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'मैं कुछ भी कर लूं, नोबेल नहीं मिलेगा...', कांगो-रवांडा के शांति समझौते के बाद छलका ट्रंप का दर्द

पूर्वी अफ़्रीका के डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) और रवांडा ने पूर्वी कांगो में जारी हिंसा को समाप्त करने की दिशा में एक शुरुआती शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. इस समझौते का हवाला देते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर से नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए नाराज़गी जाहिर की है.

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डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) और रवांडा ने पूर्वी कांगो में जारी हिंसा को समाप्त करने की दिशा में एक शुरुआती शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. यह ऐतिहासिक पहल अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में बुधवार देर रात हुई, जिसमें अमेरिकी प्रशासन ने मध्यस्थ की अहम भूमिका निभाई. इस समझौते का हवाला देते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर से नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए नाराज़गी जाहिर की है.

दरअसल, पूर्वी अफ्रीका के इन दो पड़ोसी देशों के बीच लंबे समय से तनाव और हिंसा की स्थिति बनी हुई थी. हालिया समझौता इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है, हालांकि यह अभी शुरुआती चरण में है और भविष्य में कई बार बातचीत की ज़रूरत होगी. अब इस समझौते के बाद एक बार फिर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं. उन्होंने इस समझौता का हावला देते हुए नोबेल शांति पुरस्कार की अपनी दावेदारी को दोहराया है. ट्रंप ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि अमेरिका की मध्यस्थता से यह समझौता संभव हो पाया और इस पहल से विश्व शांति को बढ़ावा मिलेगा.जानकारी देते चले कि ट्रंप पहले भी कई बार नोबेल पुरस्कार को लेकर अपनी इच्छा ज़ाहिर कर चुके हैं. उनके समर्थकों का मानना है कि उत्तर कोरिया के साथ तनाव कम करने की कोशिशों से लेकर मध्य-पूर्व में अब्राहम समझौते तक, ट्रंप ने वैश्विक शांति के लिए कई अहम कदम उठाए हैं. इन सबके बीच सबसे ख़ास बात यह है कि ट्रंप की यह प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब कई बार वह सार्वजनिक मंचों पर पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की नोबेल शांति पुरस्कार विजेता छवि पर कटाक्ष कर चुके हैं. ट्रंप का मानना रहा है कि उन्होंने भी विश्व शांति के लिए उतना ही, या उससे अधिक काम किया है, लेकिन उन्हें अभी तक वह अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिली.

कई युद्ध को शांत करवाया फिर भी नोबेल शांति पुरस्कार नहीं: ट्रंप
अमेरिकी राष्ट्रापति ट्रंप ने एक बार फिर नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की है. उन्होंने अपने सोशल मीडिया के ट्रुथ सोशल पर किए गए एक ताज़ा पोस्ट में ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने वैश्विक स्तर पर कई युद्धों को टालने और शांति स्थापित करने के प्रयास किए, लेकिन इसके बावजूद उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार नहीं दिया गया और शायद कभी दिया भी नहीं जाएगा. ट्रंप ने अपने पोस्ट में लिखा, "मुझे कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और रवांडा गणराज्य के बीच संधि के लिए नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलेगा. मुझे भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध रोकने के लिए नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलेगा, न ही सर्बिया और कोसोवो के बीच शांति के लिए." उन्होंने आगे कहा कि "मुझे मिस्र और इथियोपिया के बीच शांति बनाए रखने के लिए, और मध्य पूर्व में अब्राहम समझौते कराने के लिए भी यह पुरस्कार नहीं मिलेगा. यह वही समझौता है जो अगर सब कुछ ठीक रहा, तो 'युगों' में पहली बार मध्य पूर्व को एकीकृत कर सकता है."

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राष्ट्रपति ट्रंप ने व्यंग्यात्मक लहज़े में कहा कि चाहे वह रूस-यूक्रेन संकट को शांत करने की कोशिश करें या इजरायल-ईरान टकराव में समाधान निकालने की, उन्हें नोबेल पुरस्कार नहीं मिलेगा. "लेकिन लोग जानते हैं और यही मेरे लिए मायने रखता है," डोनाल्ड ट्रंप पहले भी नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर सार्वजनिक मंचों पर अपनी असंतुष्टि जता चुके हैं. वह अक्सर पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा पर निशाना साधते हुए कहते हैं कि ओबामा को राष्ट्रपति बनने के तुरंत बाद शांति पुरस्कार दिया गया, जबकि ट्रंप ने "वास्तविक शांति समझौते कराए हैं."

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रवांडा और कांगो ने वॉशिंगटन में किया शांति समझौता
पूर्वी अफ्रीका के दो पड़ोसी देशों रवांडा और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC)  ने वर्षों से चली आ रही हिंसा को समाप्त करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है. लंबी बातचीत के बाद दोनों देशों ने एक प्रारंभिक शांति समझौते (ड्राफ्ट एग्रीमेंट) पर हस्ताक्षर किए हैं. इस मसौदे पर अंतिम मुहर आने वाले दिनों में लग सकती है. इस बहुपक्षीय बातचीत में राजनीतिक, सुरक्षा और आर्थिक पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया गया. तैयार किए गए ड्राफ्ट समझौते में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को शामिल किया गया है. जिनमें आपसी हथियारबंदी, गैर-राज्य प्रायोजित सशस्त्र समूहों (Non-State Armed Groups) का उन्मूलन, और विस्थापित नागरिकों व शरणार्थियों की घर वापसी की योजना शामिल है.

बताते चलें कि पूर्वी कांगो पिछले कई वर्षों से सशस्त्र संघर्षों की चपेट में रहा है. इस क्षेत्र में खनिज संसाधनों की भरमार है, जिसकी वजह से कई विद्रोही गुट इस पर नियंत्रण के लिए संघर्ष करते रहे हैं. वर्ष 2024 की शुरुआत में यह हिंसा तब और तेज हो गई जब M23 विद्रोही गुट जिसे रवांडा का समर्थन प्राप्त होने का आरोप लगता रहा है , उसने खनिज संपन्न गोमा शहर पर कब्जा कर लिया. कुछ ही सप्ताहों में उन्होंने रणनीतिक रूप से अहम बुकारू शहर को भी अपने नियंत्रण में ले लिया.

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गौरतलब है कि पूर्वी कांगो में पिछले वर्षों में सैकड़ों नहीं, बल्कि हज़ारों लोगों की जान जा चुकी है और लाखों नागरिकों को अपने घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है. कई मीडिया रिपोर्ट्स में विभिन्न पक्षों पर गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप भी लगे हैं, जिनमें महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हिंसा के मामलों की भी पुष्टि हुई है.

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