नियमों में कोई विशेष प्रक्रिया तय नहीं की गई है.

दूसरा सवाल 

दूसरा सवाल सामाजिक न्याय की संरचना से जुड़ा है. सुप्रीम कोर्ट यह जानना चाहता है कि इन विनियमों के लागू होने से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के भीतर मौजूद उप-वर्गीकरण पर क्या असर पड़ेगा. खास तौर पर, क्या ये नियम सबसे पिछड़ी जातियों को संरचनात्मक असमानताओं और भेदभाव से पर्याप्त सुरक्षा दे पाएंगे या नहीं.

तीसरा सवाल क्या तय हुआ?

तीसरा सवाल 'पृथकीकरण' शब्द के इस्तेमाल पर केंद्रित है. अदालत ने पूछा है कि क्या नियमों की धारा 7(घ) में इस शब्द को जोड़ना हॉस्टल, कक्षा या अन्य शैक्षणिक व्यवस्थाओं में 'अलग लेकिन समान' जैसी सोच को बढ़ावा देगा. कोर्ट के अनुसार, भले ही यह बंटवारा निष्पक्ष नियमों पर आधारित हो, फिर भी क्या यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और प्रस्तावना में निहित समानता और भाईचारे की भावना के खिलाफ नहीं होगा.  इसी तरह चौथा और अंतिम सवाल विधायी चूक से संबंधित है. सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि यूजीसी के 2012 के विनियमों में “रैगिंग” शब्द मौजूद होने के बावजूद, 2026 के समानता विनियमों में इसे भेदभाव के एक विशिष्ट रूप के तौर पर शामिल नहीं किया गया. अदालत ने इसे एक प्रतिगामी कदम मानते हुए इस पर भी विस्तृत विचार की जरूरत बताई है.

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बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट का यह रुख साफ संकेत देता है कि समानता जैसे संवेदनशील विषय पर बनाए गए नियमों में स्पष्टता, संतुलन और संवैधानिक मूल्यों का पूरा ध्यान रखना अनिवार्य है. 19 मार्च की सुनवाई से यह तय होगा कि उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता का रास्ता किस दिशा में आगे बढ़ेगा.

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