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बिहार के चुनावी नतीजों के बाद महागठबंधन की खुल रही गांठ... साथी दलों का भरोसा खो रहे राहुल गांधी, नए नेतृत्व की तलाश!

बिहार में मिली करारी हार के बाद विपक्ष की इंडिया गठबंधन में अंदरूनी कलह तेज हो गई है. सहयोगी दल खुले मंचों पर ही कांग्रेस और खासकर राहुल गांधी को हार के लिए जिम्मेदार ठहराने लगे हैं. महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) ने भी राहुल गांधी पर तंज कसते हुए गठबंधन की रणनीति को विफल करार दिया है.

बिहार के चुनावी नतीजों के बाद महागठबंधन की खुल रही गांठ... साथी दलों का भरोसा खो रहे राहुल गांधी, नए नेतृत्व की तलाश!
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बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे विपक्षी पार्टियों के लिए बड़ी चिंता बनकर उभरे हैं. बीजेपी के जीत के सिलसिले को रोकने के लिए बनाया गया महागठबंधन अब खुद अस्तित्व के संकट में दिख रहा है. बिहार में मिली करारी हार के बाद इंडी गठबंधन में दरार खुलकर सामने आने लगी है. हालात यह हैं कि गठबंधन के कई सहयोगी दल अब खुले मंचों पर ही एक-दूसरे पर तंज कसने लगे हैं. बिहार में जिस रणनीति के सहारे विपक्ष चुनाव मैदान में उतरा था, उसी की कमजोरियां अब उसके साथी उजागर कर रहे हैं. इन तमाम प्रतिक्रियाओं के बीच सबसे खास बात यह है कि लगभग हर दल अपनी नाराज़गी का निशाना कांग्रेस और विशेष तौर पर राहुल गांधी को बना रहा है.

उद्धव की सेना ने राहुल गांधी पर कसा तंज 

महाराष्ट्र में बीते विधानसभा चुनाव में शिवसेना (UBT) अपनी खराब परफॉर्मेंस से परेशान है. लोकसभा में इसने एनडीए का खेल बिगाड़ दिया था, लेकिन विधानसभा में हालात उलटे पड़ गए. अब बिहार में महागठबंधन की हार ने पार्टी को और मुखर कर दिया है. शिवसेना (यूबीटी) के प्रवक्ता आनंद दुबे (Anand Dubey) लगातार टीवी चैनलों पर कांग्रेस और राहुल गांधी (Rahul Gndhi) पर तीखा हमला करते दिख रहे हैं. उनका एक बयान खूब वायरल हुआ है, जिसमें वह कहते हैं, 'जब हम भंडारे में जाते हैं तो खाना खत्म हो जाता है. बाहर आते हैं तो चप्पल गायब हो जाती है. नाच हम पा नहीं रहे हैं और कहते हैं कि आंगन टेढ़ा है. यह कैसा गठबंधन है हमारा. दुख कम होने का नाम ही नहीं ले रहा.' उनका इशारा साफ था कि कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष की रणनीति लगातार फेल हो रही है.

आम आदमी पार्टी का भी वही है हाल 

भले ही आम आदमी पार्टी औपचारिक तौर पर इंडी गठबंधन से बाहर है, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में उसके बयान हमेशा गठबंधन को प्रभावित करते हैं. बिहार में भी पार्टी ने अलग चुनाव लड़ा, पर नतीजे के बाद से वह कांग्रेस के नेतृत्व पर सवाल उठाने वालों की कतार में सबसे आगे खड़ी है. आप की राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने एक डिबेट में कहा, 'कांग्रेस की सभी पार्टनर यह समझ लें कि एक ‘रागा टच’ होता है. राहुल गांधी ने छू लिया तो डूबना तय है.' उनका बयान विपक्षी खेमे में और भी हलचल बढ़ाने के लिए काफी था. यह टिप्पणी साफ दिखाती है कि विपक्ष के भीतर भरोसा टूटना शुरू हो चुका है.

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JMM भी दिखा रही सख्त तेवर 

विपक्ष की इंडिया महागठबंधन में दरार की असली शुरुआत तो उसी दिन हो गई थी, जब झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) को बिहार चुनाव लड़ने की योजना छोड़नी पड़ी थी. पार्टी ने आरोप लगाया कि बड़े सहयोगी दलों ने उसके साथ किए वादे निभाए ही नहीं. जेएमएम के नेताओं ने बार-बार कहा कि गठबंधन में क्षेत्रीय दलों को जूनियर पार्टनर जैसा ट्रीट किया जाता है. अब खबर है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पार्टी इंडी गठबंधन में अपनी भूमिका पर दोबारा विचार कर रही है. यह सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं है. यह उस असंतोष का संकेत है जो चुपचाप प्रदेशों में उबल रहा है. अगर जेएमएम जैसा मजबूत क्षेत्रीय दल साइडलाइन महसूस कर रहा है तो यह गठबंधन की नींव के लिए बड़ा खतरा है.

बिहार से सपा ने लिया सबक 

यूपी की समाजवादी पार्टी भी खुलकर अपनी नाराजगी जता रही है. अखिलेश यादव ने बिहार के लिए कई रैलियां कीं. कई स्टार प्रचारक भेजे. लेकिन उन्हें चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली. पार्टी के नेता इसे महागठबंधन की बड़ी गलती बता रहे हैं. सपा का मानना है कि अगर प्रदेश की प्रभावशाली पार्टियों को सम्मान न दिया गया तो विपक्ष का राष्ट्रीय ढांचा कभी मजबूत नहीं हो सकता. पार्टी के कुछ नेताओं ने साफ कहा है कि बिहार में जिस तरह चुनाव मैनेज किया गया, वह भारत गठबंधन के लिए गंभीर चेतावनी है. अप्रत्यक्ष तौर पर यह निशाना भी कांग्रेस और राहुल गांधी पर ही जाता है.

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बताते चलें कि बिहार की हार सिर्फ एक चुनावी घटना नहीं है. इसने विपक्ष के भीतर लंबे समय से दबे सवालों को सतह पर ला दिया है. सहयोगी दलों को लग रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व रणनीति, तालमेल और जमीन की हकीकत को समझने में चूक कर रहा है. राहुल गांधी पर बढ़ते हमले सिर्फ बयान नहीं हैं. वे यह संकेत हैं कि गठबंधन में भरोसे का ताना-बाना कमजोर पड़ रहा है. इंडी गठबंधन के लिए यह समय बेहद निर्णायक है. बिहार के नतीजों ने साफ कर दिया है कि सिर्फ मोदी विरोध काफी नहीं है. मजबूत सीट शेयरिंग, ईमानदार तालमेल और जमीनी हकीकत पर आधारित रणनीति के बिना विपक्ष किसी भी राज्य में टिक नहीं पाएगा.

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