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UN में भारत का खुला स्टैंड, ईरान के खिलाफ लाए गए निंदा प्रस्ताव पर किया ‘NO’ वोट; हैरान रह गए पश्चिमी देश

UNHRC के 39वें विशेष सत्र में भारत ने ईरान के खिलाफ लाए गए पश्चिमी निंदा प्रस्ताव का विरोध करते हुए ‘NO’ वोट दिया. प्रस्ताव ईरान में 28 दिसंबर 2025 से शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों और कथित मानवाधिकार उल्लंघनों से जुड़ा था.

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संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 39वें विशेष सत्र में बुधवार को वैश्विक राजनीति का एक अहम मोड़ देखने को मिला. ईरान में मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर पश्चिमी देशों द्वारा लाए गए निंदा प्रस्ताव पर भारत ने खुलकर ईरान का समर्थन किया. भारत ने इस प्रस्ताव पर न केवल तटस्थ रहने से इनकार किया, बल्कि सीधे ‘NO’ वोट डालकर अमेरिका और यूरोपीय देशों को चौंका दिया. यह फैसला भारत की विदेश नीति में एक बड़े और स्पष्ट बदलाव के रूप में देखा जा रहा है.

क्या था विवादित प्रस्ताव?

यह मतदान प्रस्ताव संख्या A/HRC/S-39/L.1 पर हुआ. प्रस्ताव का उद्देश्य ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान में मानवाधिकारों की बिगड़ती स्थिति’ की निंदा करना था. पश्चिमी देशों ने यह प्रस्ताव 28 दिसंबर 2025 से ईरान में शुरू हुए राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में पेश किया था. उनका तर्क था कि ईरान सरकार ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की, जो मानवाधिकारों का उल्लंघन है. हालांकि कई विकासशील देशों ने इसे मानवाधिकारों से ज्यादा पश्चिमी राजनीतिक एजेंडा बताया.

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वोटिंग के नतीजों ने बांटी दुनिया

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जैसे ही वोटिंग के परिणाम स्क्रीन पर आए, असेंबली हॉल में सन्नाटा छा गया. कुल 46 सदस्य देशों ने मतदान में हिस्सा लिया.

प्रस्ताव के पक्ष में 'YES' वोट- 25
प्रस्ताव के खिलाफ 'NO' वोट- 07
तटस्थ रहे 'ABSTAIN'- 14

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भारत उन चुनिंदा सात देशों में शामिल रहा जिन्होंने इस प्रस्ताव को पूरी तरह खारिज कर दिया.

‘NO’ में भारत के साथ कौन-कौन से देश?

भारत ने इस बार अपनी पारंपरिक ‘तटस्थ नीति’ से हटकर सीधा विरोध दर्ज कराया. भारत के साथ इस खेमे में चीन, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, इराक, वियतनाम और क्यूबा शामिल थे. यह एक दुर्लभ दृश्य था, जब भारत, चीन और पाकिस्तान किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक ही मुद्दे पर एक साथ खड़े नजर आए. इस एकजुटता ने पश्चिमी देशों को असहज कर दिया.

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पश्चिमी देशों का दबदबा YES खेमा

अमेरिका ने भले ही पर्दे के पीछे से भूमिका निभाई, लेकिन यूरोपीय देशों ने खुलकर प्रस्ताव का समर्थन किया. फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, यूनाइटेड किंगडम, जापान, दक्षिण कोरिया, अर्जेंटीना, चिली और कोस्टा रिका जैसे देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया. यूरोपीय यूनियन के समर्थन ने इस प्रस्ताव को संख्यात्मक बढ़त दिलाई.

तटस्थ देशों की रणनीति

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ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, कतर, कुवैत, मलेशिया और बांग्लादेश सहित 14 देशों ने मतदान से दूरी बनाए रखी. इन देशों का मानना था कि मानवाधिकारों के मुद्दे पर संवाद जरूरी है, लेकिन किसी देश के आंतरिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप समाधान नहीं है.

भारत के ‘NO’ वोट के गहरे मायने

जानकारों के अनुसार भारत का यह कदम केवल ईरान के समर्थन तक सीमित नहीं है. भारत ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि वह पश्चिमी दबाव में आकर अपने फैसले नहीं बदलेगा. ईरान के साथ भारत के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और ऊर्जा संबंध लंबे समय से मजबूत रहे हैं. चाबहार पोर्ट जैसी रणनीतिक परियोजना भारत के लिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंच का अहम जरिया है. भारत ने इंडोनेशिया, वियतनाम और इराक जैसे एशियाई देशों के साथ मिलकर यह भी दिखाया कि मानवाधिकारों के नाम पर चयनात्मक राजनीति स्वीकार नहीं की जाएगी. 

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बताते चलें कि इस घटनाक्रम को लेकर जानकारों का कहना है कि यह पश्चिमी देशों के दोहरे मापदंडों पर सीधा सवाल है. हालांकि बहुमत के साथ यह प्रस्ताव पास हो गया, लेकिन भारत, चीन और इंडोनेशिया जैसे बड़े देशों का विरोध इसकी नैतिक ताकत को कमजोर करता है. आने वाले समय में भारत का यह रुख वैश्विक मंचों पर उसकी स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति की पहचान और मजबूत कर सकता है.

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