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उत्तरकाशी में कहर के बीच जारी है जिंदगी बचाने की जंग, अब तक 400 से ज्यादा लोगों का हुआ रेस्क्यू, हेलिकॉप्टर से हो रही शिफ्टिंग

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में मंगलवार को बादल फटने से खीर गंगा नदी में बाढ़ आ गई. हादसे में पांच लोगों की मौत हो गई, जबकि सेना, SDRF और ITBP की मदद से 413 से ज्यादा लोगों को सुरक्षित निकाला गया. गांव में 30 से 50 फीट तक मलबा जमा है. रेस्क्यू ऑपरेशन में खराब मौसम और ग्लेशियर टूटने से लगातार बाधा आ रही है.

Image: X/ CM Dhami
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उत्तराखंड एक बार फिर प्रकृति के रौद्र रूप का शिकार हुआ है. उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में मंगलवार को बादल फटने से भयंकर बाढ़ आ गई. इस आपदा ने खीर गंगा नदी को उफान पर ला दिया और देखते ही देखते पूरा गांव मलबे के ढेर में तब्दील हो गया. इस घटना में लगभग 5 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि 413 से अधिक लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया है. इस बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने खुद आलाधिकारियों के साथ मौके जायजा ले रहे है. 

राज्य सरकार द्वारा जारी जानकारी के अनुसार, राहत और बचाव कार्य के लिए SDRF, ITBP, सेना और अन्य एजेंसियों को मौके पर तैनात किया गया. गुरुवार तक रेस्क्यू ऑपरेशन में 65 और लोगों को सुरक्षित निकाल लिया गया है. सभी प्रभावितों को हेलिकॉप्टर के जरिए सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट किया गया है.

धराली में तबाही के निशान

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धराली गांव की जो तस्वीरें सामने आई हैं, वे किसी भयावह सपने से कम नहीं हैं. गांव में 30 से 50 फीट तक मलबा जमा हो गया है. कहीं सिर्फ मकानों की छतें दिखाई दे रही हैं, तो कहीं केवल बोल्डर और पत्थरों का ढेर. स्थानीय लोगों का कहना है कि धराली की ऐसी हालत उन्होंने पहले कभी नहीं देखी. यह गांव गंगोत्री धाम से लगभग 20 किलोमीटर पहले पड़ता है और चारधाम यात्रा के रूट में एक प्रमुख पड़ाव है.

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रेस्क्यू टीम के सामने दोहरी चुनौती

रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटी टीमों के सामने इस बार हालात और भी मुश्किल हैं. एक तरफ तेज बहाव वाली खीर गंगा नदी है, तो दूसरी ओर घुटनों तक मलबा और दलदल. SDRF की टीम कई किलोमीटर पहाड़ों में पैदल चलकर धराली तक पहुंची है. गीली और फिसलन भरी मिट्टी में चलना इतना मुश्किल हो गया कि रास्ता बनाने के लिए टिन की चादरें बिछाई जा रही हैं. आईटीबीपी की टीम ने खराब मौसम के बीच भी हिम्मत नहीं हारी और लगातार राहत कार्य जारी रखे हैं. सेना के 11 लापता जवानों को भी सुरक्षित रेस्क्यू कर लिया गया है. हालांकि, कुछ जवानों की खोज अब भी जारी है.

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सीएम धामी ने संभाला मोर्चा

राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने खुद ग्राउंड जीरो पर पहुंचकर हालात का जायजा लिया. बुधवार की रात उन्होंने धराली में बने कैंप में सेना, एनडीआरएफ और आईटीबीपी के अधिकारियों के साथ बैठक की. गुरुवार सुबह वे सीधे आपदा प्रभावित क्षेत्र में पहुंचे और पीड़ितों से मुलाकात की. उन्होंने रेस्क्यू ऑपरेशन में लगी टीमों की सराहना की और हरसंभव मदद का आश्वासन दिया. मुख्यमंत्री के निर्देश पर भटवाड़ी में फंसी रेस्क्यू टीम को एयरलिफ्ट किया गया. राहत कार्य में लगे जवानों और कर्मियों की सुरक्षा भी सरकार की प्राथमिकता है.

