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‘न सीजफायर के लिए कहा, न बातचीत की मांग की...’, ट्रंप के दावे पर ईरान का दो टूक जवाब, कहा- जब तक जरूरी होगा लड़ेंगे युद्ध

मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के बीच ईरान ने साफ किया है कि उसने न सीजफायर की मांग की है और न ही बातचीत की पहल की है. विदेश मंत्री अब्बास अराघची के मुताबिक ईरानी सेना जरूरत पड़ने तक युद्ध जारी रखेगी.

Abbas Araghchi (File Photo)
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मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष थमने का नाम नहीं ले रहा है. हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि आने वाले दिनों में यह संकट और गहरा सकता है. इस बीच ईरान ने साफ कर दिया है कि उसने न तो किसी तरह के सीजफायर की मांग की है और न ही बातचीत की पहल की है. ईरान का कहना है कि जब तक जरूरत होगी, उसके सशस्त्र बल इस युद्ध को जारी रखेंगे. ईरान के इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता और बढ़ा दी है, क्योंकि इस संघर्ष का असर अब दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ने लगा है.

ईरान के विदेश मंत्री का बड़ा बयान

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने एक इंटरव्यू में कहा कि ईरान ने युद्धविराम के लिए किसी से अनुरोध नहीं किया है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बातचीत की कोई आधिकारिक मांग भी नहीं की गई है. ईरान की सरकारी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक विदेश मंत्री ने कहा कि देश के सशस्त्र बल तब तक युद्ध जारी रखेंगे, जब तक उसे जरूरी समझा जाएगा. करीब तीन सप्ताह से ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच तनाव और सैन्य टकराव जारी है. इस कारण पूरे मिडिल ईस्ट में अस्थिरता का माहौल बन गया है.

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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर बढ़ी चिंता

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इस संघर्ष का सबसे बड़ा असर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर दिखाई दे रहा है. यह समुद्री रास्ता दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक माना जाता है. रिपोर्ट के अनुसार, अराघची ने कहा कि ईरान ने इस जलमार्ग को पूरी तरह से बंद नहीं किया है. हालांकि अमेरिकी हमलों के कारण इस क्षेत्र में असुरक्षा का माहौल बन गया है. इसी वजह से कई जहाज इस रास्ते से गुजरने से बच रहे हैं. उन्होंने यह भी बताया कि कुछ देशों ने ईरान से अनुरोध किया है कि उनके जहाजों को सुरक्षित रास्ता दिया जाए. हालांकि इस बारे में अंतिम फैसला ईरान के सैन्य बलों को लेना है. माना जाता है कि दुनिया की करीब 20 फीसदी तेल आपूर्ति इसी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुजरती है. मौजूदा हालात के कारण इस रास्ते पर जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है. कई रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि सैकड़ों जहाज इस समुद्री मार्ग पर फंसे हुए हैं. वहीं कई शिपिंग कंपनियों और तेल निर्यातकों ने सुरक्षा कारणों से अपनी गतिविधियां सीमित कर दी हैं.

कैसे शुरू हुआ यह संघर्ष?

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दरअसल यह संघर्ष उस समय और तेज हो गया, जब 28 फरवरी को इजराइल और अमेरिका ने ईरान पर हमले किए. उनका कहना था कि वे ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों को निशाना बना रहे हैं. साथ ही ईरान की जनता से अपने नेताओं के खिलाफ खड़े होने की अपील भी की गई थी. इसके जवाब में ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए इजराइल और फारस की खाड़ी के आसपास के कई देशों की ओर मिसाइल और ड्रोन हमले किए.

कई देशों तक पहुंचा टकराव

इस दौरान संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, सऊदी अरब, कतर और ओमान जैसे देशों की ओर भी मिसाइल और ड्रोन दागे जाने की खबरें सामने आईं. ईरान का दावा है कि उसका निशाना अमेरिकी सैन्य ठिकाने थे. हालांकि कई जगहों पर हवाई अड्डों और रिहायशी इलाकों के पास भी हमलों की खबरें आईं.

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बताते चलें कि मिडिल ईस्ट में जारी यह टकराव अब वैश्विक चिंता का कारण बन चुका है. खासकर तेल आपूर्ति पर पड़ रहे असर ने भारत समेत कई देशों के लिए ऊर्जा संकट की आशंका बढ़ा दी है. विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो इसका असर दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार दोनों पर गहरा पड़ सकता है. फिलहाल दुनिया की नजरें इसी बात पर टिकी हैं कि क्या आने वाले दिनों में इस तनाव को कम करने के लिए कोई कूटनीतिक रास्ता निकल पाएगा या नहीं.

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