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'कोई बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं...', दलाई लामा के उत्तराधिकारी के चयन में नहीं चलेगी चीन की दादागिरी, भारत ने लिया सख़्त स्टैंड, किया अपना रूख साफ

अगले दलाई लामा की नियुक्ति को लेकर भारत-चीन आमने-सामेन आ गए हैं. चीन ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में चुने जाने वाले किसी भी दलाई लामा को उसकी मंजूरी आवश्यक होगी. जिसपर भारत ने दो टूक कहा है कि दलाई लामा के उत्तराधिकार का निर्णय पूरी तरह तिब्बती बौद्ध परंपरा और समुदाय के अधिकार में है, किसी सरकार की उसमें कोई भूमिका नहीं हो सकती.

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03 Jul 2025
( Updated: 11 Dec 2025
01:45 AM )
'कोई बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं...', दलाई लामा के उत्तराधिकारी के चयन में नहीं चलेगी चीन की दादागिरी, भारत ने लिया सख़्त स्टैंड, किया अपना रूख साफ
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अगले दलाई लामा की नियुक्ति को लेकर तिब्बती समुदाय में अटकलें तेज हैं, लेकिन अब यह मुद्दा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि राजनयिक और राजनीतिक विवाद का रूप ले चुका है. चीन ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में चुने जाने वाले किसी भी दलाई लामा को उसकी मंजूरी आवश्यक होगी. बीजिंग का तर्क है कि तिब्बत "उसका आंतरिक मामला" है, और धार्मिक उत्तराधिकार भी उसके अधिकार क्षेत्र में आता है.

वहीं, भारत ने इस दावे को खारिज करते हुए दो टूक कहा है कि दलाई लामा के उत्तराधिकार का निर्णय पूरी तरह तिब्बती बौद्ध परंपरा और समुदाय के अधिकार में है, किसी सरकार की उसमें कोई भूमिका नहीं हो सकती. यह मामला तिब्बत की धार्मिक स्वतंत्रता, राजनीतिक संप्रभुता और भारत-चीन संबंधों के जटिल संतुलन से गहराई से जुड़ा हुआ है, जिस पर आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय नजरें टिकी रहेंगी.

विवाद के बीच मंत्री किरेन रीजीजू का बयान
दलाई लामा के उत्तराधिकार को लेकर जारी विवाद के बीच केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने गुरुवार को स्पष्ट कहा कि अगले दलाई लामा के चयन का निर्णय केवल दलाई लामा और संबंधित धार्मिक संस्था का अधिकार है. उन्होंने जोर देकर कहा कि इस प्रक्रिया में किसी अन्य पक्ष की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए, और यह एक पूरी तरह से धार्मिक और परंपरागत विषय है, जिसे तिब्बती बौद्ध समुदाय की मान्यताओं के अनुरूप ही तय किया जाना चाहिए. रिजिजू का यह बयान ऐसे समय आया है जब चीन ने दलाई लामा के उत्तराधिकारी को लेकर दावा किया है कि उसकी मंजूरी आवश्यक होगी, जिससे यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक संवेदनशील हो गया है.

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फिर से बढ़ सकता है चीन के साथ तनाव
इससे पहले तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा ने कल बुधवार को कहा था कि दलाई लामा संस्था जारी रहेगी और सिर्फ गादेन फोडरंग ट्रस्ट (Gaden Phodrang Trust) को ही संस्था के भावी उत्तराधिकारी को मान्यता देने का अधिकार होगा. बता दें कि गादेन फोडरंग ट्रस्ट की स्थापना दलाई लामा ने साल 2015 में की थी. रविवार को दलाई लामा के 90वें जन्मदिन से पहले तिब्बती गुरु की यह घोषणा बीजिंग के साथ तनाव बढ़ाने वाली है. केंद्रीय मंत्री रिजिजू ने कहा कि दलाई लामा बौद्धों के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण और परिभाषित संस्था हैं. उन्होंने कहा, “दलाई लामा को मानने वाले सभी लोगों की यही राय है कि उत्तराधिकारी का फैसला स्थापित परंपरा के और दलाई लामा की इच्छा के अनुसार होना चाहिए. उनके और मौजूदा परंपराओं के अलावा किसी और को इसे तय करने का अधिकार नहीं है.”

रविवार को 90 साल के हो जाएंगे दलाई लामा
नोबेल शांति पुरस्कार विजेता दलाई लामा की उत्तराधिकार योजना को लेकर चीन ने कड़ा रुख अपनाया है. बीजिंग ने न केवल इस योजना को खारिज किया, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया कि भावी दलाई लामा को उसकी मंजूरी प्राप्त करनी होगी. चीन के इस दावे के बाद ही केंद्रीय मंत्री किरेन रीजीजू का बयान सामने आया, जिसमें उन्होंने कहा कि अगले दलाई लामा के चयन का अधिकार केवल दलाई लामा और धार्मिक संस्थाओं को है, किसी अन्य सरकार या बाहरी शक्ति को इसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है.

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू स्वयं बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं, और वे अपने सहयोगी मंत्री राजीव रंजन सिंह के साथ 6 जुलाई को धर्मशाला में दलाई लामा के 90वें जन्मदिन समारोह में भारत सरकार का प्रतिनिधित्व करेंगे. दलाई लामा तिब्बती समुदाय और नालंदा बौद्ध परंपरा का पालन करने वाले लोगों के लिए एक आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र हैं.

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इस विवाद के बीच, चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने दलाई लामा की पुनर्जन्म प्रक्रिया को लेकर कहा कि यह प्रक्रिया चीन के कानून, धार्मिक परंपराओं और ‘स्वर्ण कलश’ (Golden Urn) प्रणाली के अनुसार ही होनी चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि इसमें सरकारी अनुमोदन अनिवार्य है. बता दें दलाई लामा और तिब्बती समुदाय 1959 में भारत आए थे, जब माओ त्से तुंग के नेतृत्व में चीनी सेना ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया था. तब से लेकर आज तक दलाई लामा धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) में निवास कर रहे हैं. उनकी उपस्थिति भारत और चीन के बीच एक संवेदनशील कूटनीतिक मुद्दा बनी हुई है.

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