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UP का जालौन बना जल संरक्षण का मॉडल, संतुलित भूजल और राष्ट्रीय स्तर पर मिली मजबूत पहचान

जालौन जिला प्रशासन ने योजनाबद्ध प्रयासों, जनभागीदारी और मजबूत जल संरचनाओं के माध्यम से एक नई मिसाल पेश की है. यहां पर नए तालाब, चेकडैम, रूफटॉप वाटर हार्वेस्टिंग स्ट्रक्चर, सोकपिट, जलतारा समेत अन्य पारंपरिक जल स्रोत से भूमिगत जल स्तर को बढ़ाया गया है.

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योगी सरकार के जल संरक्षण के प्रयासों का असर दिखने लगा है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की एक जिला एक नदी पुनरुद्धार विजन के सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विजन का ही असर है कि जिस बुंदेलखंड में पानी को लेकर चुनौतियां देखी जाती थीं, वहां भूमिगत जल के स्तर में बढ़ोत्तरी हुई है.

जालौन बना जल संरक्षण का मॉडल

वहीं जालौन जिला प्रशासन ने योजनाबद्ध प्रयासों, जनभागीदारी और मजबूत जल संरचनाओं के माध्यम से एक नई मिसाल पेश की है. यहां पर नए तालाब, चेकडैम,  रूफटॉप वाटर हार्वेस्टिंग स्ट्रक्चर, सोकपिट, जलतारा समेत अन्य पारंपरिक जल स्रोत से भूमिगत जल स्तर को बढ़ाया गया है. यही वजह है कि जालौन में वर्तमान में कुल 4,56,583 हेक्टेयर क्षेत्र में भूजल रिचार्ज की व्यापक क्षमता उपलब्ध है. इसके लिए 6वें राष्ट्रीय जल पुरस्कार कार्यक्रम में जालौन को जल संरक्षण श्रेणी में देशभर में तृतीय स्थान प्राप्त हुआ. यह सम्मान इस बात का प्रमाण है कि जालौन ने जल संरक्षण को केवल एक योजना नहीं, बल्कि जन आंदोलन के रूप में अपनाया है.

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15 किमी के भीतर प्राकृतिक स्वरूप खो चुकी नून नदी का किया गया पुनरुद्धार

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जालौन जिलाधिकारी राजेश कुमार पांडेय ने बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मंशा के अनुरूप जिले में जल संरक्षण बढ़ाने एवं जल दोहन रोकने के लिए विभिन्न प्रयास किए गये. इसके तहत जनपद में पिछले कुछ वर्षों में जल के महत्व को प्रति जागरूक करने के लिए वाटर समिट का आयोजन किया गया, जिसमें 600 से अधिक कार्यशालाएं एवं ग्राम पंचायतों में प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन, जल बचाओ पोस्टर प्रतियोगिताएं, नुक्कड़ नाटकों का आयोजन किया गया. वाटर समिट के तहत 2,45,000 छात्र (2260 प्राथमिक विद्यालय, 278 मिडिल स्कूल), 5,07,000 ग्रामीण (574 ग्राम पंचायतें) कुल 7,52,000 व्यक्तियों ने जल संरक्षण की शपथ ली, जिससे जनपद के सभी व्यक्तियों में जल के महत्व को समझा और जनपद में जल संरक्षण अभियान का हिस्सा बने. वहीं नून नदी विकास खण्ड कोंच के ग्राम सतोह (पहाड़गांव) से निकल कर कुल 47 ग्राम पंचायतों से होकर 81 किमी की दूरी तय कर ग्राम मगरौल मुस्तिकिल (महेवा) में यमुना नदी में मिलती है जो अपने उद्गम से 15 किमी के भीतर नदी ने प्राकृतिक स्वरूप खो चुकी थी, जिसके उपरांत नून नदी के पुनर्जीवन योजना बनाई गई. नदी पुनर्जीवन का कार्य स्थानीय नागरिकों के सहयोग से किया गया. नदी में मिलने वाले 9 प्रमुख नाले अतिक्रमण मुक्त किया गया एवं नदी के तल की खुदाई, नदी क्षेत्र को उसकी चौड़ाई में अतिक्रमण मुक्त कराकर प्राकृतिक नदी प्रवाह को बहाल किया गया नदी को मूल रूप में लाने के लिए नदी की दोनों ओर 51,000 पौधों का रोपण किया गया. 

