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UNSC में ईरानी राजदूत का ऐलान, अब अमेरिका पर हमला तय; गिनाए 5 बड़े कारण

ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते संघर्ष के बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाई गई, जहां हालात और अधिक तनावपूर्ण हो गए. इस बैठक में ईरान के स्थायी प्रतिनिधि आमिर सईद इरावानी ने अमेरिका को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि ईरान अब चुप नहीं बैठेगा. इरावानी ने साफ शब्दों में कहा, ईरान के पास अमेरिका पर पलटवार करने के वैध और ठोस कारण हैं.

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मध्य पूर्व में ईरान और इजरायल के बीच जारी संघर्ष अब और खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है. हालात तब और बिगड़ गए जब इस संघर्ष में अमेरिका ने भी सक्रिय हस्तक्षेप किया. अमेरिका की सैन्य कार्रवाई ने न सिर्फ क्षेत्रीय तनाव को बढ़ा दिया है, बल्कि ईरान को भी जवाबी रणनीति अपनाने पर मजबूर कर दिया है. इस मसले पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाई गई, जिसमें ईरान के स्थायी प्रतिनिधि आमिर सईद इरावानी ने अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा कि अब जवाबी हमला होगा. उन्होंने साफ शब्दों में कहा, "ईरान के पास अमेरिका पर पलटवार करने के वैध और ठोस कारण हैं."

ईरानी न्यूज एजेंसी ‘मेहर न्यूज’ की रिपोर्ट के अनुसार, इरावानी ने यूएन बैठक में अमेरिका पर हमले के पांच प्रमुख कारण गिनाए, जिनमें क्षेत्रीय संप्रभुता का उल्लंघन, निर्दोष नागरिकों की हत्या, अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन, आक्रामक सैन्य कार्रवाई और ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा को सीधा खतरा शामिल है. जानकारों का मानना है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच सीधे टकराव की स्थिति बनी, तो इसका असर सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक भू-राजनीतिक संतुलन भी डगमगा सकता है.

संयुक्त राष्ट्र में राजदूत ने दी खुली चेतावनी
दरअसल, हाल ही में अमेरिका ने बी-2 बॉम्बर्स के जरिए ईरान के तीन परमाणु ठिकानों पर जबरदस्त हमला किया, जिसके बाद मध्य पूर्व में तनाव और बढ़ गया है. इस अमेरिकी हमले के बाद दो सवाल लगातार उठ रहे थे– क्या ईरान अमेरिका पर पलटवार करेगा? और अगर हां, तो कब? अब इन सवालों का जवाब खुद ईरान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में दे दिया है. ईरान के स्थायी प्रतिनिधि आमिर सईद इरावानी ने यूएन में बड़ा बयान देते हुए कहा कि अमेरिका पर हमला किया जाएगा और इसके पीछे पांच ठोस कारण हैं.

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1. संप्रभुता पर हमला, वैधता का अभाव:vइरावानी ने कहा कि अमेरिका ने एक शांतिप्रिय राष्ट्र की संप्रभुता का उल्लंघन किया है. "हम परमाणु प्रसार संधि (NPT) का सम्मान कर रहे थे, लेकिन फिर भी हम पर हमला किया गया. यह एकतरफा और गैरकानूनी कार्रवाई है, जिसे किसी भी वैश्विक मंच पर वैध नहीं ठहराया जा सकता."

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2. आतंकवाद को समर्थन और गाजा पर चुप्पी: ईरान ने अमेरिका पर मिडिल ईस्ट में आतंकवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया. "गाजा पर इज़रायली हमले हो रहे हैं और अमेरिका इस पर एक शब्द नहीं कहता। यह मानवता के खिलाफ अपराध है, जिसे अमेरिका मौन समर्थन दे रहा है। पूरी दुनिया चाहे चुप रहे, पर ईरान अब चुप नहीं रहेगा."

3. परमाणु वार्ता से पहले हमला: ईरानी राजदूत ने कहा कि 16 जून को ओमान की राजधानी मस्कट में अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु वार्ता होने वाली थी. लेकिन उससे दो दिन पहले, 13 जून को इज़रायल ने हमला कर दिया. "क्या यही शांति प्रक्रिया है? संधि से कौन भाग रहा है – ये दुनिया खुद तय करे," इरावानी ने कहा.

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4. कासिम सुलेमानी की हत्या का मुद्दा: इरावानी ने अमेरिका द्वारा जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या को भी एक बड़ा कारण बताया. "वे हमारे देश के एक शीर्ष सैन्य अधिकारी थे। उन्हें साजिशन मार दिया गया। यह कैसे जायज हो सकता है?"

5. शांति प्रयासों से चिढ़ और ठिकानों पर हमला: ईरान ने कहा कि उसके विदेश मंत्री अब्बास अराघाची यूरोपीय देशों के साथ शांति वार्ता में व्यस्त थे, लेकिन अमेरिका को यह बर्दाश्त नहीं हुआ. "हम इज़रायल से युद्ध लड़ रहे हैं और फिर भी शांति के लिए प्रयास कर रहे थे. लेकिन अमेरिका ने हमारे ठिकानों पर हमला करके दिखा दिया कि उसे शांति नहीं, सिर्फ संघर्ष चाहिए. हम इसका जवाब जरूर देंगे."

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बताते चलें कि दोनों देशों की जंग को लेकर दुनिया के बड़े देश दो धड़ों में बंटता दिख रहा है. अमेरिका और पश्चिमी देश जहां इज़रायल के समर्थन में खड़े हैं, वहीं दूसरी ओर रूस, चीन, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया जैसे देश खुलकर ईरान के साथ आ खड़े हुए हैं. इस तनाव के बीच अमेरिका ने इजरायल का साथ देते हुए ईरान पर एयरस्ट्राइक कर दी, जिससे क्षेत्रीय तनाव और अधिक बढ़ गया है. वहीं, रूस और चीन ने अमेरिका की कार्रवाई की निंदा की और इसे "एकतरफा और असंतुलित हस्तक्षेप" बताया. इसके अलावा उत्तर कोरिया ने भी ईरान के समर्थन में खुलकर बयान जारी किया है. प्योंगयांग ने अमेरिका को आड़े हाथों लेते हुए कहा है कि "वह दुनिया भर में अस्थिरता और संघर्ष फैलाने वाला सबसे बड़ा कारक है." उत्तर कोरिया ने इस सैन्य हस्तक्षेप को "संप्रभुता के खिलाफ आक्रामकता" करार दिया.

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