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मार्क कार्नी ने तोड़ा ट्रंप का घमंड! अमेरिकी राष्ट्रपति ने अब निकाली भड़ास, कनाडा के खिलाफ उठाया ये कदम

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अमेरिका की ये गलतफहमी मिटा दी कि कनाडा का वजूद अमेरिका पर टिका है. दावोस में ट्रंप को सुनाई गई खरी-खोटी पर US प्रेसीडेंट ने अब बदला लिया है.

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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा को अपने नए बनाए गए बोर्ड ऑफ पीस (Board of Peace) में शामिल होने का न्योता वापस ले लिया है. यह कदम उत्तर अमेरिका के दोनों पड़ोसी देशों के बीच चल रही ताजा तनातनी के बीच उठाया गया है.

डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया मंच ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट के ज़रिए यह जानकारी दी. उन्होंने कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी को संबोधित करते हुए लिखा कि पीस बोर्ड ने कनाडा को भेजा गया अपना निमंत्रण वापस लेने का फ़ैसला किया है. हालांकि, पोस्ट में ट्रंप ने यह साफ नहीं किया कि उन्होंने कनाडा को दिया गया यह निमंत्रण क्यों रद्द किया. वापस लेने के पीछे की वजह को लेकर उन्होंने कोई कारण नहीं बताया. 

मार्क कार्नी की चेतावनी से टूटा ट्रंप का घमंड!

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ट्रंप ने यह कदम ऐसे समय पर उठाया है. जब कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के दावोस में अपने भाषण में अमेरिका को जमकर सुनाया था. मार्क कार्नी ने ट्रंप का बिना नाम लिए अमेरिका को टैरिफ वॉर पर चेताया था. 

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इससे झल्लाए ट्रंप ने अब कनाडा के बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का न्योता वापस ले लिया है. ट्रंप ने लिखा, 'प्रिय प्रधानमंत्री कार्नी, कृपया इस पत्र को इस बात की सूचना के रूप में स्वीकार करें कि बोर्ड ऑफ पीस कनाडा के शामिल होने को लेकर दिया गया निमंत्रण वापस ले रहा है.' 

बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने को लेकर मार्क कार्नी ने कहा था कि वो बोर्ड में शामिल होना चाहते हैं, लेकिन इसकी फीस की शर्तों को लेकर अभी वो फैसला नहीं ले पाए हैं. दरअसल, इस बोर्ड में स्थायी सीट पाने के लिए जो देशों को एक अरब डॉलर की फीस देनी होगी. 

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दावोस में मार्क कार्नी ने ट्रंप को कैसे दिखाया आईना? 

दरअसल, दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में संबोधन के दौरान मार्क कार्नी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों से खफा दिखे. उन्होंने कहा, दुनिया की ‘मिडिल पावर्स’ को एकजुट होकर बड़ी ताकतों के दबाव का मुकाबला करना चाहिए. उन्होंने कहा, ‘सुपरपावर्स अब व्यापार को हथियार की तरह इस्तेमाल करने लगी हैं. टैरिफ को दबाव डालने के हथियार के रूप में फाइनेंशियल सिस्टम को जबरदस्ती करने के लिए और सप्लाई चेन की कमजोरियों का गलत फायदा उठाया जा रहा है.'

हालांकि मार्क कार्नी ने अमेरिका या ट्रंप का नाम नहीं लिया था, लेकिन ट्रंप मार्क की टिप्पणी से चिढ़ गए, इसे अपने पर लेते हुए उन्होंने पलटवार किया. ट्रंप ने कहा, 'कनाडा अमेरिका की वजह से ही जिंदा है. मार्क, अगली बार बयान देते वक्त यह याद रखना.' इसके बाद अमेरिका ने अब कनाडा के बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का न्योता भी वापस ले लिया. हालांकि मार्क कार्नी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस दावे को खारिज कर दिया था कि कनाडा अमेरिका की वजह से जिंदा है. 

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कार्नी ने कहा, ‘कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका ने एक शानदार साझेदारी बनाई है. अर्थव्यवस्था में, सुरक्षा में और समृद्ध सांस्कृतिक आदान-प्रदान में, लेकिन कनाडा अमेरिका की वजह से जिंदा नहीं है. कनाडा इसलिए आगे बढ़ रहा है क्योंकि हम कनाडाई हैं.’ दावोस में मार्क कार्नी ने यूरोप पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा, 'अमेरिका के वर्चस्व के दौर में सबको फायदा होता रहे, इसलिए पश्चिमी देश कथनी और करनी के फर्क पर आंखें मूंदते रहे. 

क्या है बोर्ड ऑफ पीस? 

विश्व में शांति स्थापित करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बोर्ड ऑफ पीस की शुरुआत की है. इसमें शामिल होने के लिए ट्रंप ने दुनिया के लगभग 60 देशों को न्योता भेजा है. इजरायली मीडिया के अनुसार, 60 में से दुनिया के 25 देशों ने ट्रंप के न्यौते को स्वीकार कर लिया है. बोर्ड ऑफ पीस में अब तक इजरायल, बहरीन, मोरक्को, अर्जेंटीना, आर्मेनिया, अजरबैजान, बुल्गारिया, हंगरी, इंडोनेशिया, जॉर्डन, कजाकिस्तान, कोसोवो, पाकिस्तान, पराग्वे, कतर, सऊदी अरब, तुर्किए, संयुक्त अरब अमीरात, उज्बेकिस्तान, बेलारूस, मिस्र, वियतनाम और मंगोलिया शामिल हुए. 

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बोर्ड ऑफ पीस पर भारत का क्या है रुख? 

इनमें से 8 इस्लामिक देशों ने बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का न्योता स्वीकार किया है. अमेरिकी राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी गाजा में इजरायल-हमास सीजफायर समझौते के दूसरे फेज के तहत घोषित बोर्ड में शामिल होने के लिए बुलाया था. हालांकि, भारत की तरफ से फिलहाल इसपर कोई फैसला सामने नहीं आया है. विदेश मंत्रालय ने कहा था कि फिलहाल इसपर विचार किया जा रहा है. 

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इसके अलावा, फ्रांस, ब्रिटेन, चीन, जर्मनी, स्वीडन, नार्वे और कई दूसरे बड़े देशों ने इस साइनिंग सेरेमनी में हिस्सा नहीं लिया. इसके साथ ही जर्मनी, इटली, पैराग्वे, रूस, स्लोवेनिया, तुर्किए और यूक्रेन जैसे कई देशों ने इस न्योते पर कोई वादा नहीं किया है. बोर्ड में शामिल सदस्य देशों का कार्यकाल 3 साल तक सीमित होगा. 

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