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'ट्रंप को समर्थन चाहिए, सलाह नहीं', जॉन बोल्टन का बड़ा बयान, कहा- मोदी-डोभाल की जोड़ी है 'आदर्श मॉडल'
जॉन बोल्टन के खुलासे के बाद मोदी-डोभाल की जोड़ी अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है. जानिए कैसे ये टीम भारत की सुरक्षा नीति का सबसे मजबूत स्तंभ बनी.
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भारत की राजनीतिक और कूटनीतिक दुनिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की जोड़ी अब एक मिसाल बन चुकी है. यह सिर्फ एक प्रधानमंत्री और उनके सलाहकार की टीम नहीं, बल्कि दो ऐसे व्यक्तित्वों का मेल है जिन्होंने भारत की सुरक्षा और विदेश नीति को एक नई ऊंचाई दी है. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने इस जोड़ी की खुलकर तारीफ की है. उन्होंने इसे “विश्व की सबसे स्थिर और असरदार रणनीतिक साझेदारी” करार दिया है. बोल्टन के इस बयान के बाद फिर से यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि आखिर मोदी-डोभाल की जोड़ी इतनी सफल क्यों है और ट्रंप जैसी ताकतवर शख्सियत अपने कार्यकाल में ऐसी विश्वसनीय टीम क्यों नहीं बना सके?
जॉन बोल्टन का इंटरव्यू और बड़ा खुलासा
एक इंटरव्यू के दौरान जॉन बोल्टन ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी अपने सलाहकारों की विशेषज्ञता पर भरोसा करते हैं, और डोभाल जैसे अनुभवी अफसर पर यह विश्वास भारत की कूटनीतिक मजबूती की रीढ़ है. उन्होंने तुलना करते हुए कहा कि डोनाल्ड ट्रंप ऐसा भरोसा कभी किसी सलाहकार पर नहीं कर पाए. ट्रंप की टीम में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बार-बार बदले गए, नीतियों में निरंतरता की कमी रही और कई बार जल्दबाजी में लिए गए फैसले अमेरिका की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचाते रहे.
ट्रंप की टीम में क्यों नहीं बन पाई स्थिरता?
जॉन बोल्टन ने ट्रंप की आलोचना करते हुए कहा कि ट्रंप ऐसे लोगों को पसंद करते हैं जो उनकी बातों से सहमत हों, न कि वे जो स्वतंत्र सोच और गहन सलाह देते हों. यही वजह थी कि NSA जैसे गंभीर पद पर भी ट्रंप स्थायी चेहरा नहीं रख सके. एक के बाद एक NSA बदलते रहे, जिससे अमेरिका की रणनीति में स्थायित्व नहीं बन पाया. बोल्टन ने कहा कि “एक जिम्मेदार सलाहकार का काम है विकल्पों की समीक्षा करना, लेकिन ट्रंप को केवल समर्थन चाहिए था, सलाह नहीं.” यह रवैया उन्हें एक स्थायी और प्रभावी टीम बनाने से रोकता रहा.
डोभाल की भूमिका क्यों है इतनी अहम?
मई 2014 से लगातार NSA पद पर बने अजीत डोभाल न सिर्फ प्रधानमंत्री के सबसे भरोसेमंद सलाहकार हैं बल्कि भारत की सुरक्षा नीति के सबसे बड़े शिल्पकार भी माने जाते हैं. पाकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक हो, बालाकोट एयर स्ट्राइक हो या चीन के साथ सीमा विवाद हर मौके पर डोभाल की रणनीतिक सोच सामने आई है. उनकी खुफिया पृष्ठभूमि और राष्ट्रीय हितों की गहरी समझ उन्हें बाकी सलाहकारों से अलग बनाती है. मोदी सरकार में उनकी भूमिका केवल एक सलाहकार की नहीं, बल्कि एक नीति निर्माता की रही है, जो पर्दे के पीछे रहकर निर्णायक फैसलों को दिशा देता है.
मोदी-डोभाल की जोड़ी ने भारत को वैश्विक मंचों पर मजबूती से प्रस्तुत किया है. चाहे क्वाड समिट हो या रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत की संतुलित कूटनीति—हर जगह भारत की सोच परिपक्व और स्पष्ट रही है. अजीत डोभाल ने हाल ही में पश्चिम एशिया और यूरोप में कई महत्वपूर्ण वार्ताएं की हैं, जिससे भारत की वैश्विक स्थिति और मजबूत हुई है. वहीं अमेरिका की विदेश नीति ट्रंप कार्यकाल के दौरान कई बार अस्थिर दिखी. सीरिया से अचानक सैन्य वापसी, नॉर्थ कोरिया से अनियमित संवाद और अफगानिस्तान में तालिबान से बातचीत जैसे निर्णयों ने अमेरिका की रणनीति पर सवाल खड़े किए.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अजीत डोभाल की जोड़ी इसलिए सफल है क्योंकि इनमें परस्पर विश्वास, स्पष्ट सोच और दीर्घकालिक रणनीति की समझ है. यह एक ऐसी साझेदारी है जो केवल अधिकार पर नहीं, अनुभव और राष्ट्रहित के आधार पर बनी है. इसके ठीक उलट अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप जैसे शक्तिशाली नेता भी ऐसी भरोसेमंद और स्थिर टीम नहीं बना सके. जॉन बोल्टन का यह खुलासा केवल दो नेताओं की तुलना नहीं, बल्कि यह दर्शाता है कि किसी देश की सुरक्षा नीति में व्यक्तित्वों की भूमिका कितनी अहम होती है. भारत के लिए यह गर्व की बात है कि आज उसकी नीति-निर्माण टीम को दुनिया के रणनीतिकार उदाहरण के रूप में देख रहे हैं.
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