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पाकिस्तान की लाइफलाइन पर भारत का कब्जा, चिनाब पर 4 प्लान तैयार, दिसंबर 2026 तक पूरा हो जाएगा प्रोजेक्ट

चिनाब सिंधु बेसिन का हिस्सा है, जो पाकिस्तान की लाइफ़लाइन मानी जाती है. भारत ने चिनाब नदी पर काम तेज कर दिए हैं. भारत के इस कदम से पाकिस्तान को मिर्ची लगना लाजमी है.

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भारत की पाकिस्तान के पानी पर बढ़ती मजबूती अब कोई दूर की रणनीति नहीं रह गई है, बल्कि यह जम्मू-कश्मीर की पहाड़ियों में वास्तविकता का रूप ले रही है. केंद्रीय सरकार ने स्पष्ट इरादे जाहिर करते हुए चिनाब नदी व्यवस्था पर चार प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं को तेज गति से पूरा करने के सख्त निर्देश जारी किए हैं. अधिकारियों को हिदायत दी गई है कि पाकुल डुल और किरू परियोजनाओं को दिसंबर 2026 तक शुरू किया जाए, क्वार परियोजना को मार्च 2028 तक पूरा किया जाए और रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रतले बांध के निर्माण कार्य में और तेजी लाई जाए.

निरीक्षण यात्रा के बाद लिया गया फैसला

यह निर्णय बिजली मंत्री मनोहर लाल खट्टर की जम्मू-कश्मीर में दो दिवसीय मौके पर निरीक्षण यात्रा के बाद लिया गया है. इस दौरान उन्होंने विभिन्न बांध स्थलों की प्रगति का जायजा लिया और जोर देकर कहा कि अब निर्धारित समयसीमाओं का कड़ाई से पालन किया जाएगा. सिर्फ बिजली उत्पादन तक यह मामला सीमित नहीं है. चिनार नदी को पाकिस्तान की जीवनरेखा मानी जाती है. 

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तीन चौथाई जल स्रोत भारत से होकर पाकिस्तान में प्रवेश करती हैं

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पाकिस्तान की क़रीब तीन-चौथाई जल स्त्रोत उन पश्चिमी नदियों से आते हैं, जो भारत से होकर पाकिस्तान में प्रवेश करती हैं. सीधे तौर पर कहें तो पाकिस्तान के दस में से नौ लोग उस पानी पर निर्भर हैं, जो पहले भारत की ज़मीन से होकर गुजरती है. यही वजह है कि चिनार पर भारत का हर कदम पाकिस्तान में बेहद बारीकी से देखा जाता है.

167 मीटर की ऊँचाई के साथ भारत का सबसे ऊंचा बांध है

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इन परियोजनाओं में सबसे महत्वपूर्ण किश्तवाड़ में निर्माणाधीन पाकल डुल जलविद्युत परियोजना है. यह 1,000 मेगावाट की उत्पादन क्षमता वाली चिनाब बेसिन की सबसे बड़ी योजना है और 167 मीटर की ऊंचाई के साथ भारत का सबसे ऊंचा बांध भी है. सबसे खास बात यह है कि यह पश्चिमी नदियों पर भारत की पहली जल भंडारण परियोजना है, जो आगे पाकिस्तान की ओर बढ़ती हैं.

दिसंबर 2026 तक समय सीमा 

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चिनाब की एक उपनदी मरुसुदर पर स्थित इस परियोजना का शिलान्यास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मई 2018 में किया था. सिंधु जल संधि के व्यावहारिक रूप से प्रभावहीन हो जाने के बाद केंद्रीय सरकार ने इसे दिसंबर 2026 तक कार्यरत करने के सख्त निर्देश दिए हैं.

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