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टैरिफ पर खींचतान, फिर भी भारत-US रिश्तों में उम्मीद जिंदा; बातचीत को लेकर दोनों तरफ से मिले सकारात्मक संकेत, जानें पूरा मामला

अमेरिका का 50 फीसदी टैरिफ भारत पर लागू हो चुका है, हालांकि सरकारी सूत्रों के मुताबिक दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है और सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं. टैरिफ से संकट जरूर है, लेकिन भारत पर इसका बड़ा असर होने की संभावना नहीं है.

Narendra Modi/ Donald Trump (File Photo)
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भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्तों में एक नया मोड़ आ गया है. बुधवार से अमेरिका ने भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लागू कर दिया है. इस फैसले ने वैश्विक बाजार के साथ-साथ भारत के निर्यात क्षेत्र में भी चिंता बढ़ा दी है. हालांकि सरकारी सूत्रों का कहना है कि इस संकट के बावजूद दोनों देशों के बीच बातचीत के दरवाजे बंद नहीं हुए हैं. सकारात्मक संकेत भी मिल रहे हैं और बातचीत जारी है. 

टैरिफ को लेकर कैसी है भारत की तैयारी?

जानकारों की मानना है कि 50 प्रतिशत टैरिफ का सीधा असर भारत के निर्यात पर होगा. खासकर टेक्सटाइल, जेम्स एंड ज्वेलरी और झींगा जैसे सेक्टर्स को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत का अमेरिका को निर्यात 70 फीसदी तक यानी करीब 55 अरब डॉलर घट सकता है. इसके साथ ही कुल 60.2 अरब डॉलर का एक्सपोर्ट बिजनेस प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है. लेकिन सवाल उठता है कि क्या यह भारत की अर्थव्यवस्था के लिए किसी बड़े खतरे का संकेत है. इसको लेकर भारत सरकार के सूत्रों का कहना है कि भारत का निर्यात केवल अमेरिका पर निर्भर नहीं है. भारत ने हमेशा अपने निर्यात को विविध बनाया है और यूरोप, एशिया और मध्य पूर्व के देशों में भी बड़ा बाजार हासिल किया है. यही कारण है कि यह संकट उतना बड़ा नहीं है जितना बताया जा रहा है.

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भारत का आत्मविश्वास कैसे मजबूत है

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भारत पहले भी वैश्विक अर्थव्यवस्था के कई झटके झेल चुका है. 2008 की वैश्विक मंदी हो या कोरोना महामारी का आर्थिक असर, भारत ने हमेशा मजबूती के साथ इन चुनौतियों का सामना किया है. यही अनुभव इस बार भी भारत की ताकत बन रहा है. सरकारी अधिकारियों का कहना है कि भारत अल्पकालिक चुनौतियों को अवसर में बदलने की कोशिश कर रहा है. टैरिफ तनाव का असर जरूर होगा, लेकिन इसे भारत अपने निर्यात ढांचे को मजबूत करने के मौके के तौर पर भी देख रहा है.

निर्यात क्षेत्र में बदलाव की कोशिश

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टैरिफ संकट ने भारत को सोचने पर मजबूर किया है कि लंबी अवधि में निर्यात को किस तरह और मजबूत किया जाए. सरकार अब एक्सपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर पर ज्यादा ध्यान दे रही है. नई नीतियां तैयार की जा रही हैं, ताकि भारतीय उत्पाद वैश्विक स्तर पर ज्यादा प्रतिस्पर्धी बन सकें. इसके अलावा, सरकार यह भी चाहती है कि भारत का निर्यात केवल पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित न रहे. नई टेक्नोलॉजी, फार्मा, आईटी और ग्रीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में भी बड़ा एक्सपोर्ट पोटेंशियल है. आने वाले समय में भारत इन सेक्टर्स को वैश्विक बाजार में आगे बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठा सकता है.

क्या है दोनों देशों के रिश्तों का भविष्य

टैरिफ संकट के बावजूद एक सकारात्मक पहलू यह है कि भारत और अमेरिका के बीच संवाद बंद नहीं हुआ है. दोनों देशों को यह समझ है कि लंबे समय तक तनाव से किसी का भला नहीं होगा. दोनों ही देशों के बीच व्यापार केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह सामरिक और रणनीतिक साझेदारी से भी जुड़ा है. भारत और अमेरिका दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है. भारत के लिए अमेरिका सबसे बड़ा बाजार है, जबकि अमेरिका के लिए भारत एशिया में एक मजबूत और भरोसेमंद साझेदार है. यही कारण है कि दोनों देश इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए बातचीत और समाधान खोजने पर जोर दे रहे हैं.

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समाधान की तलाश

सरकारी सूत्रों का कहना है कि फिलहाल ध्यान एक संतुलित नीति बनाने पर है. कोशिश यह है कि न तो भारत और न ही अमेरिका को लंबी समय में नुकसान उठाना पड़े. माना जा रहा है कि आने वाले हफ्तों में दोनों देशों के बीच उच्च स्तर की बातचीत हो सकती हैं. अगर ऐसा होता है तो यह स्थिति भारत के लिए और भी फायदे का सौदा साबित हो सकती है. क्योंकि यह न केवल मौजूदा संकट को दूर करेगा, बल्कि भविष्य में व्यापारिक रिश्तों को और स्थायी और संतुलित बनाने का रास्ता भी खोलेगा.

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बताते चलें कि अमेरिका का 50 फीसदी टैरिफ भारत के लिए एक चुनौती जरूर है, लेकिन इसे बड़े खतरे के तौर पर देखना जल्दबाजी होगी. भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत है और निर्यात विविध है. संकट का असर जरूर होगा, पर भारत ने इस संकट को अवसर में बदलने का फैसला किया है. आने वाले समय में सरकार और उद्योग जगत मिलकर नई दिशा में काम करेंगे.

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