Advertisement

Loading Ad...

आस‍िम मुनीर को चुकानी पड़ेगी व्हाइट हाउस में लंच की कीमत! ट्रंप ने मांग लिया कुछ ऐसा मना कर फंस जाएगा पाकिस्तान

व्हाइट हाउस में ट्रंप के साथ लंच के बाद पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर इसे बड़ी कूटनीतिक जीत मान रहे थे, लेकिन अब उसी लंच की भारी कीमत चुकाने की नौबत आ गई है.

File Image: Asim Munir / Shahbaz Sharif / Donald Trump Meet
Loading Ad...

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ व्हाइट हाउस में लंच करना पाकिस्तान के आर्मी चीफ फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के लिए किसी जीत से कम नहीं लग रहा था. तस्वीरें आईं, तारीफ हुई और पाकिस्तान के पावर सर्किल में यह संदेश गया कि वॉशिंगटन में अब उनकी चल पड़ी है. खुद ट्रंप ने खुले मंच से मुनीर की सराहना की, जिससे रावलपिंडी से इस्लामाबाद तक तालियां बजने लगीं. लेकिन ट्रंप को जानने वाले जानते हैं कि उनके यहां कोई भी लंच मुफ्त नहीं होता. अब उसी लंच की कीमत पाकिस्तान से मांगी जा रही है, और वह कीमत इतनी भारी है कि उसे चुकाना भी मुश्किल है और ठुकराना भी.

दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को नवगठित ‘गाजा पीस बोर्ड’ में शामिल होने का आधिकारिक न्योता भेज दिया है. पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने भले ही इसे गर्व के साथ स्वीकार किया हो, लेकिन सच्चाई यह है कि इस न्योते ने पाकिस्तान की नींद उड़ा दी है. यह कोई सम्मान नहीं, बल्कि ऐसा कूटनीतिक फंदा है जिसमें फंसना पाकिस्तान की मजबूरी बनती जा रही है.

गाजा पीस बोर्ड का मुख्य काम क्या है?

Loading Ad...

अमेरिका गाजा संकट के समाधान के लिए 20 सूत्रीय योजना लेकर आया है. इसका दूसरा और सबसे अहम चरण ‘गाजा एक्जीक्यूटिव बोर्ड’  गाजा पीस बोर्ड का गठन है. इस बोर्ड का काम युद्ध के बाद गाजा में प्रशासन, सुरक्षा और कानून व्यवस्था को संभालना होगा. सुनने में यह एक कूटनीतिक पहल लगती है, लेकिन असल मायने में यह जिम्मेदारियों का बोझ दूसरों पर डालने की रणनीति है. यहां पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा खतरा छिपा है. बोर्ड का सदस्य बनने का मतलब है जमीन पर उतरकर जिम्मेदारी लेना. ट्रंप प्रशासन किसी भी सूरत में अमेरिकी सैनिकों को गाजा की गलियों में नहीं भेजना चाहता. ट्रंप की सोच साफ है. अगर शांति स्थापना के नाम पर सेना भेजनी है, तो मुस्लिम देशों की भेजी जाए. ऐसे में अगर पाकिस्तान इस बोर्ड का हिस्सा बनता है, तो उस पर अपनी सेना गाजा भेजने का दबाव बनना तय है.

Loading Ad...

यही है पाकिस्तान का असली डर

गाजा में सेना भेजने का मतलब है हमास और इस्लामिक जिहाद जैसे संगठनों से सीधे टकराव. यानी उन संगठनों को निहत्था करना, गिरफ्तार करना और जरूरत पड़ी तो गोली चलाना. सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान की जनता इसे स्वीकार करेगी. जिस पाकिस्तानी सेना को दशकों से ‘इस्लाम की रक्षक’ बताकर पेश किया गया है, अगर वही सेना गाजा में फिलिस्तीनी लड़ाकों पर कार्रवाई करती दिखे, तो पाकिस्तान के भीतर बगावत जैसे हालात बन सकते हैं. पाकिस्तान में पहले ही इजरायल विरोधी भावनाएं चरम पर हैं. धार्मिक संगठनों का दबाव अलग है. ऐसे में अगर पाकिस्तानी फौज को गाजा में ‘इजरायल की सुरक्षा’ सुनिश्चित करने वाली ताकत के रूप में देखा गया, तो शहबाज शरीफ सरकार के लिए यह राजनीतिक आत्महत्या होगी. विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला पाकिस्तान को आंतरिक अस्थिरता और हिंसा की ओर धकेल सकता है.

