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नेतन्याहू को सम्मान, जेलेंस्की को अपमान! जानिए क्या है ट्रंप की मास्टरस्ट्रोक नीति

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान खींचा है। जहां एक ओर उन्होंने इजरायल को 12 अरब डॉलर की सैन्य सहायता देने का फैसला लिया, वहीं दूसरी ओर यूक्रेन को किसी ठोस समर्थन से वंचित कर दिया। ओवल ऑफिस में बेंजामिन नेतन्याहू के साथ उनकी गर्मजोशी भरी मुलाकात और व्लोदिमीर जेलेंस्की के प्रति उनकी बेरुखी ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है।

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दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका की नीतियां हमेशा से वैश्विक राजनीति को प्रभावित करती रही हैं। लेकिन जब बात आती है डोनाल्ड ट्रंप की तो यह प्रभाव और भी पेचीदा हो जाता है। अपने दूसरे कार्यकाल में कदम रखते ही ट्रंप ने जिस तरह से इजरायल के समर्थन में खुलकर सैन्य सहायता भेजी और दूसरी ओर यूक्रेन को हथियारों की सप्लाई पर अनिश्चितता में डाल दिया, उसने उनकी विदेश नीति को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है।

ट्रंप प्रशासन का यह रुख क्या संकेत देता है? क्या यह अमेरिका की विदेश नीति में किसी बड़े बदलाव की आहट है? या फिर यह सिर्फ ट्रंप के व्यक्तिगत राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा है? आइए, इस पूरे घटनाक्रम को विस्तार से समझते हैं।

व्हाइट हाउस में दिखी दो तस्वीरें

वर्ष 2025 की शुरुआत से ही अमेरिका की वैश्विक नीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिला। इजरायल और हमास के बीच युद्ध जारी था, और ट्रंप ने सत्ता में आते ही तुरंत इजरायल को सैन्य सहायता की मंजूरी दे दी। 12 अरब डॉलर की इस डील में आधुनिक हथियारों और मिसाइलों की फास्ट-ट्रैक डिलीवरी शामिल थी, जिससे कांग्रेस की सामान्य प्रक्रिया को भी दरकिनार कर दिया गया। दूसरी तरफ, जब यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लोदिमीर जेलेंस्की वॉशिंगटन पहुंचे, तो उनका स्वागत न केवल ठंडा था, बल्कि उनके साथ किया गया व्यवहार भी काफी अपमानजनक था। ओवल ऑफिस में दो अलग-अलग मुलाकातें हुईं – एक नेतन्याहू के साथ, जहां गर्मजोशी और दोस्ती के रंग बिखरे थे, और दूसरी जेलेंस्की के साथ, जहां ट्रंप ने तंज कसते हुए उन्हें "अमेरिका के पैसों पर पलने वाला" तक कह डाला। यह अंतर क्या सिर्फ कूटनीतिक था, या इसके पीछे कोई गहरी रणनीति छुपी थी?

इजरायल और ट्रंप, दोस्ती या रणनीति?

डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के संबंध हमेशा से घनिष्ठ रहे हैं। ट्रंप प्रशासन के दौरान ही अमेरिका ने यरुशलम को इजरायल की राजधानी के रूप में मान्यता दी थी और गोलन हाइट्स पर इजरायल की संप्रभुता को स्वीकार किया था। यही नहीं, ट्रंप ने 2020 में अब्राहम समझौते की मध्यस्थता की, जिससे इजरायल और कुछ अरब देशों के बीच रिश्ते सामान्य हुए। अब जब ट्रंप फिर से सत्ता में हैं, तो उन्होंने इजरायल को एक स्पष्ट संकेत दिया है कि अमेरिका का सबसे करीबी सहयोगी वही रहेगा। ट्रंप का यह रवैया अमेरिकी ईसाई कट्टरपंथी समर्थकों के लिए भी अनुकूल है, जो हमेशा से इजरायल का समर्थन करते आए हैं।

लेकिन यह सब केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि व्यावसायिक और सामरिक रूप से भी फायदेमंद है। इजरायल को दी जाने वाली सैन्य सहायता का एक बड़ा हिस्सा अमेरिकी हथियार कंपनियों को फायदा पहुंचाता है, जिससे अमेरिका की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलती है।

यूक्रेन के लिए क्यों बदली अमेरिका की नीति?

