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ज्यादा उछल रहे पाकिस्तान को भारत ने दिया एक और झटका, सिंधु जल समझौता मामले को बताया अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर की चीज

भारत ने पाकिस्तान को बड़ा झटका देते हुए अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के कथित फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें पश्चिमी नदियों की जलविद्युत परियोजनाओं पर पाकिस्तान के पक्ष में व्याख्या की गई थी. भारत ने कहा, यह उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता और संधि बहाली से पहले पाकिस्तान को आतंकवाद पर लगाम लगानी होगी.

Image: File Photo PM Modi/ Shehbaz
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भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर तनाव एक बार फिर सुर्खियों में है. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के कथित फैसले पर खुश हो रहे पाकिस्तान को भारत ने करारा झटका देते हुए साफ कर दिया है कि यह फैसला उसके अधिकार क्षेत्र में आता ही नहीं, इसलिए इसे मानने का सवाल ही नहीं उठता. भारत का यह रूख एक बार फिर पाकिस्तान के उन नेताओं करारा जवाब है. सिंधु के पानी को लेकर अमेरिका की शह पर भारत को गीदड़भभकी देना शुरू कर दिए है. 

दरअसल, पाकिस्तान पश्चिमी नदियों चिनाब, झेलम और सिंधु पर भारत द्वारा बनाई जाने वाली नई रन-ऑफ-रिवर जल विद्युत परियोजनाओं के डिज़ाइन को लेकर आपत्ति जता रहा था. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने कथित तौर पर इन डिज़ाइन मानकों की व्याख्या पाकिस्तान के पक्ष में की, जिसके बाद इस्लामाबाद में जश्न का माहौल था. पाकिस्तान का मानना था कि यह फैसला सिंधु जल संधि पर उसके रुख को मजबूती देता है, जिसे भारत ने 2016 में उरी और 2023 में पहलगाम आतंकी हमलों के बाद स्थगित कर दिया था. लेकिन भारत के ताजा बयान ने पाकिस्तान की उम्मीदों पर पानी फेर दिया.

भारत ने मध्यस्थता न्यायालय को नकारा

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भारत ने दो टूक कहा है कि उसने कभी भी उस मध्यस्थता न्यायालय (Court of Arbitration) को मान्यता नहीं दी, जिसने यह कथित फैसला सुनाया। भारत का रुख स्पष्ट है. इस विवाद का समाधान केवल तटस्थ विशेषज्ञ तंत्र (Neutral Expert Mechanism) के ज़रिए होना चाहिए, न कि किसी ऐसे न्यायालय के माध्यम से जिसे भारत मान्यता ही नहीं देता. सूत्रों के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में किशनगंगा और रतले परियोजनाओं को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है. इस बीच भारत ने संधि में संशोधन की अधिसूचना पहले ही जारी कर दी थी. भारत ने विश्व बैंक के उस फैसले को भी खारिज किया, जिसमें एक ही मामले पर तटस्थ विशेषज्ञ और मध्यस्थता न्यायालय दोनों को एक साथ सक्रिय किया गया था. भारत का तर्क है कि यह व्यावहारिक और कानूनी दृष्टि से गलत है.

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पाकिस्तान की नई शिकायत

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि भारत की जल विद्युत परियोजनाएं सिंधु जल संधि में निर्धारित मानकों के अनुसार होनी चाहिए, न कि भारत की अपनी “आदर्श” या “सर्वोत्तम प्रथाओं” के आधार पर. पाकिस्तान चाहता है कि पश्चिमी नदियों का पानी बिना किसी रुकावट के उसके उपयोग के लिए बहता रहे. हालांकि भारत ने इस बयान पर अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन उम्मीद है कि आने वाले दिनों में भारत अपना स्पष्ट रुख दुनिया के सामने रखेगा.

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आतंकवाद पर पहले लगाम

भारत का संदेश साफ है , जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद पर रोक नहीं लगाता, सिंधु जल संधि की बहाली संभव नहीं. भारत ने अक्टूबर 2022 में ही विश्व बैंक को आगाह किया था कि एक ही मामले में दो अलग-अलग मंचों पर कार्यवाही से भ्रम और कानूनी उलझनें पैदा होंगी. इसके बावजूद विश्व बैंक ने दोनों प्रक्रियाओं को चालू रखा, जिसे भारत स्वीकार नहीं करता. भारतीय रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान इस मुद्दे को बार-बार अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाकर राजनीतिक लाभ लेना चाहता है, लेकिन भारत के सख्त रुख और कानूनी मजबूती के आगे उसकी कोशिशें कमजोर पड़ रही हैं.

सिंधु जल संधि

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सिंधु जल संधि 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई थी. इसके तहत पूर्वी नदियां (रावी, ब्यास, सतलुज) भारत के हिस्से में आईं, जबकि पश्चिमी नदियां (सिंधु, झेलम, चिनाब) पाकिस्तान के हिस्से में गईं. भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित जलविद्युत परियोजनाएं बनाने की अनुमति है, लेकिन पानी का प्रवाह रोका नहीं जा सकता. भारत का कहना है कि वह संधि के सभी प्रावधानों का पालन कर रहा है और जो भी परियोजनाएं बन रही हैं, वे संधि में तय शर्तों के अनुरूप हैं. दूसरी तरफ, पाकिस्तान लगातार आरोप लगाता है कि भारत पानी रोकने की कोशिश कर रहा है.

भारत का सख्त रुख जारी

इस पूरे विवाद ने यह साफ कर दिया है कि भारत अब पाकिस्तान के किसी भी दबाव में नहीं झुकेगा. चाहे वह अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का कथित फैसला हो या विश्व बैंक की दोहरी कार्यवाही, भारत केवल उस प्रक्रिया को मान्यता देगा जो संधि में तय है. यानी तटस्थ विशेषज्ञ की भूमिका. पाकिस्तान को यह समझना होगा कि सिंधु जल संधि का भविष्य उसकी अपनी नीतियों पर निर्भर है. जब तक वह आतंकवाद का समर्थन बंद नहीं करता और विश्वास बहाली की दिशा में कदम नहीं उठाता, भारत अपनी सख्त नीति से पीछे नहीं हटेगा.

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बता दें कि भारत का यह कदम न सिर्फ उसके जल अधिकारों की रक्षा का संकेत है, बल्कि यह भी बताता है कि वह अंतरराष्ट्रीय कानून की आड़ में किसी को अपनी सुरक्षा और रणनीतिक हितों से खिलवाड़ करने की इजाजत नहीं देगा.

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