Loading Ad...

ना कहना पड़ सकता है भारी 

अगर गाजा जाना खाई है, तो इस प्रस्ताव को ठुकराना कुआं है. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस वक्त वेंटिलेटर पर है. आईएमएफ की किस्तें, डॉलर की जरूरत और अंतरराष्ट्रीय कर्ज सब कुछ अमेरिका की रजामंदी से जुड़ा है. डोनाल्ड ट्रंप ऐसे नेता नहीं हैं जिन्हें ‘ना’ सुनना पसंद हो. अगर पाकिस्तान इस न्योते को ठुकराता है, तो इसका असर आईएमएफ फंडिंग, एफएटीएफ की स्थिति और सैन्य सहयोग पर पड़ सकता है. यही ट्रंप की असली चाल है. वे गाजा की समस्या को मुस्लिम देशों को ‘आउटसोर्स’ करना चाहते हैं. पाकिस्तान, तुर्की और कतर जैसे देशों को आगे कर वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि अगर खून बहे, तो वह अमेरिकी नहीं बल्कि दूसरे देशों के सैनिकों का हो.

कितना ताकतवर है यह बोर्ड

Loading Ad...

व्हाइट हाउस ने जिन नामों की घोषणा की है, वे इस बोर्ड के वजन को दिखाते हैं. खुद डोनाल्ड ट्रंप इसके चेयरमैन के तौर पर सामने हैं. उनके साथ अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, विश्व बैंक अध्यक्ष अजय बंगा और ट्रंप के दामाद जेरड कुशनर शामिल हैं. इसके अलावा तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान और कतर के वरिष्ठ राजनयिक अली अल-थवादी भी इस बोर्ड का हिस्सा हैं. तुर्की और कतर पहले से ही इजरायल के आलोचक रहे हैं. इसके बावजूद उनका इस बोर्ड में होना बताता है कि ट्रंप हर धड़े को एक टेबल पर बैठाने की कोशिश कर रहे हैं. पाकिस्तान को शामिल करना इसी रणनीति का हिस्सा है, ताकि दक्षिण एशिया की एकमात्र परमाणु संपन्न मुस्लिम ताकत को इस दलदल में उतारा जा सके.

इजरायल और हमास दोनों नाराज

दिलचस्प बात यह है कि इस बोर्ड से इजरायल भी खुश नहीं है. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने साफ कहा है कि बोर्ड का गठन उनसे पूछकर नहीं किया गया. इजरायल की चिंता तुर्की और कतर को लेकर है, जिन्हें वह हमास समर्थक मानता है. दूसरी तरफ फिलिस्तीनी संगठन इस्लामिक जिहाद ने इस बोर्ड को इजरायल के हितों को साधने वाला करार दिया है. उनका आरोप है कि सीजफायर के नाम पर गाजा पर कब्जे की तैयारी हो रही है. यानी जिस मंच का विरोध इजरायल भी कर रहा है और फिलिस्तीनी लड़ाके भी, उसमें शामिल होकर पाकिस्तान दोनों तरफ से पिसने वाला है.

Loading Ad...

शहबाज शरीफ के सामने सबसे कठिन फैसला

यह भी पढ़ें

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने बेहद संतुलित बयान दिया है कि पाकिस्तान गाजा में शांति के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के साथ खड़ा रहेगा. इस बयान का असली मतलब यही है कि हम फिलहाल हां भी नहीं कह रहे और ना भी नहीं. शहबाज शरीफ जानते हैं कि गाजा में पीसकीपिंग कोई साधारण मिशन नहीं है. यह सोमालिया या बोस्निया जैसा मामला नहीं, जहां दुश्मन साफ दिखता था. गाजा में हमास एक विचारधारा है, जिसे स्थानीय समर्थन हासिल है. वहां पाकिस्तानी सेना को ऐसी पुलिसिंग करनी पड़ेगी, जो अंततः इजरायल की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी. पाकिस्तानी विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप ने पाकिस्तान को ऐसी बस का टिकट पकड़ा दिया है, जिसका ड्राइवर अमेरिका और इजरायल हैं, और अगर हादसा हुआ, तो जान पाकिस्तानी सैनिकों की जाएगी. यही वह कीमत है, जो ट्रंप अब अपने लंच के बदले मांग रहे हैं.

LIVE
अधिक →

Advertisement

Loading Ad...
Loading Ad...
Loading Ad...
अधिक →

Advertisement

Loading Ad...