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भारत की मदद से अमेरिका में बनेगी सबसे बड़ी रिफाइनरी, रिलायंस इंडस्ट्रीज करेगी 300 अरब डॉलर का बड़ा निवेश

करीब 50 साल बाद अमेरिका में नई ऑयल रिफाइनरी बनने जा रही है, जिसमें रिलायंस इंडस्ट्रीज बड़ा निवेश करेगी. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे 300 अरब डॉलर की ऐतिहासिक ऊर्जा डील बताते हुए कहा कि इससे अमेरिका की ऊर्जा क्षमता और राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत होगी.

Mukesh Ambani/ Donald Trump (File Photo)
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अमेरिका के ऊर्जा क्षेत्र में एक बड़ी और ऐतिहासिक पहल की घोषणा हुई है. लगभग आधी सदी बाद अमेरिका में एक नई ऑयल रिफाइनरी बनने जा रही है. इस परियोजना को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि इसमें भारत की दिग्गज कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज (Reliance Industries) का बड़ा निवेश बताया जा रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने इस परियोजना को अमेरिका के इतिहास की सबसे बड़ी ऊर्जा डील में से एक बताया है.

ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर इस सौदे का जिक्र करते हुए कहा कि यह करीब 300 अरब डॉलर का समझौता है, जो अमेरिका की ऊर्जा क्षमता को मजबूत करने के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा को भी नई ताकत देगा. उन्होंने भारतीय उद्योगपति मुकेश अंबानी और रिलायंस इंडस्ट्रीज का इस बड़े निवेश के लिए आभार भी जताया. इस घोषणा के बाद ऊर्जा बाजार और वैश्विक निवेश जगत में हलचल तेज हो गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह परियोजना पूरी तरह साकार होती है तो यह अमेरिका और भारत के बीच ऊर्जा सहयोग का एक नया अध्याय साबित हो सकती है.

टेक्सास में बनेगी नई रिफाइनरी

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इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत अमेरिका के टेक्सास राज्य के ब्राउन्सविले बंदरगाह पर नई ऑयल रिफाइनरी का निर्माण प्रस्तावित है. इस परियोजना को अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग नाम की कंपनी विकसित कर रही है. ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह रिफाइनरी न केवल अमेरिका की ऊर्जा उत्पादन क्षमता बढ़ाएगी बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पर भी अरबों डॉलर का सकारात्मक असर डालेगी. ट्रंप ने अपने बयान में यह भी कहा कि इस परियोजना को आधुनिक तकनीक के साथ विकसित किया जाएगा ताकि इसे दुनिया की सबसे स्वच्छ और पर्यावरण-अनुकूल रिफाइनरियों में शामिल किया जा सके.

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अमेरिकी शेल ऑयल पर रहेगा खास फोकस

नई रिफाइनरी की सबसे बड़ी खासियत यह होगी कि इसे इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि यह पूरी तरह अमेरिकी लाइट शेल ऑयल को प्रोसेस कर सके. अमेरिका में शेल ऑयल के विशाल भंडार मौजूद हैं, लेकिन उसे रिफाइन करने के लिए पर्याप्त क्षमता अब तक विकसित नहीं हो सकी है. परियोजना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि यह रिफाइनरी उस कमी को काफी हद तक दूर कर सकती है. ट्रे ग्रिग्स, जो अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग के अध्यक्ष हैं, ने कहा कि अमेरिका के पास शेल ऑयल की भरपूर उपलब्धता है, लेकिन उसे प्रोसेस करने के लिए रिफाइनिंग क्षमता सीमित है. नई परियोजना इस अंतर को कम करने में मदद करेगी और घरेलू ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाएगी. जानकारों के अनुसार यदि अमेरिका अपने शेल ऑयल का अधिक उपयोग करने लगता है तो इससे उसे ऊर्जा के मामले में बाहरी देशों पर निर्भरता कम करनी पड़ेगी.

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20 साल का बड़ा तेल समझौता

इस परियोजना के साथ एक लंबी अवधि का बड़ा तेल समझौता भी जुड़ा हुआ है. जानकारी के अनुसार करीब 20 वर्षों के लिए शेल ऑयल की खरीद, प्रोसेसिंग और वितरण का प्लान बनाया गया है. परियोजना से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि इस अवधि में लगभग 1.2 अरब बैरल अमेरिकी शेल ऑयल को प्रोसेस किया जाएगा. इसकी अनुमानित कीमत करीब 125 अरब डॉलर बताई जा रही है. इस रिफाइनिंग प्रक्रिया के बाद लगभग 50 अरब गैलन रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद तैयार किए जाने का अनुमान है. इन उत्पादों की कुल बाजार कीमत करीब 175 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है. यह आंकड़े बताते हैं कि यह परियोजना केवल एक रिफाइनरी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अमेरिका के ऊर्जा उद्योग और वैश्विक तेल बाजार के लिए भी बड़ा आर्थिक महत्व रखती है.

वैश्विक तेल बाजार के बीच अहम समय

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यह घोषणा ऐसे समय में हुई है जब वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता लगातार बढ़ रही है. मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और भू-राजनीतिक संघर्षों के कारण तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है. खास तौर पर इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक बाजार को प्रभावित किया है. इसी दौरान कच्चे तेल की कीमतें एक समय लगभग 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं. ऐसे माहौल में अमेरिका का घरेलू ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने की दिशा में कदम उठाना कई विशेषज्ञों के लिए रणनीतिक महत्व रखता है. उनका मानना है कि इससे भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में मदद मिल सकती है.

भारत-अमेरिका ऊर्जा सहयोग का नया संकेत

इस परियोजना में भारत की बड़ी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज की संभावित भागीदारी को भी काफी अहम माना जा रहा है. यदि यह निवेश पूरी तरह लागू होता है तो यह भारत और अमेरिका के बीच ऊर्जा सहयोग को नई दिशा दे सकता है. हालांकि इस सौदे को लेकर अभी तक रिलायंस इंडस्ट्रीज या अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग की ओर से विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है. इसके बावजूद ट्रंप प्रशासन का दावा है कि यह परियोजना अमेरिकी ऊर्जा क्षेत्र के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हो सकती है.

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ऐसे में कुल मिलाकर देखा जाए तो यह योजना केवल एक रिफाइनरी बनाने की पहल नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार और आर्थिक सहयोग से जुड़ा एक बड़ा रणनीतिक कदम माना जा रहा है. आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह महत्वाकांक्षी परियोजना वैश्विक ऊर्जा बाजार पर कितना असर डालती है.

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