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बिहार में आखिर क्यों फेल हो जाता है बीजेपी के "चाणक्य" अमित शाह का गुणा गणित ? चुनाव से पहले के दौरे की क्या है रणनीति

बिहार में बीजेपी के चाणक्य के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है और वह अभी तक फेल रहे हैं। हालांकि दिल्ली में मिली शानदार जीत ने अमित शाह के अंदर यह भरोसा जरुर डाल दिया है कि बिहार में इस बार लड़ाई कहीं ना कहीं शानदार होने वाली है। उनका पूरा टारगेट बिहार इलेक्शन है।

बिहार में आखिर क्यों फेल हो जाता है बीजेपी के "चाणक्य" अमित शाह का गुणा गणित ? चुनाव से पहले के दौरे की क्या है रणनीति
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चाहे लोकसभा चुनाव हो, राज्य का विधानसभा चुनाव या फिर किसी अन्य पद के लिए कोई चुनाव हो। गृहमंत्री अमित शाह की रणनीति के बिना कोई भी चुनाव बीजेपी के लिए सफल नहीं है। बीजेपी के चाणक्य देश के कई राज्यों में अपनी मजबूत पकड़ बनाते नजर आते हैं। चाहे यूपी हो या दिल्ली या फिर हरियाणा इन सभी जगह पर अमित शाह का जादू खूब चला है। लेकिन आज भी एक ऐसा राज्य है। जहां उनकी रणनीति हमेशा से फेल होती नजर आई है। यहां का रिकॉर्ड हमेशा से काफी खराब रहा है। ऐसे में कुछ ही महीने बाद बिहार में होने वाला विधानसभा चुनाव अमित शाह के लिए एक  बड़ी चुनौती है। फिलहाल यहां पर किस तरह का प्रदर्शन रहेगा। यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। तो चलिए जानने की कोशिश करते हैं कि आखिरकार बिहार में किन वजहों से अमित शाह की रणनीति फेल हो जाती है ?  

आखिर क्या रहती है अमित शाह की रणनीति ? 

बिहार में अकेले दम पर जीत की परिकल्पना करने वाले अमित शाह  नीतीश कुमार का साथ छोड़ते ही यह सोच लिया कि सीमांचल के बिना उनका सरकार बनना मुश्किल है। यही वजह रहा कि उन्होंने बांग्लादेशी घुसपैठ और आतंकवाद का मुद्दा उठाया। कई बार उन्होंने सीमांचल का दौरा भी किया। लेकिन इनका सीमांचल मिशन साल 2015 में मिली करारी शिकायत के बाद शुरू हुआ। साल 2022 में अमित शाह ने पूर्णिया और किशनगंज में जनसभा भी की। लेकिन 2024 में पूर्णिया से पप्पू यादव, किशनगंज से कांग्रेस के मोहम्मद जावेद, कटिहार से तारिक अनवर जीत गए। देखा जाए तो सीमांचल में अमित शाह का हर दांव फ्लॉप हो गया। एक समय ऐसा भी था। जब 2024 लोकसभा चुनाव में अमित शाह ने नीतीश कुमार को जमकर घेरा था। उन्होंने काफी आक्रामक अंदाज में तीखे हमले किए। सीएम नीतीश कुमार के खिलाफ सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा भी काफी हद तक पीछे पड़ गए थे। दोनों मंच से जमकर निशाना साध रहे थे। 

अमित शाह ने भरी हुंकार जेडीयू की महत्ता के बारे में बताया 

बता दें कि नवादा के हिसुआ में जनसभा के दौरान केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने कहा था कि "मैं ललन सिंह को स्पष्ट कह देना चाहता हूं। नीतीश कुमार के लिए दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं। वह प्रधानमंत्री बनने के सपने को कभी पूरा नहीं कर पाएंगे।" लेकिन एनडीए गठबंधन जदयू से अलग होने के बाद भी यह भरोसा नहीं दिला पाया कि 2024 का प्रदर्शन 2019 की तरह होगा। उन्होंने राजद के 30% वोट बैंक के साथ अन्य पिछड़ा और दलित का एक हद तक मिलने वाले वोटों के नुकसान के बारे में बताया। लेकिन जब जातीय सर्वे और आरक्षण में पिछड़ा और अति पिछड़ा वोट पर महागठबंधन का रंग चढ़ते देखा। तो एक बार फिर से बिना नीतीश कुमार के अमित शाह की रणनीति धरी की धरी रह गई। आखिर अंत में मिली हार की वजह से नीतीश कुमार से हाथ मिलाना पड़ा। चुनावी नतीजे में यह हुआ कि जदयू 16 सीटों पर लड़कर 12 पर जीत दर्ज करने में कामयाब रही। भाजपा 17 पर लड़कर 12 सीटों पर जितने में कामयाब रही। ऐसे में एक बार फिर से जदयू का बोलबाला रहा और उसका स्ट्राइक रेट भी काफी शानदार रहा। 

यूपी के सहारनपुर वाला फार्मूला बिहार के सीमांचल में अपनाना चाहते हैं 

वहीं लोग बताते हैं कि अमित शाह सीमांचल में यूपी के सहारनपुर वाले मॉडल पर चल पड़े हैं। सीमांचल में मुस्लिम वोटर्स ज्यादा हैं। यहां जीत के फैक्टर भी बनते नजर आ रहे हैं। उनकी दूसरी रणनीति यह होती है कि अगर मुस्लिम उम्मीदवार नहीं है। तब भी बीजेपी के उम्मीदवार को पसंद न कर लालू या नीतीश के उम्मीदवार को पसंद करें। अमित शाह यह चाहते हैं कि दूसरी पार्टियों में बंटे हिंदू जातियों का भगवाकरण किया जाए। वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश अश्क का मानना है कि बिहार गंगा-जमुनी सभ्यता का मजबूत राज्य है। यहां धर्म के राम पर राजनीति नहीं चलेगी। बिहार में आज भी दलित और पिछड़ी जाति का तालमेल मजबूती से बना हुआ है। यहां पर भगवा रंग चढ़ाने में अमित शाह को अभी कई और वर्ष लगेंगे। यही कुछ पॉइंट है जो अब तक बिहार में बीजेपी के चाणक्य के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है और अभी तक फेल रहे हैं। दिल्ली में मिली शानदार जीत ने अमित शाह के अंदर यह भरोसा जरुर डाल दिया है कि बिहार में इस बार लड़ाई कहीं ना कहीं शानदार होने वाली है। उनका पूरा टारगेट बिहार इलेक्शन है।

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