Advertisement

Loading Ad...

PM मोदी की ट्रेड डिप्लोमेसी का असर... भारत-EU समझौतों ने ट्रंप को ट्रेड डील के लिए कैसे किया मजबूर, जानें इनसाइड स्टोरी

भारत की आर्थिक कूटनीति को नई दिशा मिली है. ब्रिटेन, यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ बढ़ती सक्रियता यह दिखाती है कि भारत अब आक्रामक व्यापार रणनीति अपना रहा है. इसके चलते अब अमेरिका तो भारत के साथ ट्रेड डील लगभग फ़ाइनल कर दिया हैं वहीं, इसका इस रूख का सीधा प्रभाव यूरोपीय संघ के साथ भी देखने को मिला.

Donald Trump/ Narendra Modi (File Photo)
Loading Ad...

भारत की विदेश व्यापार नीति में बीते एक साल के भीतर ऐसा बदलाव देखने को मिला है, जिसे आर्थिक कूटनीति की दिशा में एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है. वर्षों तक ठंडे बस्ते में पड़े मुक्त व्यापार समझौते (FTA) अब न केवल सक्रिय हो गए हैं, बल्कि उन्होंने वैश्विक राजनीति और व्यापार के समीकरणों को भी नई दिशा दी है. ब्रिटेन, यूरोपीय संघ (EU) और अमेरिका जैसे बड़े आर्थिक साझेदारों के साथ भारत की बढ़ती सक्रियता यह संकेत देती है कि देश अब रक्षात्मक नहीं, बल्कि आक्रामक व्यापार रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है.

भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्ते लंबे समय से मजबूत रहे हैं. दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे की पूरक मानी जाती हैं. भारत आईटी, फार्मा और सेवाओं के क्षेत्र में मजबूत है, जबकि अमेरिका उच्च तकनीक और निवेश का बड़ा स्रोत है. हालांकि, हाल के महीनों में कुछ गैर-व्यापारिक मुद्दों ने रिश्तों में खटास पैदा की. रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर अमेरिकी दबाव और ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े दावों ने असहज स्थिति बनाई. रूस पर निर्भरता के कारण भारत को 25 प्रतिशत सेकेंडरी टैरिफ का सामना भी करना पड़ा. एक समय यह आशंका बनने लगी थी कि दोनों देशों के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौता टल सकता है.

PM मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच जारी रही बातचीत 

Loading Ad...

इसके बावजूद कूटनीतिक स्तर पर बातचीत कभी बंद नहीं हुई. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सीधे संपर्क में बने रहे. वहीं वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वाशिंगटन के साथ लगातार बातचीत जारी रखा. कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि सर्जियो गोर की सक्रिय भूमिका ने दोनों देशों के बीच जमी बर्फ को पिघलाने में अहम योगदान दिया. इसी निरंतर प्रयास का नतीजा है कि अब द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में ठोस कदम बढ़ चुके हैं.

Loading Ad...

भारत की सख्ती के आगे नरम पड़ा यूरोपीय संघ

भारत और अमेरिका की नजदीकी का असर यूरोप तक साफ दिखाई दिया. यूरोपीय संघ, जो अब तक व्यापारिक शर्तों को लेकर सख्त रुख अपनाए हुए था, उसे अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ा. ब्रुसेल्स के नीति निर्माताओं ने भारत के साथ लचीला रवैया अपनाया. इसका परिणाम यह हुआ कि 27 जनवरी को भारत और यूरोपीय संघ के बीच उस व्यापार समझौते की घोषणा हुई, जो पिछले 18 वर्षों से अटका हुआ था. इससे पहले मई की शुरुआत में भारत और ब्रिटेन भी अपने मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप दे चुके थे.

Loading Ad...

समझौतों की ओर बढ़ते कदम

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में विश्व व्यापार संगठन की भूमिका कमजोर होती जा रही है. बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था में सुधार की उम्मीद कम नजर आ रही है. इसी कारण भारत ने अब द्विपक्षीय और क्षेत्रीय व्यापार समझौतों को अपनी प्राथमिकता बना लिया है. बीते 12 महीनों में भारतीय व्यापार वार्ताकारों ने दुनिया के कई देशों के साथ लगातार बैठकें की हैं. इस नई रणनीति के तहत अब केवल अमेरिका और यूरोप ही नहीं, बल्कि न्यूजीलैंड, इजराइल और मर्कोसुर जैसे व्यापारिक समूह भी भारत की प्राथमिक सूची में शामिल हो गए हैं.

क्या होगा इन समझौतों का असर

Loading Ad...

इन नए व्यापार समझौतों की खास बात यह है कि इनका दायरा केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं है. इनमें सेवाएं, बौद्धिक संपदा अधिकार, छोटे और मध्यम व्यवसाय, श्रम मानक और सस्टेनेबिलिटी जैसे आधुनिक विषय भी शामिल हैं. मौजूदा समय में भारत के लगभग दो-तिहाई निर्यात प्रमुख मुक्त व्यापार समझौतों के दायरे में आ चुके हैं. वहीं देश के कुल आयात का करीब आधा हिस्सा भी इन्हीं समझौतों के तहत कवर हो रहा है. कृषि उत्पाद, ऑटोमोबाइल, वाइन और स्पिरिट जैसे क्षेत्रों में आयात और निर्यात के नए अवसर खुलने लगे हैं.

यह भी पढ़ें

बताते चलें कि वाशिंगटन में भारतीय दूतावास और वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारियों ने जिस धैर्य और निरंतरता के साथ बातचीत को आगे बढ़ाया, वह भारत की बढ़ती कूटनीतिक शक्ति को दर्शाता है. भारत ने यह साफ कर दिया है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों, जैसे रूसी कच्चा तेल, से समझौता किए बिना भी वैश्विक शक्तियों के साथ बराबरी के स्तर पर व्यापार कर सकता है. आने वाले समय में ये समझौते न केवल भारतीय विनिर्माण को वैश्विक पहचान दिलाएंगे, बल्कि मेक इन इंडिया अभियान को भी नई उड़ान देंगे. भारत अब वैश्विक व्यापार मंच पर एक निर्णायक भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह तैयार नजर आ रहा है.

LIVE
अधिक →

Advertisement

Loading Ad...
Loading Ad...
Loading Ad...
अधिक →

Advertisement

Loading Ad...