ग्रामीण क्षेत्रों में इन संरचनाओं के कारण सिंचाई की सुविधा मजबूत हुई है

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जिलाधिकारी राजेश कुमार पांडेय ने बताया कि वर्ष 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार जनपद में कुल 7484 जल संरचनाएं मौजूद हैं, जिनमें 574 नए तालाब, 07 चेकडैम,  517 रूफटॉप वाटर हार्वेस्टिंग स्ट्रक्चर (पब्लिक), 617 रूफटॉप वाटर हार्वेस्टिंग स्ट्रक्चर (निजी), 5112 सोकपिट, 12  मानव निर्मित बड़े गड्ढे, 656 जलतारा, अन्य पारंपरिक जलस्रोत शामिल हैं. ये संरचनाएं न केवल वर्षा जल को संचित करने में मदद करती हैं, बल्कि भूजल स्तर को बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में इन संरचनाओं के कारण सिंचाई की सुविधा मजबूत हुई है और जल की उपलब्धता सुनिश्चित हुई है.

41,365.94 हेक्टेयर मीटर भूजल उपलब्ध रहने का अनुमान 

उन्होंने बताया कि भूजल आकलन (2024-25) के अनुसार जनपद में कुल 9 ब्लॉक आकलन इकाइयां हैं और सभी “सेफ” श्रेणी में आते हैं. जिले में वार्षिक दोहन योग्य भूजल संसाधन 93,767.55 हेक्टेयर मीटर (ham)है, जबकि वर्तमान में 52,259.64 हेक्टेयर मीटर भूजल का उपयोग किया जा रहा है. इस प्रकार कुल भूजल दोहन 55.73 प्रतिशत है, जो संतुलित और सुरक्षित स्तर को दर्शाता है. ब्लॉक स्तर पर भी स्थिति संतुलित बनी हुई है. कुठौंद ब्लॉक में 66.24 प्रतिशत भूजल उपयोग दर्ज किया गया है, जो निर्धारित सुरक्षित सीमा के अंतर्गत है. यह दिखाता है कि जिले में जल का उपयोग सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है और संसाधनों पर अनावश्यक दबाव नहीं है. भविष्य की दृष्टि से भी जालौन सशक्त स्थिति में है.  वर्ष 2025 के अनुमान के अनुसार घरेलू उपयोग के बाद भी 41,365.94 हेक्टेयर मीटर भूजल उपलब्ध रहेगा, जो आने वाले समय में जल सुरक्षा को बनाए रखने में सहायक होगा. यह दर्शाता है कि वर्तमान प्रयास न केवल आज के लिए, बल्कि आने वाले वर्षों के लिए भी लाभकारी सिद्ध हो रहे हैं. 

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जल संरक्षण के क्षेत्र में जालौन बना मिसाल  

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विशेषज्ञों का मानना है कि जालौन में जल संरक्षण के क्षेत्र में जो कार्य किए जा रहे हैं, वे अन्य जनपदों के लिए भी प्रेरणा बन सकते हैं. यहां जल संरचनाओं का संरक्षण, वर्षा जल संचयन, नदियों और तालाबों का पुनर्जीवन तथा सामुदायिक भागीदारी एक मजबूत मॉडल के रूप में उभर कर सामने आई है.बता दें कि जालौन जनपद का भूगोल पूरी तरह जलोढ़ संरचना से बना है, जो भूजल संचयन और पुनर्भरण के लिए अत्यंत अनुकूल माना जाता है. कुल 4,56,583 हेक्टेयर क्षेत्र में भूजल रिचार्ज की व्यापक क्षमता उपलब्ध है. यही कारण है कि यहां पानी की उपलब्धता संतुलित बनी हुई है. जनपद में जल के प्रमुख स्रोतों में भूजल (हैंडपंप, नलकूप, बोरवेल), नदियां (विशेषकर यमुना, पहुज एवं बेतवा नदियां), तालाब, नहरें तथा वर्षा जल प्रमुख रूप से शामिल हैं.

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