Advertisement

Loading Ad...

टैरिफ पर ट्रंप का यू-टर्न, अमेरिका को भारी पड़ेगा नया ट्रेड गेम?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का टैरिफ पर रुख एक बार फिर चर्चा में है। कभी नरम, कभी गरम तेवर अपनाने वाले ट्रंप ने हाल ही में चीन पर 125% तक टैरिफ बढ़ा दिया, जबकि बाकी देशों को 90 दिन की राहत दी है। इस फैसले के पीछे घरेलू और वैश्विक दबावों का असर साफ दिखता है अमेरिका में शेयर बाजार गिरा, विरोध-प्रदर्शन हुए और आर्थिक मंदी की आशंका ने सरकार को पीछे हटने पर मजबूर किया।

Loading Ad...
वॉशिंगटन से एक अजीब सी गर्माहट और नरमी साथ-साथ आई है। कभी सख्त तो कभी नरम—अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का टैरिफ पर बदलता रुख अब न केवल अमेरिका की आंतरिक राजनीति को प्रभावित कर रहा है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी इसका बड़ा असर पड़ रहा है। इस ब्लॉग में हम विस्तार से समझेंगे कि ट्रंप के इस टैरिफ यू-टर्न के पीछे असली वजहें क्या हैं, इसके क्या परिणाम हो सकते हैं और चीन से उनका टकराव अब क्या मोड़ ले सकता है।

चीन पर बरसे ट्रंप, बाकी देशों को दी राहत

डोनाल्ड ट्रंप का सियासी अंदाज़ शुरू से ही कुछ अलग रहा है ना किसी परंपरा की परवाह, ना ही पुराने नियमों की। जब बात आती है वैश्विक व्यापार की, तो वह टैरिफ को हथियार की तरह इस्तेमाल करने में पीछे नहीं हटते। हाल ही में ट्रंप ने ऐलान किया कि वे चीन पर टैरिफ को 104 प्रतिशत से बढ़ाकर 125 प्रतिशत कर रहे हैं, जो 9 अप्रैल से प्रभावी हो गया। लेकिन दिलचस्प बात ये रही कि बाकी देशों यानी ब्राजील, मैक्सिको, यूरोपीय यूनियन, भारत जैसे व्यापारिक साझेदारों को उन्होंने 90 दिन की राहत दी है। यानी इन देशों पर अभी के लिए टैरिफ नहीं बढ़ेगा। इसका मतलब साफ है चीन पर तो गुस्सा बरकरार है, लेकिन बाकी देशों से संबंधों में नरमी बरतनी पड़ी है।

अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रूथ सोशल' पर ट्रंप ने तीखा बयान देते हुए कहा“चीन ने वैश्विक बाज़ारों के प्रति असम्मान दिखाया है, इसलिए हम उस पर 125% का टैरिफ लगा रहे हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि चीन और अन्य देश वर्षों से अमेरिका से व्यापारिक लाभ उठा रहे हैं और अब समय है कि उन्हें इसका मूल्य चुकाना पड़े। लेकिन इसी पोस्ट में उन्होंने एक अलग ही बात भी कह दी “चीन का राष्ट्रपति एक समझदार व्यक्ति है, वह डील करना चाहता है लेकिन शायद उसे नहीं पता कहां से शुरुआत करे।” यह बयान दर्शाता है कि ट्रंप गुस्से और बातचीत के बीच झूल रहे हैं।

फिर टैरिफ पर अचानक नरमी क्यों?
ट्रंप के फैसलों को अगर आप ध्यान से देखें, तो साफ लगता है कि वे अपनी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय छवि को ध्यान में रखकर रणनीतिक चाल चलते हैं। इस बार भी कुछ वैसा ही हुआ। टैरिफ बढ़ाने की घोषणा होते ही अमेरिका समेत दुनिया भर के शेयर बाजारों में उथल-पुथल मच गई। निवेशकों में घबराहट फैल गई और अमेरिका का खुद का स्टॉक मार्केट औंधे मुंह गिरा। हजारों अरब डॉलर की संपत्ति कुछ ही घंटों में वाष्प बन गई।

इसके साथ ही देश के भीतर भी विरोध के स्वर तेज होने लगे। अमेरिका के कई राज्यों में सैकड़ों-हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए और इस टैरिफ नीति के खिलाफ प्रदर्शन करने लगे। खासकर खेती और छोटे व्यवसायों पर इसका असर सीधा पड़ने वाला था। रिपब्लिकन पार्टी को भी इस बात की चिंता सताने लगी कि कहीं यह फैसला ट्रंप की लोकप्रियता को गिरावट की ओर न ले जाए।

दुनियाभर से टकराव क्या अमेरिका झेल पाएगा?

