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बांग्लादेश में फिर मचेगा बवाल...! यूनुस सरकार को जमात-ए-इस्लामी ने दी 5 दिन की मोहलत, मांगें पूरी नहीं हुईं तो छिड़ेगी बगावती जंग

बांग्लादेश के जमात-ए-इस्लामी ने यूनुस सरकार को 11 नवंबर तक पांच सूत्री मांगें मानने की चेतावनी दी है. ऐसा न होने पर ढाका में बवाल की धमकी दी गई है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, जमात के नेताओं ने पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री इशाक डार से मुलाकात कर इस्लामिक एकता पर चर्चा की, जिससे यूनुस सरकार की चिंता बढ़ गई है.

Muhammad Yunus (File Photo)
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बांग्लादेश इन दिनों मानो बारूद के ढेर पर बैठा हुआ है. हालात इतने तनावपूर्ण हैं कि राजधानी ढाका में किसी भी वक्त बड़ा विस्फोट हो सकता है. जिस जमात-ए-इस्लामी ने कुछ महीने पहले पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से बेदखल किया था, अब वही यूनुस सरकार के खिलाफ विद्रोह की राह पर उतर आई है. इस्लामिक संगठनों का आक्रोश बढ़ता जा रहा है और सरकार के पास अब केवल पांच दिन का वक्त बचा है. अगर 11 नवंबर तक उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो ढाका की सड़कों पर कोहराम मचने का खतरा मंडरा रहा है.

जमात-ए-इस्लामी ने सरकार को दी चेतावनी 

जमात-ए-इस्लामी के महासचिव मिया गुलाम परवार ने आठ इस्लामिक पार्टियों की संयुक्त बैठक के बाद एलान किया कि उनकी पांच सूत्री मांगों को यूनुस सरकार को हर हाल में मानना ही होगा. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो लाखों लोग सड़कों पर उतरेंगे और ढाका ठप हो जाएगा. परवार ने कहा कि 'हम अपनी बातें सरकार के सलाहकारों को सौंप चुके हैं. अब फैसला उनके हाथ में है. अगर सरकार चुप रही तो देश में हालात बिगड़ना तय है.'

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कैसे बढ़ी यूनुस सरकार की चिंता 

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ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, इस ऐलान से पहले जमात-ए-इस्लामी के अमीर डॉ. शफीकुर रहमान ने पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री इशाक डार से मुलाकात की थी. दोनों नेताओं के बीच बांग्लादेश और पाकिस्तान के रिश्तों को मज़बूत करने और इस्लामिक एकता को बढ़ाने पर चर्चा हुई थी. इस मुलाकात के बाद से ही यूनुस सरकार की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि इससे साफ संकेत मिल रहा है कि इस्लामिक पार्टियां अब एकजुट होकर यूनुस को चुनौती देने के मूड में हैं. 

जुलाई नेशनल चार्टर लागू करने की मांग 

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परवार की सबसे अहम मांग है कि सरकार 'जुलाई नेशनल चार्टर' को तुरंत लागू करे. यह वही दस्तावेज है जो उन प्रदर्शनकारियों को कानूनी सुरक्षा देने की बात करता है जिन्होंने शेख हसीना के खिलाफ विद्रोह में हिस्सा लिया था. इन्हें 'जुलाई फाइटर्स कहा जाता है. इस चार्टर के नए मसौदे में 'फासिस्ट अवामी लीग' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है और पूर्व सरकार पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं. शेख हसीना इस समय निर्वासन में हैं और अवामी लीग की सभी गतिविधियां अस्थायी रूप से निलंबित की जा चुकी हैं.

सरकार के विरोध में एकजुट हुए कई दल 

आठ इस्लामिक पार्टियों का गठबंधन अब एक बड़ा मोर्चा बन चुका है. इसमें बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी, इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश, खिलाफत मजलिस, बांग्लादेश खिलाफत आंदोलन, निज़ाम-ए-इस्लाम पार्टी, जातीय लोकतांत्रिक पार्टी और बांग्लादेश डेवलपमेंट पार्टी जैसी ताकतवर संगठन शामिल हैं. गुरुवार सुबह से ही हजारों प्रदर्शनकारी ढाका के पलटन चौराहे पर जुटने लगे थे. जामुना रोड पर पुलिस ने बैरिकेड लगाए, लेकिन नेताओं ने वहीं से सरकार को ज्ञापन सौंप दिया. भीड़ लगातार बढ़ती गई और चार्टर लागू करो के नारे राजधानी में गूंजने लगे.

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कौन सी मांग को लेकर हो रहे प्रदर्शन 

जमात-ए-इस्लामी की पांच सूत्री मांगें इस संकट का केंद्र बनी हुई हैं. इनमें जुलाई नेशनल चार्टर को लागू करना, नवंबर तक उस पर जनमत संग्रह कराना, आगामी आम चुनाव को आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली से कराना, निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना और पिछले शासन के अत्याचारों व भ्रष्टाचार के खिलाफ न्याय की मांग शामिल है. इसके साथ ही अवामी लीग और उसके सहयोगी 14-पार्टी गठबंधन की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने की भी मांग की गई है.

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बताते चलें कि बांग्लादेश के राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर यूनुस सरकार ने अगले कुछ दिनों में ठोस कदम नहीं उठाए, तो बांग्लादेश एक बार फिर राजनीतिक अराजकता की चपेट में आ सकता है. देश की सड़कों पर पहले ही तनाव का माहौल है और सुरक्षा बल हाई अलर्ट पर हैं. बांग्लादेश के इतिहास में यह दौर एक और बड़े राजनीतिक मोड़ का संकेत दे रहा है. अब सबकी निगाहें 11 नवंबर पर टिकी हैं, जब तय होगा कि देश स्थिरता की ओर बढ़ेगा या फिर एक और उथल-पुथल के दौर में फंस जाएगा. 

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