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अमेरिकी प्रोडक्ट्स पर 34% टैक्स, चीन की ट्रंप को सीधी चुनौती
चीन ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ‘रेसिप्रोकल टैरिफ’ के जवाब में बड़ा पलटवार किया है। चीन ने ऐलान किया है कि 10 अप्रैल से अमेरिका से आने वाले सभी प्रोडक्ट्स पर 34% टैरिफ लगेगा। इसके साथ ही चीन ने 11 बड़ी अमेरिकी कंपनियों को अपनी 'अनरिलायबल एंटिटी' लिस्ट में डाल दिया है, जिससे उनका चीन में कारोबार करना मुश्किल हो जाएगा।
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वैश्विक व्यापार जगत में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया है। चीन ने घोषणा की है कि वह 10 अप्रैल से सभी अमेरिकी उत्पादों पर 34% का टैरिफ लगाएगा। यह कदम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा चीनी वस्तुओं पर लगाए गए समान टैरिफ के जवाब में उठाया गया है।
2 अप्रैल 2025 को, राष्ट्रपति ट्रंप ने 'लिबरेशन डे' के अवसर पर एक व्यापक टैरिफ संरचना की घोषणा की। इसमें सभी देशों से आयातित वस्तुओं पर 10% का सार्वभौमिक टैरिफ और लगभग 60 देशों पर अतिरिक्त 'रेसिप्रोकल' टैरिफ शामिल थे। चीन पर विशेष रूप से 34% का टैरिफ लगाया गया, जो पहले से मौजूद 20% टैरिफ के अतिरिक्त था। इसके जवाब में, चीन के वित्त मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका की यह कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों के खिलाफ है और चीन के वैध अधिकारों और हितों को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाती है।
चीन के प्रतिशोधी कदम
चीन ने न केवल 34% का टैरिफ लगाया, बल्कि दुर्लभ पृथ्वी तत्वों के निर्यात पर भी नियंत्रण लागू किया है। ये तत्व इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों और कंप्यूटर चिप्स जैसी उच्च-तकनीकी उत्पादों में उपयोग किए जाते हैं। इसके अलावा, चीन ने 11 अमेरिकी कंपनियों को 'अनरिलायबल एंटिटी' सूची में डाला है, जिससे वे चीनी बाजार में व्यापार करने में असमर्थ होंगी।
वैश्विक बाजारों पर प्रभाव
इन टैरिफों के परिणामस्वरूप, वैश्विक वित्तीय बाजारों में भारी गिरावट देखी गई है। प्रमुख सूचकांकों में उल्लेखनीय कमी आई है, जिससे निवेशकों में चिंता बढ़ी है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने चेतावनी दी है कि यह व्यापार युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए 'महत्वपूर्ण जोखिम' पैदा कर सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि इस व्यापार युद्ध का सबसे अधिक प्रभाव उन उद्योगों पर पड़ेगा जो दोनों देशों के बीच गहराई से जुड़े हुए हैं। उदाहरण के लिए, अमेरिकी पोल्ट्री उद्योग, जो चीन को बड़े पैमाने पर निर्यात करता है, अब गंभीर चुनौतियों का सामना कर सकता है।
हालांकि दोनों देशों ने अब तक कड़े कदम उठाए हैं, लेकिन कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बातचीत के दरवाजे अभी भी खुले हैं। चीन और अमेरिका दोनों के लिए यह आवश्यक है कि वे अपने मतभेदों को सुलझाने के लिए संवाद जारी रखें, ताकि वैश्विक अर्थव्यवस्था को स्थिर रखा जा सके।
चीन और अमेरिका के बीच बढ़ता व्यापार तनाव न केवल दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित कर रहा है, बल्कि वैश्विक बाजारों पर भी इसका गहरा असर पड़ रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों देश किस प्रकार से इस विवाद को हल करने के लिए कदम उठाते हैं और क्या वैश्विक व्यापार प्रणाली में स्थिरता लौटती है।
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