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पाकिस्तान में भी देववाणी की गूंज, शुरू हुआ संस्कृत कोर्स, गीता-महाभारत पढ़ रहे छात्र, पढ़ा रहे मुस्लिम शिक्षक

पाकिस्तान में पहली बार किसी विश्वविद्यालय में संस्कृत पढ़ाई जा रही है. एलयूएमएस (LUMS) ने पारंपरिक भाषाओं का कोर्स शुरू किया है और भविष्य में भगवद्गीता व महाभारत पढ़ाने की भी तैयारी है.

Source: X/ @debdutta_c
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भारत और पाकिस्तान का इतिहास भले ही एक साझा अतीत से जुड़ा रहा हो, लेकिन आज दोनों देशों के रिश्ते राजनीतिक तौर पर बेहद तल्ख हो चुके हैं. अंतरराष्ट्रीय मंच पर दोनों देश अक्सर एक दूसरे के विरोधी नजर आते हैं. इसके बावजूद यह सच्चाई भी उतनी ही मजबूत है कि दोनों देशों की सांस्कृतिक जड़ें एक ही मिट्टी से निकली हैं. भाषा, परंपरा और ज्ञान की यह साझा विरासत समय और सीमाओं के बावजूद खत्म नहीं हो सकी है. इसी कड़ी में पाकिस्तान से एक ऐसी खबर सामने आई है, जो इस बात को बताती है कि सनातन धर्म की मूल भाषा संस्कृत का कितना प्रभाव है.

पाकिस्तान में पढ़ाया जाएगा भगवद्गीता

दरअसल, बंटवारे के बाद पहली बार पाकिस्तान जो अपने कट्टरपंथी विचारधारा और हिंदुओं के विरोधी के तौर पर जाना जाता है. अब उसी पाकिस्तान के किसी विश्वविद्यालय में संस्कृत को औपचारिक रूप से पढ़ाया जा रहा है. लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज यानी एलयूएमएस ने पारंपरिक भाषाओं के तहत चार क्रेडिट का कोर्स शुरू किया है, जिसमें संस्कृत भी शामिल है. यह पहल न सिर्फ शैक्षणिक दुनिया के लिए अहम है, बल्कि भारत और पाकिस्तान के बीच सांस्कृतिक संवाद की संभावनाओं को भी मजबूत करती है. इतना ही नहीं तैयारी यह भी है कि आने वाले समय में पाकिस्तान में भी भगवद्गीता और महाभारत की शिक्षा दी जाएगी.

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कौन हैं संस्कृत के प्रोफेसर?

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इस पहल के पीछे फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज के समाजशास्त्र के असोसिएट प्रोफेसर डॉ. शाहिद रशीद (Dr. Shahid Rashid) की बड़ी भूमिका रही है. डॉ. रशीद खुद संस्कृत के विद्वान हैं और वर्षों से इस भाषा के अध्ययन में जुटे हुए हैं. द ट्रिब्यून से बातचीत में उन्होंने कहा कि पारंपरिक भाषाओं में ज्ञान का अथाह भंडार छिपा हुआ है. उन्होंने पहले अरबी और फारसी भाषा का अध्ययन किया और उसके बाद संस्कृत सीखनी शुरू की. उनके मुताबिक संस्कृत का व्याकरण समझने में उन्हें लगभग एक साल का समय लगा और आज भी वह लगातार सीखने की कोशिश कर रहे हैं. डॉ. रशीद ने बताया कि शुरुआत में तीन महीने की एक वीकेंड वर्कशॉप के जरिए संस्कृत का कोर्स चलाया गया था. इस वर्कशॉप के बाद छात्रों में संस्कृत और प्राचीन ज्ञान के प्रति गहरी रुचि देखने को मिली. इसी उत्साह को देखते हुए एलयूएमएस में इसे नियमित कोर्स के रूप में शुरू करने का फैसला लिया गया.

यूनिवर्सिटी में मौजूद हैं प्राचीन किताबें 

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एलयूएमएस (LUMS) के गुरमानी सेंटर के डायरेक्टर डॉ. अली उस्मान कासिम ने भी इस पहल को ऐतिहासिक बताया. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के कई इलाकों में पहले भी संस्कृत पर काफी काम हुआ है. आज भी पंजाब यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में संस्कृत की दुर्लभ किताबें और ग्रंथ सुरक्षित हैं. यहां तक कि संस्कृत में लिखे प्राचीन पत्ते भी वहां मौजूद हैं, जिन्हें बाद में जेसीआर वूलनर ने एकत्रित किया था. हालांकि इनका इस्तेमाल अब तक ज्यादातर विदेशी शोधकर्ताओं तक ही सीमित रहा और पाकिस्तान में संस्कृत शिक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया.

भाषा में बड़ी ताकत 

डॉ. रशीद का मानना है कि संस्कृत को केवल हिंदू धार्मिक ग्रंथों की भाषा मानना एक बड़ी गलतफहमी है. उन्होंने साफ कहा कि यह पूरे क्षेत्र की साझा भाषा रही है. संस्कृत व्याकरण के महान रचयिता पाणिनि का गांव भी इसी इलाके में हुआ करता था. सिंधु सभ्यता के दौर में इस क्षेत्र में व्यापक लेखन परंपरा मौजूद थी. उनके अनुसार संस्कृत एक विशाल पर्वत की तरह है, जिसके भीतर ज्ञान के अनगिनत खजाने छिपे हैं. यह भाषा किसी एक धर्म से बंधी हुई नहीं है. उन्होंने यह भी कहा कि अगर सीमा के दोनों ओर संस्कृत पर काम होता है, तो एक सुंदर कल्पना साकार हो सकती है. भारत में हिंदू और सिख अरबी और फारसी सीखें और पाकिस्तान में मुसलमान संस्कृत का अध्ययन करें. इससे पूरे दक्षिण एशिया में एक भाषा सेतु का निर्माण होगा. डॉ. रशीद ने बताया कि उनके पूर्वज हरियाणा के करनाल में रहते थे और उनकी मां उत्तर प्रदेश के शेखपुरा की रहने वाली हैं. उनके लिए देवनागरी लिपि बेहद आकर्षक है.

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जल्द शुरू होगा महाभारत और भगवद्गीता का कोर्स

इसी बीच डॉ. कासिम ने यह भी खुलासा किया कि यूनिवर्सिटी का प्लान भविष्य में महाभारत और भगवद्गीता पर भी कोर्स शुरू करने का है. उनका कहना है कि हो सकता है आने वाले 10 से 15 सालों में पाकिस्तान से भी गीता और महाभारत के विद्वान निकलकर सामने आएं. यह पहल साबित करती है कि भाषा और ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती और सांस्कृतिक संवाद हमेशा नई राहें खोलता है.

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बता दें कि यह पहल सिर्फ एक शैक्षणिक फैसला नहीं, बल्कि इतिहास से जुड़े घावों पर ज्ञान का मरहम लगाने की कोशिश है. जब सीमाओं के पार संस्कृत, गीता और महाभारत जैसे विषय पढ़ाए जाएंगे, तब संवाद की एक नई शुरुआत होगी. यही साबित करता है कि राजनीति चाहे जितनी कठोर हो, संस्कृति और ज्ञान हमेशा लोगों को जोड़ने का काम करते हैं.

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