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शी जिनपिंग का राष्ट्रपति मुर्मू को भेजा गया वो सीक्रेट लेटर... जिसने भारत-चीन के रिश्ते सुधारने की रख दी नींव, बिगड़ गया ट्रंप का खेल

अमेरिका की टैरिफ नीति ने वैश्विक व्यापार को झकझोरा, लेकिन इसी बीच भारत-चीन रिश्तों में नई शुरुआत हुई. गलवान संघर्ष के बाद तनावपूर्ण माहौल में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने मार्च 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक गुप्त पत्र भेजकर संबंध सुधारने की इच्छा जताई. संदेश प्रधानमंत्री मोदी तक पहुंचा और जून से दोनों देशों के बीच संवाद फिर शुरू हुआ.

Narenra Modi/ Xi Jinping (File Photo)
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दुनियाभर की राजनीति और अर्थव्यवस्था इस समय अमेरिका की टैरिफ नीति से गहराई से प्रभावित हो रही है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अतिरिक्त शुल्क लगाने के फैसले ने वैश्विक व्यापारिक समीकरण बदल दिए हैं. इसका असर सिर्फ अमेरिका और चीन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारत भी इससे सीधे तौर पर प्रभावित हुआ है. हालांकि, इसी तनावपूर्ण माहौल के बीच एक अहम खबर सामने आई है. बताया जा रहा है कि ट्रंप की इस नीति ने अप्रत्यक्ष रूप से भारत और चीन को करीब लाने का रास्ता बनाया है. इसकी शुरुआत चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के नाम भेजे गए एक गोपनीय पत्र से हुई थी.

शी जिनपिंग के लेटर में क्या लिखा?

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि मार्च 2025 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के नाम एक निजी पत्र भेजा था. इस पत्र में भारत-चीन रिश्तों को सुधारने की इच्छा जताई गई थी. बाद में यह संदेश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पहुंचाया गया. माना जा रहा है कि चीन ने यह कदम बहुत सोच-समझकर उठाया. वजह साफ थी कि भारत अब दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और निवेश के लिहाज से सबसे सुरक्षित और बड़ा बाज़ार है. चीन जानता है कि मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में भारत के साथ अच्छे रिश्ते उसकी मजबूरी भी हैं और जरूरत भी. बता दें साल 2020 में गलवान घाटी में हुए खूनी संघर्ष ने भारत-चीन रिश्तों को गहरी चोट पहुंचाई थी. दोनों देशों के बीच भरोसे की डोर इतनी कमजोर पड़ गई थी कि कई दौर की बातचीत भी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाई. सैनिक तैनाती, सीमा विवाद और आर्थिक तनाव ने रिश्तों को लगभग ठंडे बस्ते में डाल दिया था. लेकिन इस साल एक अप्रत्याशित मोड़ आया.

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बैकचैनल से फिर शुरू हुआ संवाद

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मार्च के इस पत्र के बाद जून 2025 में भारत और चीन के बीच बैकचैनल कम्युनिकेशन की शुरुआत हुई. लंबे समय से अटके मसलों, खासकर गलवान संघर्ष और सीमा विवाद से जुड़े मुद्दों पर बातचीत शुरू हुई. अगस्त में चीन के विदेश मंत्री वांग यी की भारत यात्रा इस प्रक्रिया का हिस्सा बनी. इस दौरान बीजिंग ने नई दिल्ली को आश्वासन दिया कि वह भारत की आर्थिक चिंताओं को दूर करने की दिशा में काम करेगा. इसमें फर्टिलाइज़र, दुर्लभ धातुओं और टनलिंग मशीनों के आयात जैसे मुद्दे शामिल थे.

मोदी-जिनपिंग की मुलाकात पर टिकी नजरें

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ऐसे में अब 31 अगस्त को शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात होने वाली है. यह मोदी की चीन यात्रा सात साल बाद हो रही है. दोनों नेताओं के बीच सीमा विवाद कम करने, व्यापार साझेदारी बढ़ाने और एशिया में स्थिरता लाने पर गहन चर्चा होने की उम्मीद है. विश्लेषकों का मानना है कि यह मुलाकात भारत-चीन रिश्तों में नया मोड़ ला सकती है. इस पूरी कहानी का दिलचस्प पहलू अमेरिका है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाया है, जिससे भारत-अमेरिका रिश्तों में कड़वाहट बढ़ी है. भारत का निर्यात प्रभावित हुआ है और कई सेक्टर्स दबाव में हैं. यही वजह है कि भारत अब नए व्यापारिक विकल्प तलाश रहा है और चीन के साथ साझेदारी इस संदर्भ में अहम साबित हो सकती है.

चीन पर भी पड़ा दबाव

ट्रंप प्रशासन ने चीन पर भी कड़े टैरिफ लगाए हैं. इससे चीन की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा है. अमेरिका और यूरोप में बने तनावपूर्ण हालात के बीच बीजिंग समझ गया है कि एशिया में अगर कोई स्थिर और भरोसेमंद साझेदार है, तो वह भारत है. यही वजह है कि चीन ने गलवान जैसे कठिन अध्याय को पीछे छोड़कर नए सिरे से रिश्ते सुधारने की पहल की है.

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भारत-चीन सहयोग के संभावित क्षेत्र

  • अगर मोदी-जिनपिंग मुलाकात सफल होती है, तो कई क्षेत्रों में भारत-चीन सहयोग बढ़ सकता है.
  • व्यापार और निवेश: टैरिफ बाधाओं को कम करके दोनों देशों के लिए नया अवसर तैयार हो सकता है.
  • खनिज और फर्टिलाइज़र: भारत की ज़रूरतों को पूरा करने में चीन मददगार बन सकता है.
  • टेक्नोलॉजी और मशीनरी: टनलिंग मशीनों और दुर्लभ धातुओं में सहयोग बढ़ सकता है.
  • क्षेत्रीय शांति: एशिया में स्थिरता दोनों देशों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है.

क्यों अहम है भारत-चीन की साझेदारी

भारत और चीन एशिया की दो सबसे बड़ी ताकतें हैं. अगर ये दोनों साथ आते हैं, तो न सिर्फ क्षेत्रीय राजनीति बदल सकती है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी नई ध्रुवीयता बन सकती है. अमेरिका पर निर्भरता घटेगी और एशिया एक नई आर्थिक शक्ति के रूप में उभर सकता है. यह सहयोग निवेश और विकास को बढ़ावा देगा और व्यापारिक अवसरों के नए दरवाजे खोलेगा. 

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बताते चलें कि ट्रंप की टैरिफ नीति ने दुनिया की अर्थव्यवस्था में भूचाल ला दिया है. लेकिन इसी नीति ने भारत और चीन को फिर से करीब आने का मौका दिया है. गलवान संघर्ष के बाद जो दूरी पैदा हुई थी, उसे अब संवाद और कूटनीति के जरिए कम करने की कोशिश हो रही है. आने वाले महीनों में मोदी-जिनपिंग की मुलाकात और आगे की रणनीति तय करेगी कि एशिया का भविष्य किस दिशा में जाएगा. इतना तय है कि भारत अब वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका को और मज़बूती से निभा रहा है और चीन इसे अनदेखा नहीं कर सकता.

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