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ट्रंप के दबाव में बदलेगा रुख, 7 हफ्तों बाद शांति वार्ता की टेबल पर लौटे रूस-यूक्रेन... जानिए क्या बदल पाएगा युद्ध का समीकरण

रूस और यूक्रेन के वार्ताकारों ने सात हफ्तों बाद इस्तांबुल में शांति वार्ता की, जिसका उद्देश्य दोनों राष्ट्रपतियों वोलोदिमीर जेलेंस्की और व्लादिमीर पुतिन के बीच शिखर वार्ता का रास्ता खोलना है. यह बैठक ऐसे समय हुई जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस को चेतावनी दी है कि यदि जल्द समझौता नहीं हुआ, तो सख्त प्रतिबंध लगाए जाएंगे. क्रेमलिन को हालांकि इस वार्ता से ज्यादा उम्मीदें नहीं हैं. बीते दिनों में ट्रंप और जेलेंस्की के रिश्तों में सुधार हुआ है, जबकि पुतिन को लेकर ट्रंप की नाराजगी बढ़ी है.

File Photo
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रूस और यूक्रेन के बीच पिछले तीन सालों से चल रही जंग ने जहां वैश्विक मंच पर अस्थिरता पैदा की है, वहीं अब एक बार फिर उम्मीद की हल्की किरण दिखाई दी है. बुधवार को तुर्किये के इस्तांबुल में दोनों देशों के वार्ताकारों के बीच सात हफ्तों के अंतराल के बाद पहली शांति वार्ता हुई. यह वार्ता ऐसे समय पर हो रही है जब पूरी दुनिया की निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या यह बातचीत किसी ठोस समाधान की ओर बढ़ेगी या एक बार फिर सिर्फ राजनीतिक औपचारिकता बनकर रह जाएगी. खास बात यह है कि इस बैठक के पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दबाव भी अहम भूमिका निभा रहा है, जिन्होंने साफ शब्दों में रूस को चेतावनी दी है कि अगर जल्दी कोई समझौता नहीं हुआ, तो उसे और उसके साझेदार देशों को सख्त नए प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा.

क्या वार्ता से खुलेगा राष्ट्रपतियों की मुलाकात का रास्ता?

यूक्रेन इस बैठक को एक बड़े मौके के रूप में देख रहा है. उसकी स्पष्ट मांग है कि यह बातचीत दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों यानी वोलोदिमीर जेलेंस्की और व्लादिमीर पुतिन के बीच एक प्रत्यक्ष शिखर वार्ता की आधारशिला बने. यूक्रेन का मानना है कि जब तक शीर्ष स्तर पर सीधे संवाद नहीं होगा, तब तक युद्ध को समाप्त करने की कोई वास्तविक संभावना नहीं बन सकती. वहीं क्रेमलिन ने साफ कर दिया है कि इस्तांबुल वार्ता से किसी बड़ी सफलता की उम्मीद फिलहाल बहुत कम है. यह बयान अपने आप में यह दर्शाता है कि रूस फिलहाल किसी निर्णायक समझौते के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है, या फिर वह अपनी शर्तों पर बातचीत को आगे बढ़ाना चाहता है.

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ट्रंप और जेलेंस्की के संबंधों में नया मोड़

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एक दिलचस्प बात यह है कि बीते कुछ समय में ट्रंप और जेलेंस्की के रिश्तों में काफी बदलाव आया है. फरवरी में व्हाइट हाउस में दोनों नेताओं के बीच हुई एक सार्वजनिक बहस ने उनके संबंधों में तल्खी पैदा कर दी थी. लेकिन हाल के हफ्तों में ट्रंप का झुकाव जेलेंस्की की ओर बढ़ता दिखा है, और उनकी पुतिन को लेकर नाराजगी भी खुलकर सामने आई है. यह बदला हुआ रुख इस बात का संकेत है कि अमेरिका अब यूक्रेन के पक्ष में पहले से अधिक खुलकर खड़ा हो रहा है और रूस पर सीधा दबाव बना रहा है. इससे न केवल राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं, बल्कि रणनीतिक फैसलों पर भी इसका गहरा असर पड़ सकता है.

पिछली बैठकों में क्या हुआ था? 

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इस वार्ता से पहले 16 मई और 2 जून को भी दोनों देशों के बीच बैठकों का आयोजन हुआ था. उन बैठकों में हजारों युद्धबंदियों और मृत सैनिकों के शवों का आदान-प्रदान हुआ, जो मानवीय दृष्टिकोण से एक बड़ा कदम था. लेकिन ये वार्ताएं समय में बेहद सीमित थीं. कुल मिलाकर तीन घंटे से भी कम चलीं और युद्ध को रोकने या किसी ठोस राजनीतिक समाधान की दिशा में कोई महत्वपूर्ण प्रगति नहीं हो पाई थी. इससे यह स्पष्ट हुआ कि जब तक दोनों पक्ष गंभीर राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाते, तब तक कोई भी शांति वार्ता केवल प्रतीकात्मक बनकर रह जाती है.

ट्रंप की सख्त चेतावनी 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले सप्ताह बेहद सख्त लहजे में रूस को चेतावनी दी थी कि अगर आने वाले 50 दिनों के भीतर कोई शांति समझौता नहीं हुआ, तो रूस और उन देशों पर, जो उससे ऊर्जा या अन्य वस्तुएं खरीदते हैं, कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाएंगे. यह धमकी केवल रूस को ही नहीं, बल्कि उसके व्यापारिक साझेदारों को भी सीधा संकेत था कि अमेरिका अब इंतजार करने के मूड में नहीं है. लेकिन बाजार की प्रतिक्रिया थोड़ी उलझन भरी रही. वित्तीय बाजारों में हलचल देखी गई, जिससे यह संकेत मिला कि निवेशक ट्रंप की चेतावनी को हल्के में नहीं ले रहे हैं. इससे एक ओर जहां आर्थिक अनिश्चितता बढ़ी है, वहीं यह भी स्पष्ट हुआ है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था इस युद्ध और इसके परिणामों से कितनी गहराई से जुड़ी हुई है.

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बताते चलें कि इस्तांबुल में हुई यह वार्ता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उम्मीदों और आशंकाओं का मिश्रण लेकर आई है. एक ओर जहां यूक्रेन इसे राष्ट्राध्यक्षों के बीच संभावित शिखर वार्ता की ओर पहला कदम मान रहा है, वहीं रूस अब भी बहुत सतर्क और अपनी स्थिति को लेकर कड़ा रुख बनाए हुए है. डोनाल्ड ट्रंप की भूमिका इन घटनाओं को एक नई दिशा में धकेल रही है, जिससे यह सवाल और प्रबल हो गया है कि क्या इस बार कोई ठोस नतीजा निकलेगा या सब कुछ फिर केवल बयानबाज़ी बनकर रह जाएगा. अब दुनिया की नजर इस पर टिकी है कि आने वाले 50 दिनों में क्या पुतिन कोई निर्णायक कदम उठाते हैं या ट्रंप अपने प्रतिबंधों की धमकी को हकीकत में बदलते हैं. शांति की राह अब भी मुश्किल है, लेकिन इस्तांबुल की यह वार्ता शायद उस लंबे रास्ते की पहली ईमानदार कोशिश हो, जिसकी आज दुनिया को सबसे ज्यादा ज़रूरत है.

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