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क्या चीन और अमेरिका के बीच ट्रेड वॉर बनेगा तीसरा आर्थिक विश्व युद्ध?

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन पर 125% टैरिफ लगाकर वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला दिया है। जवाब में चीन ने भी 84% का टैक्स लगाकर पलटवार किया है। इस संघर्ष ने दुनिया भर की सप्लाई चेन, निवेशकों का भरोसा और महंगाई की स्थिति को अस्थिर कर दिया है।

क्या चीन और अमेरिका के बीच ट्रेड वॉर बनेगा तीसरा आर्थिक विश्व युद्ध?
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दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अमेरिका और चीन एक बार फिर आमने-सामने हैं। लेकिन इस बार ये सिर्फ एक कारोबारी तकरार नहीं, बल्कि एक पूरी वैश्विक व्यवस्था के भविष्य का सवाल बन गया है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने पूरी दुनिया को झकझोर दिया। उन्होंने चीन पर 125% का भारी टैरिफ (आयात शुल्क) लगा दिया। जवाब में चीन ने भी 84% का पलटवार किया और कहा "हम अंत तक लड़ेंगे!" ये कोई आम बयान नहीं था। ये एलान था एक ऐसे टकराव का जिसमें सिर्फ दो देश नहीं, पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था दांव पर लग गई है।

ट्रंप का बड़ा फैसला और चीन की तीखी प्रतिक्रिया

अमेरिका ने 10 अप्रैल 2025 को यह घोषणा की कि वह अधिकांश देशों पर टैरिफ को रोक रहा है, लेकिन चीन को इस छूट से बाहर रखते हुए उस पर 125% का शुल्क लागू करेगा। इससे चीन से आने वाले सभी उत्पाद चाहे वो स्मार्टफोन हों, कार पार्ट्स या दवाइयां काफी महंगे हो जाएंगे। इसका असर सीधे अमेरिकी जनता की जेब पर पड़ेगा।

इसके जवाब में, चीन ने भी तत्काल प्रभाव से 84% का जवाबी टैरिफ लगाया और एक कड़ा संदेश दिया "संयुक्त राज्य अमेरिका को अब समानता और आपसी सम्मान के आधार पर बात करनी होगी।" चीन के वाणिज्य मंत्रालय की प्रवक्ता हे योंगच्यान ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अमेरिका के टैरिफ वैश्विक व्यापारिक प्रणाली पर सीधा हमला है और चीन इसके खिलाफ डटकर खड़ा रहेगा।

यह टकराव क्यों महत्वपूर्ण है?

यह केवल व्यापारिक आंकड़ों का खेल नहीं है। अमेरिका और चीन, दोनों मिलकर दुनिया के कुल GDP का लगभग 40% योगदान करते हैं। इनका अलग होना यानी वैश्विक सप्लाई चेन में उथल-पुथल, कीमतों में उछाल और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में ठहराव।

ये व्यापार युद्ध एक तरह का "जियोपॉलिटिकल शॉडाउन" बन चुका है, जिसमें एक ओर ट्रंप की आक्रामक रणनीति है, तो दूसरी ओर जिनपिंग की लंबी सोच और तैयारी।

ट्रंप की रणनीति दबाव बनाकर होगी डील

डोनाल्ड ट्रंप हमेशा से "डीलमेकर" की छवि रखते हैं। उन्होंने व्यापार को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हुए चीन पर एक के बाद एक आर्थिक हमले किए हैं। उनका मानना है कि चीन को झुका कर अमेरिका को बड़ा लाभ मिल सकता है।

लेकिन इस बार ट्रंप को भी अंदरूनी दबाव झेलना पड़ रहा है। अमेरिका में मुद्रास्फीति पहले ही ऊँचाई पर है, और टैरिफ का सीधा असर अमेरिकी नागरिकों की जेब पर पड़ रहा है। टेस्ला, एप्पल जैसी अमेरिकी कंपनियों की चीन में गहरी मौजूदगी भी ट्रंप के लिए चिंता का विषय है।

शी जिनपिंग का रुख, तैयारी पूरी है

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने वर्षों पहले ही भविष्य की इस आर्थिक लड़ाई की आहट सुन ली थी। उन्होंने अपने देश को तैयार किया—नई टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भरता, वैकल्पिक बाजारों की तलाश और घरेलू इनोवेशन को बढ़ावा दिया।

2018 में चीन की अमेरिका-निर्भरता जहाँ 20% थी, अब वह घटकर 15% से भी कम रह गई है। कई चीनी कंपनियों ने अपना प्रोडक्शन वियतनाम, मलेशिया और थाईलैंड जैसे देशों में शिफ्ट कर लिया है ताकि टैरिफ से बचा जा सके। जिनपिंग जानते हैं कि इस युद्ध में टिके रहना ही असली जीत होगी। उन्होंने राष्ट्रीयता और आत्मसम्मान की भावना को उभारते हुए देशवासियों को एकजुट किया है ये सिर्फ व्यापार नहीं, "राष्ट्र की प्रतिष्ठा की लड़ाई" है।

वैश्विक असर की बात करें तो सिर्फ चीन और अमेरिका नहीं, पूरी दुनिया इससे प्रभावित होगी। इस व्यापार युद्ध का असर सिर्फ दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा।
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो चुकी है। टेक्नोलॉजी, ऑटोमोबाइल और फार्मा जैसे क्षेत्रों में उत्पादन धीमा पड़ा है। मुद्रास्फीति अमेरिका में नियंत्रण से बाहर होती जा रही है। उपभोक्ता वस्तुएं महंगी हो रही हैं। निवेशकों का विश्वास डगमगा रहा है। बाजारों में अस्थिरता और जोखिम लगातार बढ़ रहा है। भूराजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं। चीन अब यूरोप और एशिया के देशों के साथ रिश्ते मजबूत कर रहा है ताकि अमेरिका की जरूरत कम पड़े।

सबसे खतरनाक बात यह है कि इस जंग में संवाद लगभग बंद हो गया है। ट्रंप प्रशासन ने व्यापार वार्ताओं का नेतृत्व खुद ट्रंप के हाथों में ले लिया है, जिससे चीन को यह नहीं पता कि वह किससे बात करे। वहीं चीन में सारे निर्णय जिनपिंग लेते हैं, और वह अभी झुकने को तैयार नहीं हैं। इससे एक खतरनाक गतिरोध बन गया है जहाँ दोनों पक्ष मानते हैं कि समय उनके पक्ष में है, और कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं।
हीं, बल्कि दो प्रतिस्पर्धी महाशक्तियाँ हैं।

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