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AI से मरे हुए लोगों की 'वापसी'! नई तकनीक से मृत प्रियजनों से फिर होगी बातचीत, जानिए कैसे?
Creepy AI जैसी तकनीकें जितनी आकर्षक और नई लगती हैं, उतनी ही खतरनाक भी हो सकती हैं. ये तकनीकें हमें हमारे बीते हुए रिश्तों की याद दिला सकती हैं, लेकिन हमें यह समझना होगा कि वे रिश्ता अब सिर्फ याद बन चुका है. इसका इस्तेमाल अगर कोई सिर्फ एक प्रयोग या अनुभव के रूप में करे, तो ठीक है. लेकिन अगर कोई रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इसे शामिल कर ले, तो यह एक गंभीर समस्या बन सकती है.
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AI एक ऐसा सॉफ्टवेयर है जो इंसानों की आवाज़ की नकल करके, खासकर उन लोगों की जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, उनके जैसे बात करता है. यानी, अगर कोई अपने माता-पिता, दादा-दादी या किसी करीबी को खो चुका है, तो यह AI उनकी पुरानी आवाज़ और बातचीत के तरीकों को समझकर वैसी ही बात करता है जैसे वे असल में करते थे. इससे लोगों को ऐसा लगता है कि वे अपने मृत प्रियजनों से फिर से बातचीत कर पा रहे हैं. शुरुआत में इस तकनीक ने लोगों का दिल जीत लिया. बहुत से यूज़र्स भावुक हो गए जब उन्होंने अपने खोए हुए रिश्तेदारों की आवाज़ फिर से सुनी. कुछ लोगों ने तो इस AI से रोज़ाना बात करना शुरू कर दिया जैसे सलाह लेना, भावनाएं बांटना या बस बातें करना. इससे उन्हें भावनात्मक सहारा मिलने लगा.
लेकिन क्या यह वाकई सही है?
भले ही यह तकनीक लोगों को थोड़ा सुकून देती हो, लेकिन विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों की राय इससे बिल्कुल अलग है. उनका मानना है कि यह तकनीक लोगों को हकीकत से दूर ले जा सकती है.अगर कोई रोज़ाना अपने मृत रिश्तेदार की नकली आवाज़ से बात करेगा, तो वह धीरे-धीरे असली दुनिया से कटने लगेगा. उसे लगने लगेगा कि उसका प्रियजन अब भी ज़िंदा है और वह उसी पर निर्भर रहने लगेगा. इससे एक आभासी दुनिया बन जाएगी जिसमें इंसान असली रिश्तों और अनुभवों से दूर होता चला जाएगा. यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत नुकसानदायक साबित हो सकता है.
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प्राइवेसी की भी है चिंता
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एक और बड़ी चिंता यह है कि इस तकनीक के लिए लोगों को अपने मृत परिजनों की जानकारी जैसे उनकी आवाज़, वीडियो, मैसेज, या ईमेल AI सिस्टम को देनी पड़ती है. ये सारी जानकारी उस कंपनी के पास स्टोर हो जाती है जो यह सॉफ्टवेयर बनाती है.अगर ये संवेदनशील जानकारियाँ लीक हो जाएं या किसी गलत मकसद से इस्तेमाल की जाएं, तो कितना बड़ा खतरा हो सकता है. इन जानकारियों में निजी भावनाएं, परिवार से जुड़ी बातें और कई बार वित्तीय जानकारी भी शामिल हो सकती है.
कंपनी का बचाव और एक्सपर्ट्स की चेतावनी
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इस तकनीक को बनाने वाली कंपनी कहती है कि उनका मकसद लोगों को भावनात्मक राहत देना है. उनका दावा है कि यह लोगों को दुःख से उबरने में मदद करता है और उन्हें ऐसा लगता है कि वे अपने प्रियजनों के करीब हैं. लेकिन मनोवैज्ञानिकों और तकनीकी जानकारों का कहना है कि यह लोगों की भावनाओं से खेलने जैसा है. यह तकनीक शुरू में भले ही राहत दे, लेकिन लंबे समय में यह व्यक्ति को मानसिक रूप से कमजोर बना सकती है. धीरे-धीरे वह सच और झूठ के बीच फर्क करना बंद कर देगा और एक बनावटी दुनिया में जीने लगेगा.
तकनीक को समझदारी से अपनाना ज़रूरी है
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Creepy AI जैसी तकनीकें जितनी आकर्षक और नई लगती हैं, उतनी ही खतरनाक भी हो सकती हैं. ये तकनीकें हमें हमारे बीते हुए रिश्तों की याद दिला सकती हैं, लेकिन हमें यह समझना होगा कि वे रिश्ता अब सिर्फ याद बन चुका है. इसका इस्तेमाल अगर कोई सिर्फ एक प्रयोग या अनुभव के रूप में करे, तो ठीक है. लेकिन अगर कोई रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इसे शामिल कर ले, तो यह एक गंभीर समस्या बन सकती है. इसलिए ज़रूरी है कि हम ऐसी तकनीक का इस्तेमाल सोच-समझकर करें, और अपनी असल ज़िंदगी और रिश्तों को ही प्राथमिकता दें.