टूटी सड़कें, बंद रास्ते

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उत्तरकाशी और आस-पास के इलाकों में भारी बारिश के कारण कई रास्ते बंद हो गए हैं. धराली तक पहुंचने के लिए मुख्य रूप से तीन रास्ते भटवाड़ी, लिंचिगाड और गंगरानी का इस्तेमाल होता है. लेकिन लैंडस्लाइड के कारण ये तीनों ही मार्ग अवरुद्ध हो चुके हैं. भटवाड़ी से हर्षिल तक जाने वाला मार्ग पूरी तरह से कट चुका है. उत्तरकाशी जिला आपातकालीन परिचालन केंद्र के अधिकारियों ने बताया कि गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर गंगनानी से आगे स्थित लिमच्छा गाड़ में बना पुल बाढ़ में बह गया है. इसके चलते राहत कर्मियों की एक बड़ी टीम बीच रास्ते में ही फंसी हुई है. 200 से अधिक रेस्क्यू कर्मियों को मार्ग खुलने का इंतजार है. इस बीच एंबुलेंस और राहत सामग्री से लदे वाहनों की लंबी कतारें लग चुकी हैं.

जोशीमठ में भी बंद हुआ बद्रीनाथ हाईवे

इस बीच चमोली जिले के जोशीमठ में स्थित जोगीधारा इलाके में चट्टान टूटकर बद्रीनाथ हाईवे पर गिर गई. गनीमत यह रही कि उस समय हाईवे पर कोई वाहन नहीं गुजर रहा था, वरना बड़ा हादसा हो सकता था. फिलहाल, प्रशासन ने मलबा हटाने का कार्य शुरू कर दिया है और जल्द ही हाईवे को दोबारा खोलने की कोशिश की जा रही है.

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ग्लेशियर और मौसम बने चुनौती

रेस्क्यू ऑपरेशन की सबसे बड़ी बाधा बन रहा है बदलता मौसम. बार-बार बारिश हो रही है, ग्लेशियर टूट रहे हैं और मलबा नीचे की ओर बहता आ रहा है. ऐसे में राहत कार्यों की गति लगातार बाधित हो रही है. हेलीकॉप्टर से रेस्क्यू टीमें भेजी जा रही हैं, लेकिन खराब मौसम के कारण उड़ानें बार-बार रोकनी पड़ रही हैं. सरकार और प्रशासन दोनों ने पूरी ताकत झोंक दी है, लेकिन प्रकृति की ताकत के सामने तकनीक भी सीमित हो जाती है. अब भी कई गांवों से संपर्क टूट चुका है और राहत दल उन्हें जोड़ने की कोशिश में जुटे हैं.

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बता दें कि राज्य सरकार ने हालात से निपटने के लिए हरसंभव कदम उठाए हैं, लेकिन जब तक पूरे पहाड़ी क्षेत्र में स्थायी समाधान की दिशा में ठोस प्रयास नहीं होंगे, तब तक ऐसी आपदाएं बार-बार जनजीवन को अस्त-व्यस्त करती रहेंगी. धराली की त्रासदी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कितना ज़रूरी है. उत्तराखंड के पहाड़ हर साल बाढ़, भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं से जूझते हैं. ऐसे में अब समय आ गया है कि सिर्फ राहत कार्य नहीं, बल्कि दीर्घकालिक समाधान की ओर कदम बढ़ाए जाएं. फिलहाल, राहत टीमों का साहस और स्थानीय प्रशासन की तत्परता सराहनीय है, लेकिन भविष्य को सुरक्षित बनाने की ज़िम्मेदारी हम सभी की है.

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