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गले लगाने चले पाकिस्तान की बांग्लादेश ने कर दी बेइज्जती, रख दी ऐसी शर्त कि आतंकिस्तान को सरेआम होना पड़ा शर्मिंदा

बांग्लादेश में पाकिस्तान की कोशिशों और भारत के खिलाफ साजिशों को तगड़ा झटका लगा है. पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार 13 साल बाद ढाका दौरे पर गए. उनके इस दौरे का उद्देश्य दोनों देशों के बीच संबंधों को सुधारना और भारत पर दबाव बनाना था, लेकिन बांग्लादेश ने इस कोशिश को कामयाब नहीं होने दिया. यानी की रिश्तों की गाड़ी शुरू होने से पहले ही बेपटरी हो गई. सोचा था भारत को घेरेंगे, लेकिन खुद की बेइज्जती करवा ली.

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25 Aug 2025
( Updated: 11 Dec 2025
08:32 AM )
गले लगाने चले पाकिस्तान की बांग्लादेश ने कर दी बेइज्जती, रख दी ऐसी शर्त कि आतंकिस्तान को सरेआम होना पड़ा शर्मिंदा
तस्वीर: इशाक डार / मोहम्मद यूनुस
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कहते हैं रिश्ते हों या दो देशों के संबंध, झूठ और फरेब की बुनियाद पर खड़ी नहीं हो सकते. पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है. बीते साल अगस्त महीने में सुनियोजित और प्रायोजित विरोध-प्रदर्शन और हिंसा के बाद ढाका में शेख हसीना की सरकार का तख्तापलट कर दिया गया और पाक समर्थित जमात-ए-इस्लामी की विचारधारा वाले लोगों की सत्ता में वापसी हो गई, जिसका नेतृत्व कार्यकारी प्रधानमंत्री और सलाहकार के तौर पर मोहम्मद यूनुस कर रहे हैं. कभी पाकिस्तान का हिस्सा रहे इस बंगाली मुस्लिम देश में मनमाफिक लोगों की सरकार आने के बाद इस्लामाबाद के मुंह से पानी टपकने लगा और करीब 13 साल बाद विदेश मंत्री इशाक डार भागे-भागे गए, लेकिन यहां उनके साथ खेला हो गया. 

भारत को घेरने का पाकिस्तान का प्लान फेल!

पाकिस्तान ने 2012 में तत्कालीन विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार के दौरे के 13 साल बाद इशाक डार को ढाका भेजा. इस दौरे के पीछे पाकिस्तान की मुख्य मंशा बांग्लादेश के साथ अपने रिश्तों को मज़बूत करके भारत पर रणनीतिक और चौतरफा दबाव बनाना था. हाल ही में हुई कुछ घटनाओं, जैसे ऑपरेशन सिंदूर और पहलगाम हमले के कारण भारत-PAK के बीच तनाव बढ़ा हुआ था ऐसे में इस्लामाबाद ने इस मौके का फायदा उठाकर हिंदुस्तान को चौतरफा घेरने (पाकिस्तान-चीन-बांग्लादेश) के लिए ढाका के साथ पींगे बढ़ाने का प्रयास किया. ज्ञात हो कि जब पाक-भारत सैन्य तनाव चल रहा था तब कई बांग्लादेश पूर्व जनरलों ने धमकी दी थी कि अगर भारत, पाकिस्तान पर हमला करता है तो वो कोलकाता और नॉर्थ ईस्ट में पूर्व से हमले करेगा. पाक ने इसे सीरियस ले लिया और सोचा कि वो इसका फायदा उठा सकता है और 54 साल से चली आ रही तल्खी और नरसंहार को भूल जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

इसके अलावा बांग्लादेश ने भी भारत के साथ अपने कूटनीतिक संबंधों में अपनी स्वायत्तता बनाए रखने की कोशिश की और दिखाने का प्रयास किया कि भार. शुरुआत में दोनों देशों ने दोस्ती की कसमें खाईं, जिससे यह लग रहा था कि पाकिस्तान अपने मकसद में कामयाब हो जाएगा.

इशाक डार की बांग्लादेश में हो गई बेइज्जती!

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जैसे ही इशाक डार बांग्लादेश पहुंचे, ढाका ने अपनी रणनीति बदल दी. डार के दौरे से पहले बांग्लादेश में इस बात पर ज़ोरदार चर्चा थी कि क्या पाकिस्तान 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान किए गए अत्याचारों के लिए माफी मांगेगा. इस युद्ध में पाकिस्तानी सेना पर हज़ारों बांग्लादेशी महिलाओं के साथ बलात्कार, हत्या और आगज़नी के आरोप लगे थे. डार ने ढाका में बांग्लादेश के विदेश मामलों के सलाहकार तौहीद हुसैन से मुलाकात की. जब पत्रकारों ने उनसे 1971 के अनसुलझे मुद्दों के बारे में पूछा, तो डार ने दावा किया कि ये मुद्दे पहले ही दो बार सुलझाए जा चुके हैं-एक बार 1974 में और दूसरी बार जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ (2000) के दौरे के दौरान.

बांग्लादेश ने पाकिस्तान के झूठ को नकारा, डार के दावे को खारिज किया

इशाक डार के इस दावे को कुछ ही घंटों के भीतर बांग्लादेश ने सिरे से खारिज कर दिया. यह काम खुद तौहीद हुसैन ने किया, जिन्होंने डार से मुलाकात की थी. हुसैन ने कहा कि वे डार के इस दावे से बिल्कुल सहमत नहीं हैं कि ये मुद्दे सुलझ चुके हैं. तौहीद हुसैन ने बांग्लादेश की स्थिति को दृढ़ता से स्पष्ट करते हुए कहा कि बिना इन तीन बुनियादी मुद्दों को सुलझाए रिश्तों की गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकती. तौहीद के बयान से साफ हो गया कि पाक का भारत को घेरने का प्लान फेल हो गया है.

तौहीद ने इशाक डार के बांग्लादेश दौरे और विवाद को लेकर क्या कहा?

1.  वित्तीय मामले-खातों का निपटारा करना
2.  माफी- 1971 के नरसंहार के लिए पाकिस्तान द्वारा कुबूलनामा और सार्वजनिक माफी
3.  फंसे हुए लोग-पाकिस्तान द्वारा बांग्लादेश में फंसे हुए लोगों को वापस लेना

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हुसैन ने यह भी साफ कर दिया कि यह कोई आधिकारिक द्विपक्षीय मुलाकात नहीं थी और दोनों देशों के बीच भविष्य में इन मुद्दों पर चर्चा जारी रहेगी. इस घटना से यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान की बांग्लादेश के साथ रिश्तों को सुधारने और भारत पर दबाव बनाने की कोशिश नाकाम रही. ढाका ने अपनी कूटनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए पाकिस्तान को साफ संदेश दिया कि 1971 के अत्याचारों से जुड़े मुद्दे उनके लिए आज भी महत्वपूर्ण हैं और इन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.

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