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रूस-यूक्रेन युद्ध पर अमेरिका का बड़ा यू-टर्न, कहा- ये जंग अब हमारी नहीं

रूस-यूक्रेन युद्ध में अब तक सक्रिय भूमिका निभाता आ रहा अमेरिका अचानक पीछे हट गया है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि अब वह इस युद्ध में मध्यस्थ नहीं बनेगा और यह दोनों देशों का आपसी मामला है। अमेरिका ने हाल ही में यूक्रेन से एक खनिज डील की थी, और ठीक उसके बाद युद्ध से दूरी बना ली।

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दुनिया भर की निगाहें जब रूस और यूक्रेन युद्ध के भविष्य पर टिकी थी तब अमेरिका की सक्रिया भूमिका दोनों के बीच एक दिवारी की तरह सामने नजर आती रही, लेकिन अब अमेरिका की ओर से एक ऐसा बयान आया है जिसने सबको चौंका दिया है. अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने साफ शब्दों में कह दिया है कि अब अमेरिका इस युद्ध में किसी प्रकार की मध्यस्थता नहीं करेगा. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कहा, “यह हमारा युद्ध नहीं है.”

यह बयान ऐसे समय आया है जब युद्ध को दो साल से भी ज़्यादा हो चुके हैं और किसी भी पक्ष की जीत का दावा पूरी तरह से खोखला साबित हो रहा है. अब तक अमेरिका कूटनीतिक और सैन्य रूप से यूक्रेन के साथ खड़ा रहा था. लेकिन ट्रंप प्रशासन के आने के बाद रणनीति में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है.

अब नहीं बनेगा अमेरिका मध्यस्थ

अमेरिकी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता टैमी ब्रूस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक महत्वपूर्ण ऐलान किया. उन्होंने कहा कि अमेरिका अब रूस और यूक्रेन के बीच किसी भी शांति वार्ता का हिस्सा नहीं बनेगा. उनका कहना था, “हम अब दुनिया भर में तुरंत उड़कर शांति वार्ता की मध्यस्थता नहीं करेंगे. यह दोनों देशों के बीच का मसला है. उन्हें खुद बातचीत करके समाधान निकालना होगा.”

इस बयान से साफ है कि डोनाल्ड ट्रंप की सरकार युद्ध में अमेरिका की भूमिका को सीमित करना चाहती है. पहले की सरकारें जहां यूक्रेन को सैन्य और आर्थिक सहायता देकर रूस पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही थीं, वहीं अब ट्रंप प्रशासन सीधे इस लड़ाई से दूरी बनाता दिख रहा है.

एक दिन पहले ही यूक्रेन से की थी डील

इस नीतिगत बदलाव का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि अमेरिका ने एक दिन पहले ही यूक्रेन के साथ क्रिटिकल मिनरल्स (महत्वपूर्ण खनिज) डील साइन की थी. इस डील के तहत अमेरिका को यूक्रेन से दुर्लभ खनिज मिलेंगे, जिनका उपयोग रक्षा, टेक्नोलॉजी और ऊर्जा सेक्टर में होता है. डील साइन करने के 24 घंटे के भीतर ही अमेरिका ने शांति वार्ता से हटने की घोषणा कर दी. इससे यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या अमेरिका ने पहले अपने हित सुरक्षित कर लिए और फिर जिम्मेदारी से पीछा छुड़ा लिया?

कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की यह चाल सोची-समझी है. उन्होंने पहले यूक्रेन से रणनीतिक खनिजों की डील करके अपने आर्थिक और तकनीकी हितों की सुरक्षा कर ली और अब युद्ध से सीधा पल्ला झाड़ रहे हैं. इसका सीधा असर यूक्रेन पर पड़ेगा, जो अब तक अमेरिका को अपना सबसे बड़ा समर्थक मानता रहा है.

अब यूक्रेन को रूस से बातचीत के लिए न तो अमेरिकी दबाव का सहारा मिलेगा और न ही कोई ठोस कूटनीतिक कवच. विश्लेषकों का यह भी कहना है कि अमेरिका अपने घरेलू मामलों और आगामी चुनावों की वजह से अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से दूरी बना रहा है.

रूस को मिल सकता है फायदा

इस घटनाक्रम से रूस को फायदा हो सकता है. अमेरिका की मध्यस्थता से हटने का मतलब है कि अब रूस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव कमजोर होगा. अब रूस अपनी शर्तों पर बातचीत के लिए आगे बढ़ सकता है. साथ ही, यह संकेत भी जा सकता है कि अमेरिका को अब यूक्रेन की जीत की उम्मीद नहीं रही. इससे रूसी नेतृत्व को मनोवैज्ञानिक बढ़त मिल सकती है.

यूक्रेन की स्थिति और भी कठिन

यूक्रेन पहले ही सैन्य और आर्थिक रूप से भारी दबाव में है. उसकी अर्थव्यवस्था युद्ध के कारण चरमरा चुकी है. लाखों लोग देश छोड़ चुके हैं और सेना की स्थिति भी लगातार कमजोर होती जा रही है. अमेरिका के इस फैसले से यूक्रेन को अब अकेले ही इस युद्ध का सामना करना पड़ेगा. यूरोपीय यूनियन के कुछ देश अब भी यूक्रेन को समर्थन दे रहे हैं, लेकिन अमेरिका जैसा सहयोगी साथ न हो तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर समर्थन भी कमजोर पड़ता है.

टैमी ब्रूस के अनुसार अब वक्त आ गया है कि रूस और यूक्रेन मिलकर इस युद्ध को खत्म करने का रास्ता ढूंढें. उन्होंने कहा, “अब यह दोनों पक्षों के बीच की बात है. उन्हें ठोस समाधान सामने लाना होगा. यही उनका दायित्व है.” यह बयान सीधे तौर पर बताता है कि अमेरिका अब इस संघर्ष को अपना नहीं मान रहा. इस स्थिति में युद्ध के आगे बढ़ने या खत्म होने की जिम्मेदारी अब सीधे दोनों देशों पर आ गई है.

अमेरिका के पीछे हटने के बाद अब सारी नजरें रूस और यूक्रेन पर टिक गई हैं. क्या दोनों देश बिना किसी तीसरे पक्ष की मदद के समाधान निकाल पाएंगे? या फिर यह युद्ध और भी लंबा खिंचता जाएगा? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में सामने आएंगे. फिलहाल इतना तय है कि अमेरिका की यह नई नीति वैश्विक कूटनीति को नई दिशा देने जा रही है.
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