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सरकारी जमीन पर खड़ी कर दी मस्जिद और दरगाह! शाही जामा मस्जिद के इमाम पर बड़ा एक्शन, भरना होगा 7 करोड़ जुर्माना

बताया जा रहा है करीब दो बीघा जमीन पर मकान, मस्जिद और दरगाह बनाई गई है. कोर्ट ने आरोपियों को नोटिस भेजते हुए जमीन तुरंत खाली करने के निर्देश दिए हैं.

File Photo
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UP की योगी सरकार के कार्यकाल में संभल में विलुप्त पड़े धार्मिक स्थलों को नई पहचान मिल रही है. अवैध कब्जे के खिलाफ प्रदेश सरकार का बुलडोजर लगातार गरज रहा है, इसके बावजूद कुछ लोग मस्जिद और दरगाह के नाम पर सरकारी जमीन पर कब्जा करने से बाज नहीं आ रहे. 

मामला पंवासा ब्लॉक के सैफ खां सराय गांव का है. जहां सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे का नया मामला सामने आया है. आरोप है कि यहां शाही जामा मस्जिद के शाही इमाम और उनके भाई पर ग्राम समाज की जमीन को हथिया लिया. बताया जा रहा है करीब दो बीघा जमीन पर मकान, मस्जिद और दरगाह बनाई गई है. हालांकि शिकायत के बाद आरोपियों को ये हिमाकत भारी पड़ गई. 

कोर्ट ने लगाया 7 करोड़ का जुर्माना 

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शाही इमाम के जमीन पर कब्जे की शिकायत मिलने के बाद संभल के तहसीलदार कोर्ट ने इस भूमि को सरकारी घोषित कर दिया. जमीन पर तुंरत कब्जा हटाने के आदेश जारी हुए हैं. साथ ही साथ कोर्ट ने शाही इमाम पर 7 करोड़ का जुर्माना भी लगाया है. कोर्ट में मामले की सुनवाई 7 मार्च को हुई थी. 

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क्या है पूरा मामला, जानें

सैफ खां सराय गांव की जिस जमीन पर कब्जे की बात कही जा रही है. उसकी अनुमानित कीमत करीब 6 करोड़ 94 लाख 19 हजार रुपए बताई जा रही है. आरोप है कि शाही इमाम आफताब हुसैन और उनके भाई मेहताब हुसैन ने इस जमीन पर अपना हक जमाते हुए मकान, मस्जिद और दरगाह बना ली. 

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24 जून 2025 को लेखपाल राहुल धारीवाल के संज्ञान में आने के बाद मामला कोर्ट पहुंचा. जिसके बाद आफताब हुसैन के नाम केस दर्ज कर नोटिस जारी किया गया. 30 जून को कोर्ट ने ग्राम समाज की जमीन पर अवैध कब्जे को लेकर कारण बताओ नोटिस जारी किया था. 18 जुलाई को आफताब हुसैन और उनके भाई ने केस खारिज करने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी. 

शाही इमाम का क्या है पक्ष? 

प्रतिवादी पक्ष ने दावा किया था कि उन्हें 15 जून 1972 को भी बेदखली का नोटिस मिला था. जिसे बाद में प्रशासन ने वापस ले लिया था. उन्होंने कहा कि निर्माण करीब 20 साल पहले हुआ था. जो निर्माण वक्फ संख्या 3037 के तहत उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में दर्ज है. 

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दूसरी ओर तहसीलदार धीरेंद्र कुमार सिंह का कहना था कि यह जमीन चकबंदी के दौरान पेड़ लगाने के लिए आरक्षित की गई थी. 1972 में इसे ग्राम समाज की जमीन घोषित किया गया था. इसके बाद इसे किसी भी अन्य तरह से अन्य व्यक्ति के नाम दर्ज नहीं हुई.  

बताया गया कि लेखपाल ने ग्राम सभा की जमीन की रिपोर्ट पेश की थी. जिस पर सुनवाई के बाद यह आदेश दिया गया था. मामले की सुनवाई के दौरान आरोपियों पर सर्किल रेट के आधार पर करीब 7 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया गया है. साथ ही सख्त चेतावनी भी दी गई है. अगर समय रहते शाही इमाम और उनके भाई को ग्राम सभा की जमीन खाली नहीं की तो प्रशासन फिर अपनी तरह से मामले का निपटारा करेगा. नियमों के अनुसार जमीन से कब्जा हटाया जाएगा. 

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