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'ओलिगार्की' जो बाइडन के विदाई भाषण का सबसे अहम हिस्सा, आखिर क्या है ये?

अमेरिका के निवर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडन ने अपने विदाई भाषण में लोकतंत्र पर मंडराते खतरों की ओर इशारा किया और "ओलिगार्की" यानी कुलीनतंत्र का उल्लेख किया। ओलिगार्की का अर्थ है सत्ता का केंद्रीकरण एक छोटे से समूह या कुलीन वर्ग के हाथों में, जो समाज के बड़े हिस्से के हितों को नजरअंदाज करते हुए अपने स्वार्थ को आगे बढ़ाते हैं।

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अमेरिका के निवर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडन ने अपने विदाई भाषण में लोकतंत्र की मजबूती और उससे जुड़े खतरों की चर्चा की। उन्होंने ओलिगार्की यानी कुलीनतंत्र का जिक्र करते हुए इस बात पर प्रकाश डाला कि अमेरिका के लोकतंत्र को किस तरह से एक छोटा, प्रभावशाली और शक्तिशाली समूह नुकसान पहुंचा सकता है। बाइडन ने अपने भाषण में चेतावनी दी कि यह कुलीनतंत्र न केवल सत्ता और धन को अपने कब्जे में ले रहा है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थानों और उनकी ताकत को कमजोर कर रहा है। आज हम समझेंगे कि ओलिगार्की क्या है, इसका ऐतिहासिक और आधुनिक संदर्भ, और बाइडन ने इसे लेकर क्या इशारा किया है?

ओलिगार्की शब्द का अर्थ

ओलिगार्की शब्द की जड़ें प्राचीन ग्रीक सभ्यता से जुड़ी हैं। यह ग्रीक भाषा के दो शब्दों से बना है—ओलिगोस (कम) और आर्के (शासन)। इसका सीधा अर्थ है ‘कम लोगों का शासन’। इस शब्द का सबसे पहले व्यवस्थित रूप से उल्लेख प्रसिद्ध ग्रीक दार्शनिक अरस्तू ने अपनी पुस्तक द पॉलिटिक्स में किया था। अरस्तू ने इसे शासन व्यवस्था का एक ऐसा रूप बताया, जहां सत्ता कुछ खास लोगों के हाथों में केंद्रित होती है और यह समूह आम जनता की भलाई की जगह अपने निजी स्वार्थों को प्राथमिकता देता है।

अरस्तू ने शासन के छह रूपों की चर्चा की, जिन्हें दो समूहों में बांटा जा सकता है—एक जो जनता की भलाई के लिए काम करता है और दूसरा जो स्वार्थी उद्देश्य के लिए। जब शासन कुछ लोगों के हित साधने के लिए होता है, तो इसे ओलिगार्की कहा गया। अरस्तू के मुताबिक, यह शासन का भ्रष्ट और अनैतिक स्वरूप है। समय के साथ ओलिगार्की का अर्थ ज्यादा स्पष्ट और व्यावहारिक हो गया। आधुनिक संदर्भ में, यह एक ऐसी व्यवस्था को दर्शाता है, जहां राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक शक्ति का बड़ा हिस्सा किसी छोटे समूह या वर्ग के पास होता है। यह व्यवस्था धनवान वर्ग, बड़े व्यवसायियों, राजनीतिक प्रभावशाली समूहों और कुलीन संस्थाओं से संचालित होती है।

रूस और चीन में ओलिगार्की का उदय

ओलिगार्की का सबसे स्पष्ट उदाहरण रूस और चीन में देखने को मिलता है। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद, रूस में कई व्यवसायियों ने सरकारी संसाधनों को सस्ते दामों पर खरीदकर भारी संपत्ति अर्जित की। ये लोग न केवल अमीर बने, बल्कि राजनीति और मीडिया पर भी अपना वर्चस्व कायम कर लिया। हालांकि व्लादिमीर पुतिन के नेतृत्व में कुछ नियंत्रण लगाया गया, लेकिन सत्ता का केंद्रीकरण जारी रहा। चीन में भी साम्यवादी सरकार के बावजूद कुलीन वर्ग का उदय हुआ। यहां कुछ प्रभावशाली समूहों ने बड़ी आर्थिक संपत्तियां जमा कीं और सत्ता पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित किया।

अमेरिका में ओलिगार्की की चेतावनी

जो बाइडन ने अपने भाषण में अमेरिकी लोकतंत्र पर बढ़ते खतरे को रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिकी राजनीति और नीति-निर्माण अब आम जनता की अपेक्षाओं के बजाय अमीर और प्रभावशाली वर्ग के इशारों पर चलने लगी है। बाइडन ने उन अरबपतियों का उल्लेख किया, जो राजनीतिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित कर सकते हैं। जैसे—एलन मस्क, जेफ बेजोस, मार्क जुकरबर्ग, और सुंदर पिचाई। इनमें से कई लोगों के पास अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स हैं, जो जनमत को प्रभावित करने की शक्ति रखते हैं।

बाइडन ने इशारा किया कि यदि डोनाल्ड ट्रंप फिर से सत्ता में आते हैं, तो लोकतंत्र पर और भी बड़ा खतरा मंडरा सकता है। उनके अनुसार, ट्रंप के नेतृत्व में लोक नीति अमीरों की आवश्यकताओं को पूरा करेगी, न कि आम लोगों की। ओलिगार्की और लोकतंत्र हमेशा एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है जनता की भागीदारी और समानता, जबकि ओलिगार्की सत्ता और संपत्ति को कुछ लोगों तक सीमित कर देती है। अरस्तू के विचारों के अनुसार, जब लोकतंत्र कमजोर होता है, तो ओलिगार्की उसे अपने हाथों में लेने लगती है। अमेरिका में आज यही देखने को मिल रहा है। बाइडन का भाषण उन डेमोक्रेट्स की भावनाओं को व्यक्त करता है, जो मानते हैं कि ट्रंप का नेतृत्व लोकतांत्रिक संस्थानों को और कमजोर कर देगा।

हालांकि यह बहस मुख्य रूप से पश्चिमी देशों में केंद्रित है, लेकिन भारत में भी ओलिगार्की के संकेत मिलते हैं। यहां भी बड़े व्यवसायी, राजनीतिक परिवार, और प्रभावशाली मीडिया हाउस सत्ता के केंद्र में हैं। आम जनता की आवाजें कई बार इन प्रभावशाली समूहों के शोर में दब जाती हैं। बाइडन का यह बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह वैश्विक राजनीति के लिए एक चेतावनी है। ओलिगार्की का बढ़ता प्रभाव लोकतंत्र के लिए घातक हो सकता है। यह न केवल नीति-निर्माण को प्रभावित करता है, बल्कि समाज में असमानता को भी बढ़ावा देता है।

ओलिगार्की का मुद्दा केवल अमेरिका या रूस तक सीमित नहीं है। यह एक वैश्विक समस्या है, जो हर लोकतांत्रिक देश को प्रभावित कर सकती है। बाइडन का यह भाषण एक विचारणीय पहलू प्रस्तुत करता है कि यदि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को मजबूत नहीं किया गया, तो ओलिगार्की धीरे-धीरे हर समाज को अपनी गिरफ्त में ले सकती है।
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