ट्रंप भले ही 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति पर चलते हों, लेकिन अंतरराष्ट्रीय व्यापार के जाल में अब एक देश अकेला कुछ भी नहीं कर सकता। जब ट्रंप ने चीन पर सख्त टैरिफ लगाए, तो चीन ने भी जवाबी टैरिफ लगाने की बात कही। यही नहीं, यूरोपीय यूनियन, मैक्सिको, ब्राजील जैसे बड़े व्यापारिक साझेदारों ने भी चेतावनी दे दी कि वे भी जवाबी एक्शन लेंगे। इससे एक नई 'ट्रेड वॉर' की आशंका गहराने लगी। एक तरफ अमेरिका का अर्थतंत्र पहले ही मुद्रास्फीति और बेरोजगारी से जूझ रहा था, दूसरी तरफ दुनियाभर से व्यापारिक रिश्तों में तनाव नया खतरा बन गया।

विश्लेषकों का मानना है कि अगर ट्रंप टैरिफ पर अड़ जाते, तो अमेरिका को अकेले ही पूरी दुनिया से टकराना पड़ता जो उसकी अर्थव्यवस्था के लिए भारी पड़ सकता था।

अंदरूनी दबाव भी बना कारण

ट्रंप को केवल वैश्विक नहीं, घरेलू दबाव का भी सामना करना पड़ा। अमेरिका के वित्त विभाग और ट्रेजरी ने खुलकर चिंता जताई कि टैरिफ की वजह से बॉन्ड मार्केट में गिरावट आई है। इससे अमेरिका की आर्थिक साख को नुकसान हो सकता है। ट्रेजरी प्रमुख स्कॉट बेसेंस ने यह भी कहा कि अगर यह सिलसिला चलता रहा, तो अमेरिका की दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता खतरे में पड़ सकती है। इसके बाद ट्रंप के भीतर के सर्कल में ही इस नीति पर पुनर्विचार की बातें होने लगीं। यहां तक कि व्हाइट हाउस के भीतर कई सलाहकारों ने ट्रंप को चेताया कि टैरिफ का दांव उल्टा पड़ सकता है।

ट्रंप का यू-टर्न 
जब ट्रंप से टैरिफ पर नरमी की वजह पूछी गई, तो उन्होंने कहा—"यह फैसला मैंने दिल से लिया।" इस एक वाक्य में छिपा है पूरा राजनीतिक और आर्थिक नाटक। इसका मतलब साफ था कि टैरिफ बढ़ाने की योजना किसी विशेषज्ञ सलाह या टीम के साथ चर्चा का नतीजा नहीं थी, बल्कि एक व्यक्तिगत राजनीतिक स्टंट थी, जो भारी पड़ती दिखी तो यू-टर्न लेना पड़ा।

अब सवाल यह है कि अमेरिका और चीन के बीच टकराव किस दिशा में जाएगा? चीन को 125% का टैरिफ झेलना है, लेकिन वह चुप नहीं बैठेगा। आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच कूटनीतिक वार्ताओं का नया दौर शुरू हो सकता है। ट्रंप की नीति में अनिश्चितता एक स्थायी गुण बन गई है। वे कब क्या कहें और कब क्या कर दें कोई नहीं जानता। लेकिन एक बात तय है इस बार के टैरिफ ड्रामे ने यह दिखा दिया है कि वैश्विक बाज़ार अब किसी एक व्यक्ति के फैसले से नहीं चल सकता। और अगर अमेरिका को अपनी आर्थिक शक्ति बनाए रखनी है, तो उसे अकेले नहीं, दुनिया के साथ मिलकर ही चलना होगा।

डोनाल्ड ट्रंप का टैरिफ पर यू-टर्न यह साबित करता है कि भले ही राजनीति में दिखावे के लिए बड़े-बड़े फैसले लिए जाएं, लेकिन आर्थिक सच्चाइयाँ उन्हें जल्दी ही आईना दिखा देती हैं।
Loading Ad...

यह भी पढ़ें

LIVE
अधिक →

Advertisement

Loading Ad...
Loading Ad...
Loading Ad...
अधिक →

Advertisement

Loading Ad...