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ट्रंप की धमकी ने बदला समीकरण, चीन ने भारत को दिया साथ चलने का प्रस्ताव

ट्रंप प्रशासन द्वारा भारत और चीन पर भारी टैरिफ लगाए जाने के बाद वैश्विक बाजारों में हड़कंप मच गया है। अमेरिका की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति अब वैश्विक व्यापार को सीधी चुनौती दे रही है। इस बीच चीन ने पहली बार भारत से अमेरिका के खिलाफ एकजुट होने की अपील की है।

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 एक बार फिर वैश्विक व्यापार के गलियारों में तनाव की लहरें उठ चुकी हैं। और इस बार इस लहर का केंद्र है – अमेरिका का 50% टैरिफ, जिसे लेकर ट्रंप सरकार ने चीन और भारत को खुली धमकी दे दी है।

डोनाल्ड ट्रंप की "अमेरिका फर्स्ट" नीति सिर्फ एक नारा नहीं, अब एक आर्थिक हथियार बन चुकी है। अमेरिका, जो लंबे समय से वैश्विक व्यापार का नेतृत्व करता आया है, अब अपने घरेलू उत्पादन को बचाने के नाम पर आयातित वस्तुओं पर भारी टैरिफ थोप रहा है। भारत और चीन – दोनों को ही अब इस नई व्यापारिक युद्धनीति का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन इस बार कहानी में नया मोड़ आया है।

चीन की नई चाल

बीते सप्ताह, जब अमेरिका ने चीन पर 34% और भारत पर 26% का अतिरिक्त टैरिफ लागू किया, तो दुनिया के शेयर बाजारों में हलचल मच गई। लेकिन असल धमाका तब हुआ, जब बीजिंग में चीनी विदेश मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक चौंकाने वाला बयान आया "भारत और चीन को इस एकतरफा आक्रामकता के खिलाफ एक साथ खड़ा होना चाहिए।"

चीन के भारत स्थित दूतावास के प्रवक्ता यू जिंग ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, "ट्रेड वॉर में कोई विजेता नहीं होता। चीन और भारत, जो कि विश्व के दो सबसे बड़े विकासशील देश हैं, उन्हें अमेरिका की टैरिफ आक्रामकता के खिलाफ संयुक्त रूप से आवाज़ उठानी चाहिए। यह समय एकता का है, टकराव का नहीं।" यह बयान एक साधारण कूटनीतिक प्रतिक्रिया नहीं था। यह अमेरिका को स्पष्ट संदेश था "तुम अकेले नहीं हो जो गठबंधन बना सकते हो।"

चीन के जवाबी टैरिफ लगाने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने अपने ट्रेड सेक्रेटरी के माध्यम से बयान जारी किया  "अगर चीन ने हमारी बात नहीं मानी, तो हम उसके हर उत्पाद पर 50 फीसदी टैक्स लगा देंगे। और भारत भी इस खेल से बाहर नहीं रहेगा।" यह धमकी सिर्फ आर्थिक दबाव नहीं, बल्कि एक नए युग की शुरुआत थी – "आर्थिक शीत युद्ध", जहां हथियार मिसाइल नहीं, टैरिफ और व्यापार नियम हैं।

भारत की चुप्पी में छिपी रणनीति?

भारत सरकार ने फिलहाल इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज़ है। भारत, जो एक ओर अमेरिका का रणनीतिक साझेदार है QUAD और I2U2 जैसे ग्रुप्स में उसके साथ है, वहीं दूसरी ओर चीन के साथ व्यापार में भारी भागीदारी रखता है। भारत की एक्सपोर्ट इंडस्ट्री, खासकर टेक्सटाइल, केमिकल और फार्मा सेक्टर पर अमेरिका के टैरिफ का सीधा असर पड़ने वाला है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब दोराहे पर खड़ा है या तो अमेरिका के साथ रहकर चीन से दूरी बनाए। या चीन के साथ मिलकर एक नया ट्रेड गठबंधन बनाए जो एशिया को पश्चिमी दबाव से मुक्त करे।

चीन की रणनीति, केवल भारत ही क्यों?

चीन के इस वक्तव्य को केवल भारत के संदर्भ में देखना सीमित दृष्टिकोण होगा। असल में, यह चीन की बहुस्तरीय रणनीति का हिस्सा है। अमेरिका के टैरिफ हमलों से जूझ रहे चीन को एहसास है कि अकेले अमेरिका का सामना करना मुश्किल है। इसीलिए वह भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों को साथ लाने की कोशिश में है ताकि एक नया विकासशील राष्ट्रों का गठबंधन बनाया जा सके जो अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती दे सके।

ब्रिक्स का भविष्य और एशियाई समृद्धि की चुनौती

2024 के ब्रिक्स सम्मेलन में जो बातें सिर्फ प्रस्ताव थीं, वो अब ज़मीन पर आकार लेती दिख रही हैं। भारत और चीन दोनों ब्रिक्स के अहम सदस्य हैं। अगर दोनों देश अमेरिका के टैरिफ के खिलाफ एकजुट हो जाएं तो इससे वैश्विक व्यापार समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं। बेंगलुरु स्थित अंतरराष्ट्रीय व्यापार विश्लेषक डॉ. आरती प्रधान कहती हैं, "यह सिर्फ टैरिफ की लड़ाई नहीं है, यह नेतृत्व की लड़ाई है। अमेरिका अब अकेले वैश्विक व्यापार को नियंत्रित नहीं कर सकता। भारत और चीन अगर समझदारी से कदम उठाएं, तो एशिया आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकता है।"

इस पूरी लड़ाई का असर सीधा आम जनता पर पड़ने वाला है। अमेरिका से आने वाली चीज़ें – जैसे टेक गैजेट्स, मेडिकल उपकरण, फूड प्रोडक्ट्स – महंगे हो सकते हैं। वहीं भारत से अमेरिका को एक्सपोर्ट होने वाले सामान जैसे जेम्स, टेक्सटाइल और दवाइयों पर असर पड़ेगा, जिससे इंडस्ट्रीज को झटका लगेगा और नौकरियों पर असर हो सकता है।

क्या भारत-चीन साथ आ सकते हैं?
इतिहास गवाह है कि भारत-चीन के रिश्ते हमेशा तल्ख रहे हैं डोकलाम से लेकर गलवान तक। लेकिन व्यापार की भाषा अलग होती है। जब बात आर्थिक अस्तित्व की आती है, तो पुराने दुश्मन भी साझेदार बन जाते हैं। भारत सरकार की अगली चाल पर सबकी नजरें टिकी हैं। क्या भारत चीन के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार करेगा या अमेरिका के साथ रणनीतिक रिश्तों को प्राथमिकता देगा – यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।

अमेरिका, जो अब तक दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार और नीति-निर्माता रहा है, अब खुद को अकेला पा सकता है अगर भारत और चीन जैसे देश एक हो गए। यह सिर्फ एक टैरिफ वॉर नहीं, बल्कि भविष्य के वैश्विक सत्ता संतुलन की नींव है। अभी सिर्फ संकेत हैं, लेकिन हवा का रुख बदलने में देर नहीं लगती। हो सकता है कि जल्द ही भारत और बीजिंग एक साझा मंच से अमेरिका को जवाब दें।

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