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23 साल से फरार मोनिका कपूर अमेरिका में गिरफ्तार, CBI ला रही भारत – जानिए पूरा मामला

23 साल से फरार चल रही मोनिका कपूर को सीबीआई ने अमेरिका से गिरफ़्तार किया है. वह 2002 के एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट घोटाले की मुख्य आरोपी है. Monika Overseas की प्रोपराइटर रहते हुए, उसने अपने भाइयों के साथ मिलकर फर्जी दस्तावेजों के ज़रिए करोड़ों की धोखाधड़ी को अंजाम दिया था. अब उसे सीबीआई की विशेष टीम प्रत्यर्पित कर भारत ला रही है.

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भारतीय जांच एजेंसी सीबीआई को 23 साल बाद एक बड़ी कामयाबी हाथ लगी है. 2002 के चर्चित इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट धोखाधड़ी मामले की मुख्य आरोपी मोनिका कपूर को अमेरिका से प्रत्यर्पित करके भारत लाया जा रहा है. मोनिका कपूर, जो पिछले दो दशकों से कानून की पकड़ से दूर भागती फिर रही थी, अब सीबीआई की गिरफ्त में है. अमेरिका की धरती से उसे भारत लाना एक लम्बी और जटिल प्रक्रिया का हिस्सा रहा.

क्या है पूरा मामला?
मोनिका कपूर, Monika Overseas नाम की एक इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट कंपनी की प्रोपराइटर थी. साल 1998 में उसने अपने दो भाइयों, राजन खन्ना और राजीव खन्ना के साथ मिलकर एक सुनियोजित फर्जीवाड़ा अंजाम दिया. इस गिरोह ने नकली एक्सपोर्ट डॉक्युमेंट्स जैसे शिपिंग बिल्स, फर्जी इनवॉयस और झूठे बैंक सर्टिफिकेट्स का इस्तेमाल करके कुल 6 Replenishment Licenses हासिल किए. इन लाइसेंसों की मदद से करीब 2.36 करोड़ रुपये का ड्यूटी-फ्री सोना विदेशों से मंगवाया गया. लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई. इन लाइसेंसों को बाद में अहमदाबाद की एक कंपनी Deep Exports को प्रीमियम रेट पर बेच दिया गया. Deep Exports ने इनका इस्तेमाल कर विदेश से सोना मंगवाया और इस पूरे खेल से सरकार को लगभग 1.44 करोड़ रुपये का सीधा नुकसान हुआ. यह मामला न केवल आर्थिक अपराध की गंभीरता को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि किस तरह से दस्तावेज़ों की हेराफेरी कर सिस्टम को चकमा दिया गया.

CBI की जांच और कोर्ट की कार्यवाही
सीबीआई को इस घोटाले की जांच 31 मार्च 2004 को मोनिका कपूर, राजन खन्ना और राजीव खन्ना के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 120-B (आपराधिक साजिश), 420 (धोखाधड़ी), 467 (जालसाजी), 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी) और 471 (जालसाज़ी से बनी चीज़ का इस्तेमाल) के तहत चार्जशीट दाखिल की गई. 20 दिसंबर 2017 को दिल्ली की साकेत कोर्ट ने राजन और राजीव खन्ना को दोषी करार दे दिया. लेकिन मोनिका कपूर जांच और सुनवाई के दौरान ही फरार हो गई. कोर्ट ने 13 फरवरी 2006 को मोनिका कपूर को Proclaimed Offender घोषित कर दिया. इसके बाद 2010 में उसके खिलाफ इंटरपोल द्वारा Red Corner Notice जारी किया गया. 

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लंबी चली प्रत्यर्पण की प्रक्रिया
2010 में भारत सरकार ने औपचारिक रूप से अमेरिका को मोनिका कपूर के प्रत्यर्पण की रिक्वेस्ट भेजी. यह प्रक्रिया सरल नहीं थी. अमेरिका के कानून, वहां की न्यायिक प्रणाली और अंतरराष्ट्रीय संधियों की जटिलताओं के चलते मामला कई वर्षों तक लंबित रहा. लेकिन सीबीआई ने हार नहीं मानी. एजेंसी की कानूनी टीम ने अमेरिका की एजेंसियों के साथ निरंतर संपर्क में रहकर सभी औपचारिकताओं को पूरा किया. इसके बाद आखिरकार 2025 में अमेरिकी अधिकारियों ने मोनिका कपूर को भारत को सौंपने की स्वीकृति दी. सीबीआई की एक विशेष टीम अमेरिका गई और उसे कस्टडी में लेकर भारत लौटी. मोनिका कपूर को अब भारतीय अदालत में पेश किया जाएगा, जहां वो अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब देगी. यह घटना भारत की न्यायिक और जांच प्रणाली के लिए एक मिसाल बन सकती है, खासकर ऐसे मामलों में जहां आरोपी विदेशों में जाकर छिपने की कोशिश करते हैं.

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सरकार और एजेंसियों की सजगता का नतीजा
मोनिका कपूर का प्रत्यर्पण न केवल सीबीआई की एक बड़ी जीत है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि कोई भी आरोपी चाहे जितना भी ताकतवर हो या कितनी भी दूर चला जाए, भारतीय कानून से बच नहीं सकता. अब जब मोनिका कपूर भारत लाई जा चुकी है, तो अदालत में ट्रायल की प्रक्रिया दोबारा शुरू होगी. उसे पूछताछ के लिए सीबीआई की रिमांड पर लिया जा सकता है और उसके खिलाफ पहले से मौजूद सबूतों के आधार पर न्यायिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा. अगर कोर्ट उसे दोषी करार देती है, तो उसे लंबे समय की सज़ा भी हो सकती है. 

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