जब बात यूक्रेन की आती है, तो तस्वीर बिल्कुल उलटी नजर आती है। बाइडेन प्रशासन के दौरान अमेरिका ने यूक्रेन को अरबों डॉलर की सहायता दी, ताकि वह रूस के खिलाफ अपना बचाव कर सके। लेकिन ट्रंप की सोच इस मुद्दे पर पूरी तरह अलग है। ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान ही स्पष्ट कर दिया था कि वह "अमेरिका फर्स्ट" की नीति पर चलेंगे और यूक्रेन युद्ध में अमेरिका की भूमिका कम करेंगे। सत्ता में आते ही उन्होंने इस नीति को लागू करना शुरू कर दिया।

ओवल ऑफिस में जेलेंस्की के साथ मुलाकात के दौरान उप राष्ट्रपति जेडी वेन्स ने सीधे-सीधे सवाल किया, "क्या आपने एक बार भी अमेरिका का धन्यवाद किया?" जेलेंस्की ने जवाब दिया, "बहुत बार," लेकिन इसके बावजूद उनका अपमान किया गया और उन्हें किसी ठोस आश्वासन के बिना ही व्हाइट हाउस छोड़ना पड़ा। ट्रंप का मानना है कि यूक्रेन युद्ध को अब खत्म होना चाहिए और इसके लिए उन्हें रूस के साथ बातचीत करनी चाहिए। यही वजह है कि उन्होंने जेलेंस्की से कहा, "आप तीसरे विश्व युद्ध का जुआ खेल रहे हैं," और रूस के साथ किसी तरह की शांति वार्ता करने का सुझाव दिया। ट्रंप प्रशासन के इस फैसले पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि यह अमेरिका की दोहरी नीति को दर्शाता है, जहां वह अपने करीबी सहयोगियों को बिना किसी शर्त के समर्थन देता है, लेकिन दूसरे देशों को अपने हितों के आधार पर सहायता देता है।

हालांकि, इस फैसले के पीछे कुछ ठोस तर्क भी दिए जा रहे हैं, जैसे आर्थिक प्राथमिकता, अमेरिका अब यूक्रेन युद्ध में और अधिक खर्च नहीं करना चाहता। ट्रंप का मानना है कि रूस से बातचीत के जरिए युद्ध को खत्म किया जा सकता है। ट्रंप के अनुसार, अमेरिका को अपने नागरिकों और अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता देनी चाहिए। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप की यह रणनीति सफल होगी? इजरायल को खुला समर्थन देकर ट्रंप ने अमेरिका के मजबूत यहूदी लॉबी को खुश कर दिया है, जिससे उन्हें घरेलू राजनीति में भी फायदा हो सकता है। दूसरी तरफ, यूक्रेन को नजरअंदाज करके उन्होंने अमेरिका के कुछ हिस्सों में उस धड़े को संतुष्ट किया है, जो युद्ध में अनावश्यक खर्च के खिलाफ है।

अब सवाल यह उठता है कि क्या इससे अमेरिका की वैश्विक साख को नुकसान पहुंचेगा? क्या यूक्रेन खुद को अमेरिका से दूर करने लगेगा? क्या ट्रंप की यह नीति यूरोप में अमेरिका के सहयोगियों के साथ तनाव बढ़ाएगी? इन सभी सवालों के जवाब आने वाले महीनों में मिलेंगे। लेकिन इतना तय है कि डोनाल्ड ट्रंप की यह रणनीति दुनिया की राजनीति को एक नए मोड़ पर ले जा रही है। लेकिन एक बात तय है – अमेरिका की विदेश नीति में एक नया अध्याय लिखा जा रहा है, जिसमें दोस्ती और राजनीति के बीच की रेखा पहले से कहीं अधिक धुंधली हो गई है।
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