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इस्तांबुल मेयर की गिरफ्तारी से तुर्की में बवाल, सड़कों पर उतरे हजारों लोग!

तुर्की में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है क्योंकि इस्तांबुल के मेयर एक्रेम इमामोग्लू की गिरफ्तारी के खिलाफ देशभर में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, तुर्की सरकार ने अब तक 1,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया है। इस घटना के बाद राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन की सरकार को जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

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 तुर्की में इन दिनों असंतोष की लहर तेज़ी से फैल रही है। इस्तांबुल के मेयर एक्रेम इमामोग्लू की गिरफ्तारी के बाद से पूरे देश में जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। यह केवल एक कानूनी मामला नहीं, बल्कि तुर्की की राजनीति में उथल-पुथल मचाने वाला घटनाक्रम साबित हो रहा है। इस गिरफ्तारी ने राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और उनकी सरकार के खिलाफ देश में गहरा आक्रोश पैदा कर दिया है।

गिरफ्तारी और उस पर मचे बवाल की शुरुआत

बीते बुधवार को इस्तांबुल के मेयर एक्रेम इमामोग्लू को भ्रष्टाचार के आरोपों में हिरासत में लिया गया। इस कार्रवाई के बाद से तुर्की में ऐसा विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ जो पिछले एक दशक में सबसे बड़ा बताया जा रहा है। आंतरिक मंत्री अली येरलिकाया के अनुसार, बीते पांच दिनों में तुर्की के विभिन्न शहरों से 1,133 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया है। यह संख्या लगातार बढ़ रही है और हालात बेकाबू होते जा रहे हैं।

क्या यह गिरफ्तारी राजनीतिक साजिश है?

इमामोग्लू की गिरफ्तारी ऐसे समय पर हुई जब वह राष्ट्रपति चुनाव के लिए संभावित उम्मीदवार माने जा रहे थे। वे मुख्य विपक्षी पार्टी रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी (सीएचपी) के नेता हैं और उनके समर्थन में करीब 15 मिलियन वोट डाले गए थे। इससे साफ ज़ाहिर होता है कि वे तुर्की की राजनीति में एर्दोगन के लिए एक बड़ा खतरा थे।

कई विश्लेषकों का मानना है कि उनकी गिरफ्तारी राजनीतिक रूप से प्रेरित है। एर्दोगन सरकार ने दावा किया है कि अदालतें स्वतंत्र हैं और यह मामला पूरी तरह कानूनी है, लेकिन विपक्षी दल और इमामोग्लू के समर्थक इसे लोकतंत्र पर हमला मान रहे हैं।

सड़कों पर उतरे हजारों लोग, पुलिस से भिड़ंत

गिरफ्तारी के तुरंत बाद, तुर्की के कई बड़े शहरों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। प्रदर्शनकारियों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और लोकतंत्र की रक्षा करने की मांग उठाई। खासकर इस्तांबुल और अंकारा में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। हालांकि सरकार ने कई जगहों पर सभाओं और जुलूसों पर प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन इसके बावजूद विरोध प्रदर्शन नहीं रुके।

रविवार को भी लगातार पांचवें दिन प्रदर्शन जारी रहे, जिनमें पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें देखने को मिलीं। आंतरिक मंत्री अली येरलिकाया के अनुसार, अब तक 123 पुलिसकर्मी इन झड़पों में घायल हो चुके हैं। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया, लेकिन प्रदर्शनकारियों का गुस्सा शांत नहीं हुआ। इस विरोध प्रदर्शन की कवरेज करने वाले पत्रकार भी सरकार के निशाने पर आ गए हैं। तुर्की के पत्रकार संघ ने जानकारी दी कि 9 पत्रकारों को भी हिरासत में लिया गया है, हालांकि उनके खिलाफ कोई स्पष्ट आरोप नहीं बताया गया है। इससे मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।

इमामोग्लू का पलटवार

इमामोग्लू ने अपनी गिरफ्तारी को ‘अकल्पनीय’ करार दिया और जनता से लोकतंत्र की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरने की अपील की। उनका कहना है कि यह कार्रवाई केवल उन्हें चुनावी दौड़ से बाहर करने के लिए की गई है। उनकी पार्टी सीएचपी ने भी उनके समर्थन में प्रदर्शन करने का आह्वान किया है।

राष्ट्रपति एर्दोगन ने स्पष्ट किया है कि यह गिरफ्तारी किसी राजनीतिक साजिश का हिस्सा नहीं है। उन्होंने कहा कि तुर्की में कानून सबके लिए समान है और किसी को भी ‘लोकतंत्र के नाम पर अराजकता फैलाने’ की इजाजत नहीं दी जाएगी। एर्दोगन की पार्टी एके पार्टी के प्रवक्ता ओमर सेलिक ने विपक्ष पर आरोप लगाते हुए कहा कि वे विरोध प्रदर्शनों की आड़ में अपनी कमियों को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।

इस्तांबुल के मेयर की गिरफ्तारी ने तुर्की की राजनीति में हलचल मचा दी है। इस घटना से यह भी साफ हो गया है कि 2028 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले तुर्की में राजनीतिक टकराव और बढ़ सकता है। इस पूरे मामले को देखते हुए अब सवाल यह उठता है कि क्या तुर्की का लोकतंत्र खतरे में है? क्या यह केवल एक कानूनी कार्रवाई है या फिर एर्दोगन सरकार अपने विरोधियों को कुचलने के लिए इसे एक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है?

तुर्की के इस राजनीतिक संकट ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुर्खियां बटोरी हैं। यूरोपीय यूनियन और अमेरिका ने भी इस मामले पर चिंता जताई है। इस्तांबुल के मेयर की गिरफ्तारी और इसके बाद हुए विरोध प्रदर्शनों ने तुर्की में लोकतंत्र की स्थिति को कटघरे में खड़ा कर दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस संकट को कैसे संभालती है और जनता का गुस्सा किस दिशा में जाता है।
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