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'आप हमें चोट पहुंचाइए... हम पलटकर प्रहार नहीं करेंगे', अमेरिका से बढ़ती खटास के बीच ट्रंप को पीएम मोदी का जवाब देना मजबूरी या जरूरी? एक्सपर्ट्स ने बताया

भारत-अमेरिका के बीच रिश्ते काफी तानवपूर्ण बने हुए हैं. दोनों देशों के बीच रिश्तों में जमी बर्फ के अब पिघलने के संकेत मिलने लगे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पीएम नरेंद्र मोदी को अपना अच्छा दोस्त बताते हुए भारत के साथ रिश्तों की अहमीयत पर जोर दिया. तो वहीं पीएम मोदी ने भी तुरंत इस पर जवाब देते हुए ट्रंप के बयान का स्वागत किया है.

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अमेरिका ने एक महीने पहले ही भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया है और फिर रूस से तेल खरीदने को लेकर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ भी लगाया है. ट्रंप के इस टैरिफ वॉर से दोनों देशों के बीच ट्रेड डील पर लंबे समय से चल रही बातचीत भी पटरी से उतर गई. ऐसे में दोनों राष्ट्राध्यक्षों के बीच अचानक हुई इस बात ने सबको हैरान कर दिया है. अटकलें तेज हो गईं कि भारत और अमेरिका के बीच रिश्तों में आई खटास अब खत्म हो सकती है.

भारत को अलग-थलग नहीं किया जा सकता 

भारतीय आला अधिकारियों ने आशंका जताई है कि डोनाल्ड ट्रंप का खुला बड़बोलापन और पलटीबाज रवैया दोस्ती की राह को मुश्किल बना सकता है. फिर भी वह रिश्ते सुधारने की संभावना को जीवित रखने का प्रयास जारी रखने के पक्षधर हैं. पीएम मोदी ने अपने आधिकारिक एक्स हैंडल से ट्रंप और POTUS (अमेरिकी राष्ट्रपति) को टैग करते हुए जो संदेश दिया, उसने कूटनीतिक गलियारों में राहत की सांस दी है.

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इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से बताया कि, यह जोखिम भरा कदम है, लेकिन दिल्ली को लगा कि इसे उठाना जरूरी है. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ पीएम मोदी की हालिया तस्वीरों को भी इसी रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है, जिससे यह संदेश दिया जा सके कि भारत को अलग-थलग नहीं किया जा सकता और उसके पास कई साझेदार मौजूद हैं.

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आप हमें चोट पहुंचाइए... हम प्रहार नहीं करेंगे

इंडियन एक्सप्रेस अखबार के मुताबिक, एक शीर्ष अधिकारी ने कहा, हमने गांधीवादी सत्याग्रह का मॉडल अपनाया है. आप हमें चोट पहुंचाइए, हमें तकलीफ़ होगी, लेकिन हम पलटकर प्रहार नहीं करेंगे. न ही हम आपकी शर्तों पर हस्ताक्षर करेंगे. यही हमारा संदेश है.

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भारत सरकार मानती है कि फिलहाल व्यापार पर खुली लड़ाई दोनों देशों के लिए नुकसानदेह होगी और इससे बीते ढाई दशक में बने रणनीतिक रिश्तों को गहरी चोट पहुंचेगी. यही वजह है कि रिश्तों को बचाने और उन्हें दोबारा पटरी पर लाने के लिए सर्वोच्च स्तर पर पहल को जरूरी माना गया.

सूत्रों का कहना है कि अमेरिका और भारत दोनों ही इस बात को लेकर सहमत हैं कि व्यापार वार्ता को आगे बढ़ाना अनिवार्य है. बातचीत अच्छी प्रगति पर थी, लेकिन ट्रंप प्रशासन में वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और राष्ट्रपति के सलाहकार पीटर नवारो की सख्त टिप्पणियों ने ट्रेड डील पर पानी फेर दिया. इसी कारण अमेरिका ने अंतिम क्षणों में पीछे हटने का फैसला लिया.

पाक से युद्धविराम का श्रेय ना मिलना भी एक बड़ी वजह  

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भारत और अमेरिका दोनों ही नहीं चाहते कि व्यापारिक तनाव रक्षा, सुरक्षा, छात्रों और पेशेवरों की आवाजाही जैसे अहम पहलुओं को प्रभावित करे. दिल्ली का मानना है कि अमेरिका का कठोर रुख उसे मनचाहा नतीजा नहीं दिला रहा है. दरअसल बताया यह भी जा रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप भारत से इसलिए भी नाराज हैं क्योंकि उसने पाकिस्तान से युद्धविराम को लेकर उन्हें श्रेय न दिया. अखबार के मुताबिक, कूटनीतिक हलकों का मानना है कि अगर भारत केवल इतना कह देता कि राष्ट्रपति ट्रंप ने पाकिस्तान की सेना को समझाने का काम किया, इसके लिए हम आभारी हैं, तो शायद तनाव कम हो सकता था. लेकिन दिल्ली इस बात पर अडिग रही कि भारत-पाकिस्तान के मुद्दों में किसी तीसरे पक्ष की भूमिका स्वीकार्य नहीं है.

फिर भी इस दौरान उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, विदेश मंत्री मार्को रुबियो की एनएसए अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से बातचीत चलती रही. रुबियो ने पाकिस्तान सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से भी बातचीत की. इस तरह ट्रंप के इशारे पर अमेरिका संदेशवाहक की भूमिका निभाता रहा. भारत की तरफ से ट्रंप और उनके करीबियों की तरफ से रोज़ाना आने वाले कड़े बयानों पर भी कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी. एक अधिकारी ने कहा, ‘हर एक बयान का जवाब देना बेकार और नुकसानदेह होता. अन्य साझेदार देशों ने भी यही रणनीति अपनाई है. हमारी चुप्पी ही एक मजबूत कूटनीतिक संदेश है.’

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अब जबकि दोनों ओर से समझदारी भरी आवाजें उठ रही हैं, उम्मीद की जा रही है कि व्यापार वार्ताएं फिर से पटरी पर लौटेंगी और दोनों देश संबंधों को पुनर्जीवित करेंगे. भारत चाहता है कि यह प्रक्रिया शांति से आगे बढ़े और एक ठोस समझौते के बाद ही दोनों नेता आमने-सामने हों. सूत्रों का मानना है कि अगर सब कुछ योजना के मुताबिक रहा, तो यह रास्ता ट्रंप की दिल्ली यात्रा और क्वाड शिखर सम्मेलन में उनकी मौजूदगी तक जा सकता है.

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